श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स हत्वा सर्वशश्चैव राज्ञस्तान् शूद्रयोनिजान्।<br>पाखण्डांस्तु ततः सर्वान्निःशेषं कृतवान् प्रभुः॥ ५४ | परम ऐश्वर्यसम्पन्न वे ब्राह्मणपुत्र शूद्रयोनिमें उत्पन्न उन सभी पाखण्डी राजाओंको मारकर पृथ्वीको उनसे पूर्णतः विहीन कर देंगे॥ ५४॥ |
| नात्यर्थं धार्मिका ये च तान् सर्वान् हन्ति सर्वतः।<br>वर्णव्यत्यासजाताश्च ये च ताननुजीविनः॥ ५५ | अधर्मका आचरण करनेवाले, वर्णव्यवस्थाके प्रतिकूल चलनेवाले तथा इनके जो अनुजीवी हैं, उन सभीको वे मार डालेंगे॥ ५५॥ |
| प्रवृत्तचक्रो बलवान् म्लेच्छानामन्तकृत् तु।<br>अधृष्यः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम्॥ ५६ | सभी प्राणियोंके लिये अजेय, म्लेच्छोंके संहारक, अत्यन्त बलशाली तथा प्रवृत्त-आज्ञामण्डलवाले वे समग्र भूमण्डलपर विचरण करेंगे॥ ५६॥ |
| मानवस्य तु सोऽशेन देवस्येह विजज्ञिवान्।<br>पूर्वजन्मनि विष्णोस्तु प्रमितिर्नाम वीर्यवान्॥ ५७<br><br>गोत्रतो वै चन्द्रमसः पूर्णे कलियुगे प्रभुः।<br>द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रान्तो विंशतिः समाः॥ ५८<br><br>विनिघ्नन् सर्वभूतानि शतशोऽथ सहस्रशः।<br>कृत्वा बीजावशेषां तु पृथिवीं क्रूरकर्मणः॥ ५९<br><br>परस्परनिमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु।<br>स साधयित्वा वृषलान् प्रायस्तानधार्मिकान्॥ ६०<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्थितिं प्राप्तः सहानुगः।<br>ततो व्यतीते काले तु सामात्यः सह सैनिकः॥ ६१ | पूर्वजन्ममें वीर्यवान् प्रमिति नामवाले वे इस कलिमें मनुपुत्र विष्णुदेवके अंशसे सोम-गोत्रमें कलियुगे पूर्ण होनेपर उत्पन्न होंगे। बीस वर्षतक पराक्रम प्रदर्शित करनेवाले वे सैकड़ों-हजारों विधर्मी प्राणियोंको नष्ट करते हुए पृथ्वीको क्रूरकर्मा जनोंसे शून्यप्राय-सा करके आकस्मिक तथा पारस्परिक समुत्पादित कोपके द्वारा उन अधार्मिक वृषलप्राय जनोंको मारकर बत्तीसवें वर्षके उदित होते ही मन्त्रियों, सहचरों तथा सैनिकोंसहित गंगा-यमुनाके मध्य स्वयंको संस्थापित कर लेंगे॥ ५७–६१॥ |
| उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् म्लेच्छांश्चैव सहस्रशः।<br>तत्र सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके॥ ६२<br><br>स्थितास्त्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित्।<br>अप्रग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु कृत्स्नशः॥ ६३ | धर्मच्युत सभी पार्थिवों तथा हजारों म्लेच्छोंको नष्ट करके उस कलियुगमें सन्ध्यांशके समुपस्थित होनेपर यत्र-तत्र थोड़ी ही प्रजाएँ बची रहेंगी। वे आत्मनियन्त्रण खोकर तथा पूर्ण रूपसे लोभके वशीभूत होकर एक-दूसरेसे कृत्रिम नम्रता प्रदर्शित करती हुई उन्हें विश्वासमें लेकर उनकी हिंसा कर डालेंगी॥ ६२–६३ १/२॥ |
| उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रणिपत्य परस्परम्।<br>अराजके युगवशात्संशये समुपस्थिते॥ ६४<br><br>प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयार्दिताः।<br>व्याकुलाश्च परिभ्रान्तास्त्यक्त्वा दारान् गृहाणि च॥ ६५ | युगके प्रभावके कारण अराजकताकी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे सभी प्रजाएँ परस्पर भयसे ग्रस्त होकर व्याकुल तथा भ्रमित हो जायेंगी। लोग अत्यन्त दुःखित एवं करुणाशून्य होकर अपनी पत्नियों तथा घरोंको छोड़कर अपने प्राणोंकी भी परवाह न करनेवाले होंगे॥ ६४–६५ १/२॥ |
| स्वान् प्राणाननपेक्षन्तो निष्कारुण्याः सुदुःखिताः।<br>नष्टे श्रौते स्मार्तधर्मे परस्परहतास्तदा॥ ६६ | श्रौत तथा स्मार्तधर्मके नष्ट हो जानेपर सभी प्रजाएँ मर्यादाहीन, अत्यन्त क्रूर, स्नेहरहित तथा निर्लज्ज होकर एक-दूसरेकी हिंसा करानेमें तत्पर रहेंगी॥ ६६ १/२॥ |
| निर्मर्यादा निराक्रान्ता निःस्नेहा निरपत्रपाः।<br>नष्टे धर्मे प्रतिहताः ह्रस्वकाः पञ्चविंशकाः॥ ६७ | धर्मके नष्ट हो जानेपर पतनको प्राप्त हुए लोग लघु आकारवाले तथा पच्चीस वर्षकी आयुवाले होंगे। |
| १८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हित्वा पुत्रांश्च दारांश्च विवादव्याकुलेन्द्रियाः।<br>अनावृष्टिहताश्चैव वार्त्तामुत्सृज्य दूरतः॥ ६८ | आपसी कलहसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले लोग अपनी पत्नियों एवं पुत्रोंका त्यागतक कर देंगे॥ ६७ १/२ ॥ |
| प्रत्यन्तानुपसेवन्ते हित्वा जनपदान् स्वकान्।<br>सरित्सागरकूपांस्ते सेवन्ते पर्वतांस्तथा॥ ६९ | वृष्टि न होनेके कारण दुःखित प्रजाएँ कृषिकर्मका पूर्ण रूपसे त्याग करके अपने-अपने देशोंको छोड़कर म्लेच्छ देशों, नदी, समुद्र, कुएँ, पर्वत आदि स्थानोंपर शरण लेंगी॥ ६८-६९॥ |
| मधुमांसैर्मूलफलैर्वर्तयन्ति सुदुःखिताः।<br>चीरपत्राजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ७० | प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित होकर मधु, मांस, कन्दमूल तथा फलोंपर जीवन-निर्वाह करेंगी। वे परिग्रहरहित एवं निष्क्रिय होकर वृक्षोंकी छाल तथा उनके पत्ते वस्त्ररूपमें धारण करेंगी॥ ७०॥ |
| वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः सङ्कटं घोरमास्थिताः।<br>एवं कष्टमनुप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्तदा॥ ७१ | वर्ण तथा आश्रमव्यवस्थासे भ्रष्ट हुए लोग घोर कष्टमें पड़ जायँगे और इस प्रकार भीषण दुःख आ जानेके कारण थोड़ी ही प्रजा बच पायेगी॥ ७१॥ |
| जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमानसाः।<br>विचारणा तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणा॥ ७२ | बुढ़ापा, रोग तथा क्षुधासे पीड़ित लोगोंके मनमें उस दुःखसे निर्वेद उत्पन्न होगा। पुनः उस निर्वेदसे साम्यावस्थावाली विचारणा, विचारणासे साम्यावस्थात्मक बोध |
| साम्यावस्थात्मको बोधः सम्बोधाद्धर्मशीलता।<br>अरूपशमयुक्तास्तु कलिशिष्टा हि वै स्वयम्॥ ७३ | और अन्तमें उस बोधसे धर्माचरणके प्रति प्रवृत्ति जाग्रत् होगी। कलियुगकी बची हुई वे प्रजाएँ स्वयं शक्ति-सामर्थ्यके अभावमें शान्तियुक्त हो जायँगी॥ ७२-७३॥ |
| अहोरात्रात्तदा तासां युगं तु परिवर्तते।<br>चित्तसम्मोहनं कृत्वा तासां वै सुप्तमत्तवत्॥ ७४ | इसके बाद सुप्त तथा मत्तकी भाँति उन प्रजाओंका चित्त-सम्मोहन करके एक दिन-रातमें ही कलियुग परिवर्तित हो जायगा और इस प्रकार कालधर्मके अनुसार कलियुगको दबाकर सत्ययुग प्रवृत्त हो जायगा॥ ७४ १/२ ॥ |
| भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्तत।<br>प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै॥ ७५ | तदनन्तर उस सत्ययुगके प्रवृत्त होनेपर कलियुगकी बची हुई प्रजाओंमें सत्ययुगके आचार-विचार उत्पन्न होंगे॥ ७५ १/२ ॥ |
| उत्पन्नाः कलिशिष्टास्तु प्रजाः कार्तयुगास्तदा।<br>तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विचरन्ति च॥ ७६ | इस लोकमें उस समय जो सप्तसिद्ध¹ लोग रहते हैं, वे अदृश्य रूपमें सप्तर्षियों²के साथ व्यवस्थित होकर विचरण करते हैं॥ ७६ १/२ ॥ |
| सप्तसप्तर्षिभिश्चैव तत्र ते तु व्यवस्थिताः।<br>ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थं ये स्मृता इह॥ ७७ | जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बीजके लिये कहे गये हैं, वे सब कलियुगमें उत्पन्न होनेवालोंके साथ उस समय विशेषता-रहित होकर रहते थे॥ ७७ १/२ ॥ |
| कलिजैः सह ते सर्वे निर्विशेषास्तदाभवन्।<br>तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयन्तीत्तरेऽपि च॥ ७८ | वर्णाश्रमके आचारवाला जो श्रौत तथा स्मार्त दो |
¹ १. मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध—ये सात सप्तसिद्ध कहे गये हैं। (लिङ्गपुराण पू० ८२।५१)
² २. कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, वसिष्ठ तथा जमदग्नि—ये सप्तर्षि कहे गये हैं।
| अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति | १८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतं स्मार्तं द्विधा तु यम्।<br>ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्धन्ते वै प्रजाः कृते ॥ ७९ | प्रकारका धर्म होता है; उस धर्मको उन लोगोंके लिये सप्तर्षि एवं सप्तसिद्ध लोग उपदेश करते हैं। इस प्रकार उन लोगोंके कर्मनिष्ठ हो जानेपर कृतयुगमें प्रजाएँ बढ़ने लगती हैं॥ ७८-७९॥ |
| श्रौतस्मार्तकृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते।<br>केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह युगक्षये ॥ ८० | उन सप्तर्षियोंके द्वारा श्रौत-स्मार्तसम्बन्धी धर्मोंका उपदेश करनेसे कुछ लोग युगके क्षयके समय इस पृथ्वीलोकमें धर्मकी व्यवस्थाके लिये रह जाते हैं॥ ८०॥ |
| मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति मुनयस्तु वै।<br>यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह ततः क्षितौ ॥ ८१<br>वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु सम्भवः।<br>तथा कार्त्तयुगानां तु कलिजेष्विह सम्भवः ॥ ८२ | वे मुनिगण मन्वन्तरोंके अधिकारोंमें स्थित रहते हैं। जिस प्रकार इस पृथ्वीपर दावानलसे वनोंके तृण आदिके जल जानेपर बादमें प्रथम वृष्टिसे उनके मूलोंमें पुनः अंकुरण होता है; उसी प्रकार कलियुगमें उत्पन्न हुए लोगोंसे ही कृतयुगके प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है॥ ८१-८२॥ |
| एवं युगाद्युगस्येह सन्तानं तु परस्परम्।<br>वर्तते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वन्तरक्षयः ॥ ८३ | इस प्रकार अव्यवच्छिन्न रूपसे इस लोकमें मन्वन्तरके क्षयतक एक युगके कुछ संतान दूसरे युगमें विद्यमान रहते हैं॥ ८३॥ |
| सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादान् क्रमेण तु॥ ८४ | प्रत्येक चतुर्युगीमें सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ तथा काम—ये सभी क्रमसे तीन-तीन पादोंके ह्रासको प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रत्येक युगके अन्ततक इनके एक-एक पादका ह्रास होता जाता है॥ ८४॥ |
