भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १८१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स हत्वा सर्वशश्चैव राज्ञस्तान् शूद्रयोनिजान्।<br>पाखण्डांस्तु ततः सर्वान्निःशेषं कृतवान् प्रभुः॥ ५४परम ऐश्वर्यसम्पन्न वे ब्राह्मणपुत्र शूद्रयोनिमें उत्पन्न उन सभी पाखण्डी राजाओंको मारकर पृथ्वीको उनसे पूर्णतः विहीन कर देंगे॥ ५४॥
नात्यर्थं धार्मिका ये च तान् सर्वान् हन्ति सर्वतः।<br>वर्णव्यत्यासजाताश्च ये च ताननुजीविनः॥ ५५अधर्मका आचरण करनेवाले, वर्णव्यवस्थाके प्रतिकूल चलनेवाले तथा इनके जो अनुजीवी हैं, उन सभीको वे मार डालेंगे॥ ५५॥
प्रवृत्तचक्रो बलवान् म्लेच्छानामन्तकृत् तु।<br>अधृष्यः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम्॥ ५६सभी प्राणियोंके लिये अजेय, म्लेच्छोंके संहारक, अत्यन्त बलशाली तथा प्रवृत्त-आज्ञामण्डलवाले वे समग्र भूमण्डलपर विचरण करेंगे॥ ५६॥
मानवस्य तु सोऽशेन देवस्येह विजज्ञिवान्।<br>पूर्वजन्मनि विष्णोस्तु प्रमितिर्नाम वीर्यवान्॥ ५७<br><br>गोत्रतो वै चन्द्रमसः पूर्णे कलियुगे प्रभुः।<br>द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रान्तो विंशतिः समाः॥ ५८<br><br>विनिघ्नन् सर्वभूतानि शतशोऽथ सहस्रशः।<br>कृत्वा बीजावशेषां तु पृथिवीं क्रूरकर्मणः॥ ५९<br><br>परस्परनिमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु।<br>स साधयित्वा वृषलान् प्रायस्तानधार्मिकान्॥ ६०<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्थितिं प्राप्तः सहानुगः।<br>ततो व्यतीते काले तु सामात्यः सह सैनिकः॥ ६१पूर्वजन्ममें वीर्यवान् प्रमिति नामवाले वे इस कलिमें मनुपुत्र विष्णुदेवके अंशसे सोम-गोत्रमें कलियुगे पूर्ण होनेपर उत्पन्न होंगे। बीस वर्षतक पराक्रम प्रदर्शित करनेवाले वे सैकड़ों-हजारों विधर्मी प्राणियोंको नष्ट करते हुए पृथ्वीको क्रूरकर्मा जनोंसे शून्यप्राय-सा करके आकस्मिक तथा पारस्परिक समुत्पादित कोपके द्वारा उन अधार्मिक वृषलप्राय जनोंको मारकर बत्तीसवें वर्षके उदित होते ही मन्त्रियों, सहचरों तथा सैनिकोंसहित गंगा-यमुनाके मध्य स्वयंको संस्थापित कर लेंगे॥ ५७–६१॥
उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् म्लेच्छांश्चैव सहस्रशः।<br>तत्र सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके॥ ६२<br><br>स्थितास्त्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित्।<br>अप्रग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु कृत्स्नशः॥ ६३धर्मच्युत सभी पार्थिवों तथा हजारों म्लेच्छोंको नष्ट करके उस कलियुगमें सन्ध्यांशके समुपस्थित होनेपर यत्र-तत्र थोड़ी ही प्रजाएँ बची रहेंगी। वे आत्मनियन्त्रण खोकर तथा पूर्ण रूपसे लोभके वशीभूत होकर एक-दूसरेसे कृत्रिम नम्रता प्रदर्शित करती हुई उन्हें विश्वासमें लेकर उनकी हिंसा कर डालेंगी॥ ६२–६३ १/२॥
उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रणिपत्य परस्परम्।<br>अराजके युगवशात्संशये समुपस्थिते॥ ६४<br><br>प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयार्दिताः।<br>व्याकुलाश्च परिभ्रान्तास्त्यक्त्वा दारान् गृहाणि च॥ ६५युगके प्रभावके कारण अराजकताकी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे सभी प्रजाएँ परस्पर भयसे ग्रस्त होकर व्याकुल तथा भ्रमित हो जायेंगी। लोग अत्यन्त दुःखित एवं करुणाशून्य होकर अपनी पत्नियों तथा घरोंको छोड़कर अपने प्राणोंकी भी परवाह न करनेवाले होंगे॥ ६४–६५ १/२॥
स्वान् प्राणाननपेक्षन्तो निष्कारुण्याः सुदुःखिताः।<br>नष्टे श्रौते स्मार्तधर्मे परस्परहतास्तदा॥ ६६श्रौत तथा स्मार्तधर्मके नष्ट हो जानेपर सभी प्रजाएँ मर्यादाहीन, अत्यन्त क्रूर, स्नेहरहित तथा निर्लज्ज होकर एक-दूसरेकी हिंसा करानेमें तत्पर रहेंगी॥ ६६ १/२॥
निर्मर्यादा निराक्रान्ता निःस्नेहा निरपत्रपाः।<br>नष्टे धर्मे प्रतिहताः ह्रस्वकाः पञ्चविंशकाः॥ ६७धर्मके नष्ट हो जानेपर पतनको प्राप्त हुए लोग लघु आकारवाले तथा पच्चीस वर्षकी आयुवाले होंगे।