भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 180
१७८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यतयश्च भविष्यन्ति बहवोऽस्मिन् कलौ युगे।<br>पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं युगान्ते समुपस्थिते॥ १९उस कलियुगमें बहुत लोग संन्यासीका रूप धारण कर लेंगे। उस युगान्तके उपस्थित होनेपर पुरुष तो कम होंगे, किंतु स्त्रियाँ अधिक होंगी। कलियुगमें ब्राह्मण वेद-विद्या तथा वैदिक कर्मोंकी निन्दा करेंगे॥ १९½॥
निन्दन्ति वेदविद्यां च द्विजाः कर्माणि वै कलौ।<br>कलौ देवो महादेवः शङ्करो नीललोहितः॥ २०तब उस कलियुगमें नीललोहित महादेव शिव धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये अपनी विकृत आकृति अर्थात् उच्छिन्नभिन्न लिङ्गस्वरूपवाले होकर प्रकट होंगे॥ २०½॥
प्रकाशते प्रतिष्ठार्थं धर्मस्य विकृताकृतिः।<br>ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शङ्करम्॥ २१उस समय जो विप्रगण जिस किसी भी तरहसे उन विकृत वेषवाले शिवकी आराधना करेंगे, वे कलियुगके दोषोंपर विजय प्राप्तकर परमपदको प्राप्त होंगे॥ २१½॥
कलिदोषान् विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्।<br>श्वापदप्रबलत्वं च गवां चैव परिक्षयः॥ २२उस कलियुगके अन्तमें हिंसक पशुओंकी प्रबलता तथा गायोंका ह्रास होगा और उत्तम साधुओंका अभाव हो जायगा॥ २२½॥
साधूनां विनिवृत्तिश्च वेद्या तस्मिन् युगक्षये।<br>तदा सूक्ष्मो महोदर्को दुर्लभो दानमूलवान्॥ २३उस समय दानके मूलवाला सूक्ष्म ऐश्वर्यका रूप भी दुर्लभ हो जायगा, ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रमोंकी शिथिलता हो जानेपर धर्म विनष्ट हो जायगा॥ २३½॥
चातुराश्रमशैथिल्ये धर्मः प्रतिचलिष्यति।<br>अरक्षितारो हर्तारो बलिभागस्य पार्थिवाः॥ २४उस युगान्तमें राजा लोग प्रजाजनोंकी रक्षा न करके मात्र अपनी रक्षामें तत्पर रहेंगे और बलिभाग [कर]-के हर्ता बन जायँगे॥ २४½॥
युगान्तेषु भविष्यन्ति स्वरक्षणपरायणाः।<br>अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः॥ २५<br><br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति कलौ युगे।<br>चित्रवर्षी तदा देवो यदा प्राहुर्युगक्षयम्॥ २६कलियुगमें समस्त प्राणी अन्न तथा कन्याओंका विक्रय करनेवाले एवं ब्राह्मण वेद बेचनेवाले होंगे और स्त्रियाँ व्यभिचारपरायण हो जायँगी। जब युगक्षय होता है, उस समय वर्षाके देवता इन्द्र कहीं-कहींपर वृष्टि करनेवाले कहे जाते हैं॥ २५-२६॥
सर्वे वणिग्जनाश्चापि भविष्यन्त्यधमे युगे।<br>कुशीलचर्याः पाखण्डैर्वृथारूपैः समावृताः॥ २७उस अधम कलियुगमें सभी वणिक् जन भी कुत्सित आचरणवाले, दम्भ करनेवाले तथा पाखण्डी अर्थात् अवैदिक मार्गोंपर चलनेवाले होंगे॥ २७॥
बहुयाजनको लोको भविष्यति परस्परम्।<br>नाव्याहृतक्रूरवाक्यो नार्जवी नानसूयकः॥ २८<br><br>न कृते प्रतिकर्ता च युगक्षीणे भविष्यति।<br>निन्दकाश्चैव पतिता युगान्तस्य च लक्षणम्॥ २९कलियुगमें सभी लोग ग्रामयाजक (पात्र-अपात्रका विचार किये बिना सबका यज्ञ आदि करानेवाले) हो जायँगे। कोई भी मृदु वचन बोलनेवाला, सरल स्वभाववाला, ईर्ष्यारहित तथा प्रत्युपकारी अर्थात् अपने लिये किये गये उपकारको माननेवाला नहीं होगा और सभी लोग निन्दक एवं पतित हो जायँगे। यह सब युगान्त कलियुगका लक्षण है॥ २८-२९॥