| ससन्ध्यांशेषु हीयन्ते युगानां धर्मसिद्धयः।<br>इत्येषा प्रतिसिद्धिवैं कीर्त्तितैषा क्रमेण तु॥ ८५ | इसी प्रकार युगके सन्ध्यांशमें प्रत्येक युगकी धर्म सिद्धियोंका भी ह्रास होता है। इस तरह मैंने क्रमसे प्रत्येक सिद्धिका वर्णन कर दिया॥ ८५॥ |
| चतुर्युगानां सर्वेषामनेनैव तु साधनम्।<br>एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता॥ ८६ | इसी प्रकार सभी चारों युगोंकी स्थिति बनती है। चारों युगोंकी एक आवृत्तिका जो एक हजार गुना है; वही ब्रह्माजीका एक दिन कहा गया है और उतनी ही बड़ी उनकी एक रात कही जाती है॥ ८६ १/२॥ |
| ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता।<br>अनार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात्॥ ८७ | ज्यों-ज्यों युगका क्षय होता है, प्राणियोंमें जड़ता-भाव तथा स्वभावकी सरलताका अभाव बढ़ता जाता है। यही सभी युगोंका लक्षण कहा गया है॥ ८७ १/२॥ |
| एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम्।<br>एषां चतुर्युगाणां च गुणिता ह्येकसप्ततिः॥ ८८<br>क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरन्तरमुच्यते।<br>चतुर्युगे यथैकस्मिन् भवतीह यदा तु यत्॥ ८९ | क्रमसे एक चतुर्युगका इकहत्तर (७१ ६/१४) बार आवर्तन एक मन्वन्तर कहा जाता है। जो व्यवहार इस चतुर्युगमें घटित होता है, वही क्रमशः दूसरे चतुर्युगोंमें भी होता है॥ ८८-८९ १/२॥ |
| तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वै यथाक्रमम्।<br>सर्गे सर्गे यथा भेदा उत्पद्यन्ते तथैव तु॥ ९०<br>पञ्चविंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकास्तथा।<br>तथा कल्पा युगैः सार्धं भवन्ति सह लक्षणैः॥ ९१ | प्रत्येक सर्गमें पचीस प्रकारके भेदोंवाले जो तत्त्व होते |
| १८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मन्वन्तराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम्॥ ९२ । <br><br> यथा युगानां परिवर्तनानि <br> चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात्। <br> तथा तु सन्तिष्ठति जीवलोकः <br> क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः॥ ९३ | हैं; वे ही जैसे सदा उत्पन्न होते हैं और इससे कम या अधिक नहीं। उसी प्रकार युगोंके साथ-साथ लक्षणोंसहित कल्प भी होते हैं। सभी मन्वन्तरोंका भी यही लक्षण है॥ ९०–९२॥ <br> युगोंके स्वभावके अनुसार जिस प्रकार चिरकालसे प्रवृत्त होनेवाले युगोंमें परिवर्तन होता है, उसी प्रकार युगोंके अनुरूप क्षय तथा उदयसे यह जीवलोक भी संस्थित रहता है और इसमें भी युगोंके अनुरूप परिवर्तन होता रहता है॥ ९३॥ | | इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः। <br> अतीतानागतानां हि सर्वमन्वन्तरेषु वै॥ ९४ | इस प्रकार सभी मन्वन्तरोंमें बीते हुए तथा आनेवाले युगोंके लक्षण संक्षेपमें कहे गये हैं॥ ९४॥ | | मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च। <br> व्याख्यातानि न सन्देहः कल्पः कल्पेन चैव हि॥ ९५ | इसी तरह एक मन्वन्तरसे सभी मन्वन्तरोंकी व्याख्या की गयी है। एक कल्पके लक्षणोंसे सभी कल्पोंके लक्षण समझ लेना चाहिये। इस विषयमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है॥ ९५॥ | | अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता। <br> मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह॥ ९६ | उसी भाँति ज्ञानी पुरुषको इस लोकमें बीते हुए तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें कल्पना कर लेनी चाहिये॥ ९६॥ | | तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवन्त्युत। <br> देवा ह्यष्टविधा ये च ये च मन्वन्तरेश्वराः॥ ९७ <br><br> ऋषयो मनवश्चैव सर्वे तुल्यप्रयोजनाः। <br> एवं वर्णाश्रमाणां तु प्रविभागो युगे युगे॥ ९८ | जो आठ प्रकारके देवता*, मन्वन्तरोंके स्वामी, ऋषिगण, मनुगण आदि हैं, वे सब तुल्य अभिमान-नाम-रूपवाले हुआ करते हैं; साथ ही उन सभीका समान प्रकारका प्रयोजन भी होता है॥ ९७½॥ | | युगस्वभावश्च तथा विधत्ते वै तदा प्रभुः। <br> वर्णाश्रमविभागांश्च युगानि युगसिद्धयः॥ ९९ <br><br> युगानां परिमाणं ते कथितं हि प्रसङ्गतः। <br> वदामि देवि पुत्रत्वं पद्मयोनेः समासतः॥ १०० | इस प्रकार मैंने युग, उनके धर्म, वर्णाश्रमोंके विभाग, युगोंकी सिद्धियाँ, युगोंके परिमाण जिन्हें युग-युगमें परमात्मा धारण करते हैं—इन सबके विषयमें आपसे प्रसंगके अनुसार कह दिया। अब मैं आपसे पद्मयोन ब्रह्माजीके देवीके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेके विषयमें संक्षेपमें कह रहा हूँ॥ ९८–१००॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुर्युगपरिमाणं नाम चत्वारिंश्शोऽध्यायः ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'चतुर्युगपरिमाण' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४०॥
