श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| १८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथा गायोंका वध करके परस्पर नानाविध उपद्रव उत्पन्न करेंगे॥ ४१-४२^१/_२॥ | |
| उपद्रवांस्तथान्योऽन्यं साधयन्ति तदा प्रजाः।<br>दुःखप्रभूतमल्पायुर्देहोत्साहः सरोगता॥ ४३<br><br>अधर्माभिनिवेशित्वात्तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्।<br>प्रजासु ब्रह्महत्यादि तदा वै सम्प्रवर्तते॥ ४४ | उस समय अपार दुःख, अल्प आयु, शारीरिक कष्ट तथा व्याधियोंसे लोग पीड़ित होंगे। ऐसा कहा गया है कि कलियुगमें अधर्मके प्रति अत्यन्त आसक्ति होनेके कारण लोगोंका आचरण तमोगुणप्रधान होगा। उस समय प्रजाओंमें ब्रह्महत्या आदि महापापकर्म करनेकी विशेष तत्परता होगी॥ ४३-४४॥ |
| तस्मादायुर्बलं रूपं कलिं प्राप्य प्रहीयते।<br>तदा त्वल्पेन कालेन सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः॥ ४५ | अतएव कलियुगको प्राप्तकर प्रजाओंकी आयु, बल, रूप आदिका क्षय होगा। उस समय अल्पकालके धर्माचरणसे ही मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होंगे॥ ४५॥ |
| धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते द्विजसत्तमाः।<br>श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं ये चरन्त्यनसूयकाः॥ ४६ | उस कलियुगमें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वेषरहित होकर वेदों तथा स्मृतियोंमें प्रतिपादित धर्मोंका आचरण करेंगे, वे धन्य होंगे॥ ४६॥ |
| त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः।<br>यथाक्लेशं चरन् प्राज्ञस्तदह्ना प्राप्नुते कलौ॥ ४७ | त्रेतामें वर्षभर तथा द्वापरमें मासभर धर्माचरण करनेसे जिस फलका प्राप्त होना बताया गया है, ज्ञानवान् व्यक्ति कलियुगमें वही फल यथाशक्ति एक दिन धर्माचरण करके प्राप्त कर लेता है॥ ४७॥ |
| एषा कलियुगावस्था संध्यांशं तु निबोध मे।<br>युगे युगे च हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादांस्तु सिद्धयः॥ ४८ | यह कलियुगकी दशाका वर्णन किया गया है। अब आप उसका सन्ध्यांश मुझसे जान लीजिये। युग-युगमें सिद्धियोंके तीन पादोंका ह्रास होता है॥ ४८॥ |
| युगस्वभावाः सन्ध्यास्तु तिष्ठन्तीह तु पादशः।<br>सन्ध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादशस्ते प्रतिष्ठिताः॥ ४९ | युगके स्वभाववाली सन्ध्याएँ यहाँ पादसे न्यून होकर रहती हैं। इस प्रकार सन्ध्याके स्वभाव अपने अंशोंमें अर्थात् सन्ध्यांशोंमें एक चतुर्थांशसे न्यून होकर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ ४९॥ |
| एवं सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके।<br>तेषां शास्ता ह्यसाधूनां भूतानां निधनोत्थितः॥ ५० | इस प्रकार युगान्तमें सन्ध्यांशकालके उपस्थित होनेपर दुष्ट प्राणियोंके संहारके लिये उनका एक महान् शासक आविर्भूत होगा॥ ५०॥ |
| गोत्रेऽस्मिन् वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमितिरुच्यते।<br>मानवस्य तु सोऽंशेन पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ५१ | पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें जो प्रमिति नामसे विख्यात रहे हैं, वे मनुपुत्रके अंशसे इस कलियुगके समाप्तिकालमें चन्द्रमाके गोत्रमें सोमशर्मा नामक ब्राह्मणके रूपमें उत्पन्न होंगे॥ ५१॥ |
| समाः सविंशतिः पूर्णा पर्यटन् वै वसुन्धराम्।<br>अनुकर्षन् स वै सेनां सवाजिरथकुञ्जराम्॥ ५२<br><br>प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>स तदा तैः परिवृतो म्लेच्छान् हन्ति सहस्रशः॥ ५३ | शस्त्रधारी ब्राह्मणोंसे निरन्तर परिवृत वे हाथी, घोड़े तथा रथसे युक्त विशाल सेना साथमें लेकर पूरे बीस वर्षतक पृथ्वीपर घूम-घूमकर सैकड़ों और हजारों बार म्लेच्छोंका वध करेंगे॥ ५२-५३॥ |