* यहाँ गणदेवताओंका वर्ग आठ प्रकारका बताया गया है, किंतु अमरकोष (१।१।१०) तथा वाचस्पतिकोषमें गणदेवताओंके नौ वर्ग कहे गये हैं और एक-एक वर्गमें परिगणित देवताओंकी संख्याको इस प्रकार बताया गया है—
आदित्या द्वादशप्रोक्ता विश्वेदेवा दशस्मृताः। वसवश्चाष्ट संख्याताः षट्त्रिंशत् तुषिता मताः॥
आभास्वराश्चतुष्षष्टिर्वाताः पञ्चाशदूनकाः। महाराजिकानामानो द्वे शते विंशतिस्तथा॥
साध्या द्वादशविख्याता रुद्राश्चैकादशस्मृताः।
अर्थात् आदित्य १२, विश्वेदेव १०, वसु ८, तुषित ३६, आभास्वर ६४, मरुत् ४९, महाराजिक २२०, साध्य १२ और रुद्र ११ होते हैं।
४१- विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा ब्रह्माद्वारा महेश्वरकी नामाष्टकस्तुतिका वर्णन
अध्याय ४१ ] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८५
इकतालीसवाँ अध्याय
विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा ब्रह्माद्वारा महेश्वरकी नामाष्टकस्तुतिका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्र उवाच<br>पुनः ससर्ज भगवान् प्रभ्रष्टाः पूर्ववत्प्रजाः।<br>सहस्रयुगपर्यन्ते प्रभाते तु पितामहः॥ १<br><br>एवं परार्धे विप्रेन्द्र द्विगुणे तु तथा गते।<br>तदा धराम्भसि व्याप्ता ह्यापो वह्नौ समीरणे॥ २<br><br>वह्निः समीरणश्चैव व्योम्नि तन्मात्रसंयुतः।<br>इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्राणि द्विजोत्तम॥ ३<br><br>अहङ्कारमनुप्राप्य प्रलीनास्तत्क्षणादहो।<br>अभिमानस्तदा तत्र महान्तं व्याप्य वै क्षणात्॥ ४<br><br>महानपि तथा व्यक्तं प्राप्य लीनोऽभवद् द्विज।<br>अव्यक्तं स्वगुणैः सार्धं प्रलीनमभवद्द्भवे॥ ५<br><br>ततः सृष्टिर्भूतस्मात्पूर्ववत्पुरुषाच्छिवात्। | इन्द्र बोले—तत्पश्चात् एक हजार चतुर्युगीके व्यतीत हो जानेपर प्रभात वेलामें भगवान् ब्रह्माने नष्ट हुई प्रजाओंका पुनः पूर्ववत् सृजन किया। हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार ब्रह्माके परार्धका दूना समय बीत जानेपर पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें और वायु आकाशमें अपनी-अपनी तन्मात्रासहित व्याप्त हो गये। हे द्विजश्रेष्ठ! दसों इन्द्रियाँ, मन तथा तन्मात्राएँ अहंकारको प्राप्तकर तत्क्षण उसीमें विलीन हो गयीं। अहंकार उस महत्को व्याप्त करके एवं महत् भी अव्यक्तको व्याप्त करके उसी क्षण उनमें विलीन हो गया। हे द्विज! अव्यक्त भी अपने गुणोंके साथ महेश्वरमें समाहित हो गया। इसके अनन्तर उन्हीं परम पुरुष शिवसे पूर्वकी भाँति सृष्टि होने लगी॥ १-५ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| अथ सृष्टास्तदा तस्य मनसा तेन मानसाः॥ ६<br><br>न व्यवर्धन्त लोकेऽस्मिन् प्रजाः कमलयोनिना।<br>वृद्ध्यर्थं भगवान् ब्रह्मा पुत्रैर्वै मानसैः सह॥ ७<br><br>दुश्चरं विचचारेशं समुद्दिश्य तपः स्वयम्।<br>तुष्टस्तु तपसा तस्य भवो ज्ञात्वा स वाञ्छितम्॥ ८<br><br>ललाटमध्यं निर्भिद्य ब्रह्मणः पुरुषस्य तु।<br>पुत्रस्नेहमिति प्रोच्य स्त्रीपुंरूपोऽभवत्तदा॥ ९ | एतदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजीने अपने मनसे मानस पुत्रोंका सृजन किया। इस लोकमें जब प्रजाओंकी वृद्धि न हो सकी, तब प्रजा-वृद्धिके लिये स्वयं भगवान् ब्रह्मा अपने मानस पुत्रोंके साथ महेश्वरके निमित्त कठोर तप करने लगे। तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर वे महेश्वर शिव उनकी कामना समझकर उन पुरुषरूप ब्रह्माके ललाटके मध्य-भागका भेदन करके ‘मैं आपका पुत्र हूँ’—ऐसा कहकर स्त्री-पुरुषरूपमें प्रकट हो गये। |
| तस्य पुत्रो महादेवो ह्यर्धनारीश्वरोऽभवत्।<br>ददाह भगवान् सर्वं ब्रह्माणं च जगद्गुरुम्॥ १० | उनके पुत्र वे |
| १८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महादेव अर्धनारीश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित हुए। तब उन्होंने जगद्गुरु ब्रह्मसहित सब कुछ दग्ध कर दिया॥ ६-१०॥ | |
| अथार्धमात्रां कल्याणीमात्मनः परमेश्वरीम्।<br>बुभुजे योगमार्गेण वृद्ध्यर्थं जगतां शिवः॥ ११<br><br>तस्यां हरिं च ब्रह्माणं ससर्ज परमेश्वरः।<br>विश्वेश्वरस्तु विश्वात्मा चास्त्रं पाशुपतं तथा॥ १२<br><br>तस्माद् ब्रह्मा महादेव्याश्चांशजश्च हरिस्तथा।<br>अण्डजः पद्मजश्चैव भवाङ्गभव एव च॥ १३<br><br>एतत्त्ते कथितं सर्वमितिहासं पुरातनम्।<br>परार्धं ब्रह्मणो यावत्तावद्भूतिः समासतः॥ १४ | इसके बाद शिवजीने समग्र जगत्की वृद्धिके लिये योगमार्गके द्वारा कल्याणमयी अर्धमात्रास्वरूपिणी अपनी अर्धांगिनी परमेश्वरीके साथ संसर्ग किया। विश्वेश्वर विश्वात्मा परमेश्वर शिवने उन परमेश्वरीसे विष्णु, ब्रह्मा और पाशुपत अस्त्रका सृजन किया। इसीलिये ब्रह्मा तथा विष्णुको महादेवीके अंशसे उत्पन्न कहा गया है और उन ब्रह्माको अण्डज, पद्मज और भवांगभव भी कहा जाता है। मैंने आपसे यह सम्पूर्ण पुरातन इतिहास कह दिया। जबतक ब्रह्माका परार्ध रहता है, तबतकके उनके ऐश्वर्य तथा तमोगुणसे प्रादुर्भूत उनके वैराग्यके विषयमें मैं संक्षेपमें कहूँगा॥ ११-१४ १/२॥ |
| वैराग्यं ब्रह्मणो वक्ष्ये तमोद्भूतं समासतः।<br>नारायणोऽपि भगवान् द्विधा कृत्वात्मनस्तनुम्॥ १५<br><br>ससर्ज सकलं तस्मात्स्वाङ्गादेव चराचरम्।<br>ततो ब्रह्माणमसृजद् ब्रह्मा रुद्रं पितामहः॥ १६<br><br>मुने कल्पान्तरे रुद्रो हरिं ब्रह्माणमीश्वरम्।<br>ततो ब्रह्माणमसृजन्मुने कल्पान्तरे हरिः॥ १७<br><br>नारायणं पुनर्ब्रह्मा ब्रह्माणं च पुनर्भवः।<br>तदा विचार्य वै ब्रह्मा दुःखं संसार इत्यजः॥ १८<br><br>सर्गं विसृज्य चात्मानमात्मन्येव नियोज्य च।<br>संहृत्य प्राणसञ्चारं पाषाण इव निश्चलः॥ १९ | भगवान् नारायणने भी अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त करके अपने उसी अंगसे सम्पूर्ण चराचरकी सृष्टि की। तब उन्होंने ब्रह्माका सृजन किया और पितामह ब्रह्माने रुद्रका सृजन किया। हे मुने! दूसरे कल्पमें रुद्रने विष्णु, ब्रह्मा और ईश्वर (शिव)-को उत्पन्न किया। हे मुने! तदनन्तर दूसरे कल्पमें हरि (विष्णु)-ने ब्रह्माका सृजन किया। पुनः [दूसरे कल्पमें] ब्रह्माने नारायणको और फिर भव (रुद्र)-ने ब्रह्माकी सृष्टि की। तत्पश्चात् अजन्मा भगवान् ब्रह्मा 'यह संसार दुःखरूप है'—ऐसा सोचकर सृष्टिकार्य छोड़ करके अपनेको आत्मतत्त्वमें अवस्थितकर प्राण-संचारको निरुद्ध करके पाषाणकी भाँति अचल होकर दस हजार वर्षोंतक समाधिमें स्थित रहे॥ १५-१९ १/२॥ |
| दशवर्षसहस्राणि समाधिस्थोऽभवत्प्रभुः।<br>अधोमुखं तु यत्पद्मं हृदि संस्थं सुशोभनम्॥ २०<br><br>पूरितं पूरकेणैव प्रबुद्धं चाभवत्तदा।<br>तदूर्ध्ववक्त्रमभवत्कुम्भकेन निरोधितम्॥ २१<br><br>तत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थापयामास चेश्वरम्।<br>तदोमिति शिवं देवमर्धमात्रापरं परम्॥ २२<br><br>मृणालत्तन्तुभागैकशतभागे व्यवस्थितम्।<br>यमी यमविशुद्धात्मा नियम्यैवं हृदीश्वरम्॥ २३ | तब उनके हृदयमें जो नीचेकी ओर मुखवाला सुन्दर कमल विराजमान था, वह पूरक प्राणायामद्वारा वायुपूरित होकर विकसित हो उठा और पुनः कुम्भक प्राणायामद्वारा वायुनिरुद्ध होकर ऊर्ध्वमुखवाला हो गया। तब उन्होंने परमेश्वरको उसी कमलकी कर्णिकाके मध्यमें स्थापित कर दिया। तदनन्तर आत्मनियन्त्रण करनेवाले, संयमके द्वारा विशुद्ध आत्मावाले तथा पूजनके योग्य ब्रह्माने ओंकार शब्दसे सम्बन्ध रखनेवाली अर्धमात्रासे परे जो नाद है, उससे भी परे ब्रह्मसंज्ञक नादस्वरूप, मृणाल-तन्तुके शतभागके एक भागमें अवस्थित परम सूक्ष्म पीतवर्ण अग्निशिखा- |
अध्याय ४१] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य... नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यमपुष्पादिभिः पूज्यं याज्यं ह्याजयदव्ययम्।<br>तस्य हृत्कमलस्थस्य नियोगाच्चांशजो विभुः॥ २४<br>ललाटमस्य निर्भिद्य प्रादुरासीत्पितामहात्।<br>लोहितोऽभूत्स्वयं नीलः शिवस्य हृदयोद्भवः॥ २५<br>वह्नेश्चैव तु संयोगात्प्रकृत्या पुरुषः प्रभुः।<br>नीलश्च लोहितश्चैव यतः कालाकृतिः पुमान्॥ २६<br>नीललोहित इत्युक्तस्तेन देवेन वै प्रभुः।<br>ब्रह्मणा भगवान् कालः प्रीतात्मा चाभवद्विभुः॥ २७<br>सुप्रीतमनसं देवं तुष्टाव च पितामहः।<br>नामाष्टकेन विश्वात्मा विश्वात्मानं महामुने॥ २८ | सदृश, यम-नियम आदि योगांग पुष्पोंके द्वारा पूजनीय तथा अविनाशी ईश्वरको अपने हृदयमें ध्यानावस्थित करके उनकी पूजा की॥ २०—२३ १/२॥<br><br>तब हृदयकमलमें विराजमान रहनेवाले उन ब्रह्माके अंशसे जायमान सर्वव्यापी रुद्र उनके ललाटका भेदन करके पितामहसे उत्पन्न हुए। शिवके हृदयसे प्रादुर्भूत पुरुष रुद्र स्वभावतः स्वयं नील होते हुए भी अग्निके संयोगके कारण लोहित (रक्त) वर्णके हो गये। चूँकि वे कालाकृति पुरुष रुद्र नील और लोहित वर्णके हुए, अतः वे ब्रह्मदेव प्रभु रुद्रको 'नीललोहित'—ऐसा कहने लगे। कालरूप भगवान् रुद्र ब्रह्माजीसे अत्यन्त प्रसन्न हुए। हे महामुने! तदनन्तर विश्वात्मा पितामह ब्रह्मा नामाष्टक स्तोत्रसे प्रसन्नचित्त विश्वात्मा भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे॥ २४—२८॥ |
| पितामह उवाच<br>नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे।<br>नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयाय ते॥ २९<br>शर्वाय क्षितिरूपाय सदा सुरभिणे नमः।<br>ईशाय वायवे तुभ्यं संस्पर्शाय नमो नमः॥ ३०<br>पशूनां पतये चैव पावकायातितेजसे।<br>भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः॥ ३१<br>महादेवाय सोमाय अमृताय नमोऽस्तु ते।<br>उग्राय यजमानाय नमस्ते कर्मयोगिने॥ ३२<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि पैतामहमिमं स्तवम्।<br>रुद्राय कथितं विप्रान् श्रावयेद्वा समाहितः॥ ३३<br>अष्टमूर्तेस्तु सायुज्यं वर्षादेकादवाप्नुयात्।<br>एवं स्तुत्वा महादेवमवैक्षत पितामहः॥ ३४ | **पितामह बोले—**हे भगवन्! हे रुद्र! हे भास्कर! अमित तेजस्वी आपको नमस्कार है; अम्बुमय तथा रस-स्वरूप आप भगवान् भवको नमस्कार है। गन्धमय पृथिवीरूप शर्वको नित्य नमस्कार है; स्पर्शगुणयुक्त वायुरूप ईशको बार-बार नमस्कार है। अमित तेजस्वी अग्नि-रूप पशुपतिको नमस्कार है। शब्दतन्मात्रावाले व्योमरूप आप भीमको नमस्कार है। आप अमृतमय चन्द्रस्वरूप महादेवको नमस्कार है; आप कर्मयोगी यजमानरूप उग्रको नमस्कार है। जो मनुष्य समाहितचित्त होकर पितामह ब्रह्माके द्वारा रुद्रके लिये कहे गये इस स्तोत्रका पाठ करता है या श्रवण करता है अथवा विप्रोंको सुनाता है, वह एक वर्षमें ही अष्टमूर्ति भगवान् रुद्रका सायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ २९—३३ १/२॥ |
| तदाष्टधा महादेवः समातिष्ठत्समन्ततः।<br>तदा प्रकाशते भानुः कृष्णवर्त्मा निशाकरः॥ ३५<br>क्षितिर्वायुः पुमानम्भः सुशिरं सर्वगं तथा।<br>तदाप्रभृति तं प्राहुरष्टमूर्तिरितीश्वरम्॥ ३६ | इस प्रकार स्तुति करके जब पितामहने महादेवकी ओर देखा, तब वे सभी ओर आठ प्रकारसे विभक्त होकर सुशोभित होने लगे। उसी समयसे सूर्य, चन्द्र, अग्नि प्रकाश करने लगे और पृथिवी, वायु, यजमानरूप पुरुष, जल तथा सर्वव्यापी गगन अपने-अपने गुणधर्मसे समन्वित हुए। उसी समयसे लोग उन ईश्वरको 'अष्टमूर्ति' इस नामसे कहने लगे॥ ३४—३६॥ |
| अष्टमूर्तेः प्रसादेन विरञ्चिश्चासृजत्पुनः।<br>सृष्ट्वैतदखिलं ब्रह्मा पुनः कल्पान्तरे प्रभुः॥ ३७<br>सहस्रयुगपर्यन्तं संसुप्ते च चराचरे।<br>प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तत उग्रं तपो महत्॥ ३८ | उन्हीं अष्टमूर्तिके अनुग्रहसे ब्रह्माजी पुनः सृष्टि करने लगे। इस सम्पूर्ण जगत्का सृजन करके पुनः दूसरे कल्पमें हजार युगपर्यन्त चराचर संसारके सुप्त रहनेपर |
| १८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| भगवान् ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टि करनेके विचारसे अत्यन्त उग्र तप आरम्भ कर दिया ॥ ३७-३८ ॥ | |
| तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित्समवर्तत ।<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो व्यजायत ॥ ३९<br>क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ।<br>ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तदाभवन् ॥ ४० | इस प्रकार तप करते हुए उन ब्रह्माको जब कोई सफलता प्राप्त न हुई; तब दीर्घकालतक तप करनेसे उत्पन्न दुःखके कारण उन्हें क्रोध आ गया। तब क्रोधाविष्ट उन ब्रह्माके नेत्रोंसे अश्रुबिन्दु गिरने लगे। तदनन्तर उन अश्रुबिन्दुओंसे भूत-प्रेत प्रादुर्भूत हो गये ॥ ३९-४० ॥ |
| सर्वांस्तानग्रजान् दृष्ट्वा भूतप्रेतनिशाचरान् ।<br>अनिन्दत तदा देवो ब्रह्मात्मानमजो विभुः ॥ ४१<br>जहौ प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः । | तब उन सभी भूत-प्रेत-निशाचरोंको पहले उत्पन्न हुआ देखकर अजन्मा तथा परम ऐश्वर्यशाली भगवान् ब्रह्मा अपनेको कोसने लगे। इससे उन भगवान् पितामहने कोपाविष्ट होकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ ४१ १/२ ॥ |
| ततः प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत्प्रभोर्मुखात् ॥ ४२<br>अर्धनारीश्वरो भूत्वा बालार्कसदृशद्युतिः ।<br>तदैकादशधात्मानं प्रविभज्य व्यवस्थितः ॥ ४३<br>अर्धेनांशेन सर्वात्मा ससर्जासौ शिवामुमाम् । | तत्पश्चात् उन प्रभुके मुखसे उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिवाले अर्धनारीश्वरके रूपमें होकर प्राणमय रुद्र प्रकट हुए। तब वे अपनेको ग्यारह स्वरूपोंमें* विभक्त करके व्यवस्थित हो गये। उन सर्वात्मा रुद्रने अपने आधे अंशसे कल्याणकारिणी उमाको आविर्भूत किया ॥ ४२-४३ १/२ ॥ |
| सा चासृजत्तदा लक्ष्मीं दुर्गां श्रेष्ठां सरस्वतीम् ॥ ४४<br>वामां रौद्रीं महामायां वैष्णवीं वारिजेक्षणाम् ।<br>कलां विकरिणीं चैव कालीं कमलवासिनीम् ॥ ४५<br>बलविकरिणीं देवीं बलप्रमथिनीं तथा ।<br>सर्वभूतस्य दमनीं ससृजे च मनोन्मनीम् ॥ ४६<br>तथान्या बहवः सृष्टास्तया नार्यः सहस्रशः । | तत्पश्चात् उमाने लक्ष्मी, दुर्गा तथा श्रेष्ठ सरस्वतीका सृजन किया; पुनः उन्होंने वामा, रौद्री, महामाया, कमलके समान नेत्रोंवाली वैष्णवी, कल-विकरिणी, काली, कमल-वासिनी, बलविकरिणी, देवी बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनीका सृजन किया। इसी प्रकार उन्होंने अन्य बहुत-सी हजारों नारियोंकी सृष्टि की ॥ ४४-४६ १/२ ॥ |
| रुद्रैश्चैव महादेवस्ताभिस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ४७<br>सर्वात्मनश्च तस्याग्रे ह्यतिष्ठत्परमेश्वरः ।<br>मृतस्य तस्य देवस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥ ४८<br>घृणी ददौ पुनः प्राणान् ब्रह्मपुत्रो महेश्वरः ।<br>ब्रह्मणः प्रददौ प्राणानात्मस्थांस्तु तदा प्रभुः ॥ ४९<br>प्रहृष्टोऽभूत्ततो रुद्रः किञ्चित्प्रत्यागतासवम् ।<br>अभ्यभाषत देवेशो ब्रह्माणं परमं वचः ॥ ५०<br>मा भैर्देव महाभाग विरिञ्च जगतां गुरो ।<br>मयेह स्थापिताः प्राणास्तस्मादुत्तिष्ठ वै प्रभो ॥ ५१ | तब तीनों लोकोंके स्वामी परमेश्वर महादेव समस्त रुद्रों तथा उन देवियोंके साथ उन सर्वात्मा ब्रह्माके समक्ष खड़े हो गये। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र दयालु महेश्वर शिवने उन मरे हुए परमेष्ठी भगवान् ब्रह्माको पुनः प्राण प्रदान कर दिये। जब प्रभु शिवने ब्रह्मामें आत्मस्थित प्राणोंका संचार किया, तब उन्हें कुछ-कुछ चेतनायुक्त देखकर भगवान् रुद्र अत्यन्त प्रसन्न हुए। इसके बाद देवेश्वर शिवने ब्रह्माजीसे यह श्रेष्ठ वचन कहा—हे देव! डरिये मत! हे महाभाग! हे विरिञ्च! हे जगद्गुरो! मैंने आपमें प्राण स्थापित कर दिये हैं; अतः हे प्रभो! अब उठिये ॥ ४७-५१ ॥ |
* भगवान् रुद्रके ग्यारह नामोंका वर्णन विभिन्न पुराणोंमें आया है, किंतु नामोंमें अन्तर है, लिङ्गपुराण पूर्वभाग अ० ६३में ११ रुद्रोंके नाम इस प्रकार बताये गये हैं—अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित।
अध्याय ४१ ] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य...नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा वचस्ततस्तस्य स्वप्नभूतं मनोगतम्।<br>पितामहः प्रसन्नात्मा नेत्रैः फुल्लाम्बुजप्रभैः॥ ५२<br>ततः प्रत्यागतप्राणः समुदैक्षन्महेश्वरम्।<br>स उद्वीक्ष्य चिरं कालं स्निग्धगम्भीरया गिरा॥ ५३<br>उवाच भगवान् ब्रह्मा समुत्थाय कृताञ्जलिः।<br>भो भो वद महाभाग आनन्दयसि मे मनः॥ ५४<br>को भवानष्टमूर्तिर्वै स्थित एकादशात्मकः। | तब उनका स्वप्नभूत मनोगत वचन सुनकर पितामह प्रसन्नचित्त हो गये। तदनन्तर लब्धप्राण ब्रह्माजीने अपने खिले हुए कमलके समान नेत्रोंसे महेश्वरको देखा। बहुत समयतक उन्हें देखते रहनेके पश्चात् भगवान् ब्रह्माने उठ करके दोनों हाथ जोड़कर स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीमें उनसे कहा—हे महाभाग! आप मेरे मनको आनन्दित कर रहे हैं; एकादश रूपोंमें प्रतिष्ठित अष्टमूर्ति आप कौन हैं?॥ ५२—५४ १/२ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा व्याजहार महेश्वरः॥ ५५<br>स्पृशन् कराभ्यां ब्रह्माणं सुखाभ्यां स सुरारिहा। | **इन्द्र बोले—**उनका वचन सुनकर देवशत्रुओंका संहार करनेवाले महेश्वर अपने सुखप्रद हाथोंसे ब्रह्माजीका स्पर्श करते हुए उनसे कहने लगे॥ ५५ १/२ ॥ |
| श्रीशङ्कर उवाच<br>मां विद्धि परमात्मानमेनां मायामजामिति॥ ५६<br>एते वै संस्थिता रुद्रास्त्वां रक्षितुमिहागताः। | **श्रीशंकर बोले—**मुझे परमात्मा तथा इन्हें अजन्मा माया समझिये और सामने खड़े ये रुद्र आपकी रक्षा करनेके लिये यहाँ आये हैं॥ ५६ १/२ ॥ |
| ततः प्रणम्य तं ब्रह्मा देवदेवमुवाच ह॥ ५७<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा हर्षगद्गदया गिरा।<br>भगवन् देवदेवेश दुःखैराकुलितो ह्यहम्॥ ५८<br>संसारान्मोक्तुमीशान मामिहार्हसि शङ्कर।<br>ततः प्रहस्य भगवान् पितामहमुमापतिः॥ ५९<br>तदा रुद्रैर्जगन्नाथस्तया चान्तर्दधे विभुः। | तदनन्तर उन देवाधिदेवको प्रणाम करके ब्रह्माने हाथ जोड़कर हर्षपूर्ण गद्गद वाणीमें कहा—हे भगवन्! हे देवदेवेश! मैं दुःखोंसे अत्यन्त व्याकुल हूँ। हे ईशान! हे शंकर! मुझे इस संसारसे मुक्त करनेमें आप समर्थ हैं॥ ५७-५८ १/२ ॥<br>तत्पश्चात् पितामह ब्रह्माकी इस बातपर हँसकर सर्व-व्यापी तथा जगत्के स्वामी उमापति भगवान् शिव रुद्रों एवं उन भगवती उमाके साथ अन्तर्धान हो गये॥ ५९ १/२ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>तस्माच्छिलाद लोकेषु दुर्लभो वै त्वयोनिजः॥ ६०<br>मृत्युहीनः पुमान् विद्धि समृत्युः पद्मजोऽपि सः।<br>किन्तु देवेश्वरो रुद्रः प्रसीदति यदीश्वरः॥ ६१<br>न दुर्लभो मृत्युहीनस्तव पुत्रो ह्ययोनिजः।<br>मया च विष्णुना चैव ब्रह्मणा च महात्मना॥ ६२<br>अयोनिजं मृत्युहीनमसमर्थं निवेदितुम्। | **इन्द्र बोले—**हे शिलाद! अतः समस्त लोकोंमें अयोनिज तथा मृत्युरहित पुरुष सर्वथा दुर्लभ है। [यहाँतक कि] वे पद्मयोनि ब्रह्मा भी मृत्युयुक्त हैं—ऐसा जानिये। किंतु यदि देवेश्वर भगवान् रुद्र प्रसन्न हो जायें, तो आपके लिये मृत्युरहित तथा अयोनिज पुत्र दुर्लभ नहीं है। मैं, विष्णु एवं महात्मा ब्रह्मा भी मृत्युहीन तथा अयोनिज पुत्र देनेमें असमर्थ हैं॥ ६०—६२ १/२ ॥ |
| शैलादिरुवाच<br>एवं व्याहृत्य विप्रेन्द्रमनुगृह्य च तं घृणी॥ ६३<br>देवैर्वृतो ययौ देवः सितेनेभेन वै प्रभुः॥ ६४ | **शैलादि बोले—**इस प्रकार विप्रेन्द्रसे कहकर तथा उनपर अनुग्रह करके वे दयालु इन्द्र देवताओंके साथ श्वेतवर्णवाले ऐरावतपर आरूढ़ होकर चले गये॥ ६३-६४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे इन्द्रवाक्यं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'इन्द्रवाक्य' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१ ॥
४२- शिलादद्वारा तप करनेसे भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे उनके पुत्रके रूपमें प्रकट होना और शिलादद्वारा नन्दिकेश्वर शिवकी स्तुति
| १९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
बयालीसवाँ अध्याय
शिलादद्वारा तप करनेसे भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे उनके पुत्रके रूपमें प्रकट होना और शिलादद्वारा नन्दिकेश्वर शिवकी स्तुति
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| गते पुण्ये च वरदे सहस्राक्षे शिलाशनः।<br>आराधयन् महादेवं तपसातोषयद्भवम्॥ १ | वर प्रदान करनेवाले पुण्यशाली सहस्रनेत्र इन्द्रके चले जानेपर वे शिलाद महादेव शिवकी आराधना करते हुए तपके द्वारा उन्हें सन्तुष्ट करने लगे॥ १॥ |
| अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य द्विजस्य तु।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु गतं क्षणमिवाद्भुतम्॥ २ | इस प्रकार निरन्तर तपस्यामें संलग्न उन द्विज शिलादके एक हजार दिव्य वर्ष एक क्षणकी भाँति अद्भुतरूपसे व्यतीत हो गये॥ २॥ |
| वल्मीकेनावृताङ्गश्च लक्ष्यः कीटगणैर्मुनिः।<br>वज्रसूचीमुखैश्चान्यै रक्तकीटैश्च सर्वतः॥ ३<br><br>निर्मांसरुधिरत्वग्वै निर्लेपः कुड्यवत्स्थितः।<br>अस्थिशेषोऽभवत्पश्चात्तम्मन्यत शङ्करः॥ ४<br><br>यदा स्पृष्टो मुनिस्तेन करेण च स्मरारिणा।<br>तदैव मुनिशार्दूलश्चोत्ससर्ज क्लमं द्विजः॥ ५ | उनका शरीर वल्मीक (बाँबी)-से ढँक गया, वे मुनि वज्रसूची (वज्र तथा सूईके समान) मुखवाले तथा अन्य रक्तभोजी कीटोंसे लिपटे शरीरवाले परिलक्षित हो रहे थे, वे मांस-रुधिर-त्वचासे विहीन होकर अस्थिमात्र शरीरवाले हो गये थे; फिर भी वे निर्लिप्त भावसे भित्तिकी भाँति निश्चल खड़े थे। तब उन्हें [इस रूपमें तप करते हुए] भगवान् शंकरने जान लिया। [वहाँ प्रकट होकर] कामरिपु शिवने ज्यों ही अपने हाथसे मुनिका स्पर्श किया, त्यों ही मुनिश्रेष्ठ द्विज शिलादका [तपस्याजनित] क्लेश समाप्त हो गया॥ ३–५॥ |
| तपतस्तस्य तपसा प्रभुस्तुष्टोऽथ शङ्करः।<br>तुष्टस्तवेत्यथोवाच सगणश्चोमया सह॥ ६<br><br>तपसानेन किं कार्यं भवतस्ते महामते।<br>ददामि पुत्रं सर्वज्ञं सर्वशास्त्रार्थपारगम्॥ ७ | तदनन्तर तपस्यारत उन मुनिके तपसे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने उनसे कहा—मैं अपने गणों तथा उमासहित आपपर प्रसन्न हूँ। हे महामते! इस तपस्यासे आपका क्या प्रयोजन! मैं आपको सर्वज्ञ तथा समस्त शास्त्रोंके रहस्योंका पारगामी विद्वान् पुत्र प्रदान करता हूँ॥ ६-७॥ |
| ततः प्रणम्य देवेशं स्तुत्वोवाच शिलाशनः।<br>हर्षगद्गदया वाचा सोमं सोमविभूषणम्॥ ८ | तब देवेश शिवको प्रणाम करके और उनकी स्तुति करके शिलादमुनि हर्षपूर्ण गद्गद वाणीमें चन्द्रभूषण शिवसे कहने लगे॥ ८॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्रिपुरार्दन शङ्कर।<br>अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रमिच्छामि सत्तम॥ ९ | **शिलाद बोले—**हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्रिपुरार्दन! हे शंकर! हे सत्तम! मैं अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्र चाहता हूँ॥ ९॥ |
| सूत उवाच<br>पूर्वमाराधितः प्राह तपसा परमेश्वरः।<br>शिलादं ब्रह्मणा रुद्रः प्रीत्या परमया पुनः॥ १० | **सूतजी बोले—**पूर्वमें ब्रह्माजीके द्वारा तपस्यासे आराधित परमेश्वर रुद्रने परम प्रसन्नताके साथ मुनि शिलादसे कहा॥ १०॥ |
अध्याय ४२ ] भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे शिलादपुत्रके रूपमें प्रकट होना १९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीदेवदेव उवाच<br>पूर्वमाराधितो विप्र ब्रह्माणांहं तपोधन।<br>तपसा चावतारार्थं मुनिभिश्च सुरोत्तमैः ॥ ११<br><br>तव पुत्रो भविष्यामि नन्दिनाम्ना त्वयोनिजः।<br>पिता भविष्यसि मम पितुर्वै जगतां मुने ॥ १२ | **श्रीदेवदेव शिव बोले—**हे विप्र! हे तपोधन! मुनियों तथा श्रेष्ठ देवताओंसहित ब्रह्माजीने अवतार ग्रहण करनेके लिये पूर्वकालमें तपस्याके द्वारा मेरी आराधना की थी। अतः मैं नन्दी नामसे तुम्हारे अयोनिज पुत्रके रूपमें जन्म लूँगा। हे मुने! आप मुझ जगत्पिताके भी पिता होंगे॥ ११-१२॥ |
| एवमुक्त्वा मुनिं प्रेक्ष्य प्रणिपत्य स्थितं घृणी।<br>सोमः सोमोपमः प्रीतस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १३ | ऐसा कहकर सम्मुख स्थित मुनिकी ओर प्रेमपूर्वक देखकर उन्हें प्रणाम करके अमृततुल्य भगवान् शिव उमासहित वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १३॥ |
| लब्धपुत्रः पिता रुद्रात्प्रीतो मम महामुने।<br>यज्ञाङ्गणं महत्प्राप्य यज्ञार्थं यज्ञवित्तमः ॥ १४<br><br>तदङ्गणादहं शम्भोस्तनुजस्तस्य चाज्ञया।<br>सञ्जातः पूर्वमेवाहं युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ १५ | हे महामुने! भगवान् रुद्रसे पुत्रप्राप्तिका वरदान पाकर यज्ञविदोंमें श्रेष्ठ मेरे पिताजी यज्ञ करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक विशाल यज्ञशालामें पहुँचे; तब मैं पूर्व ही भगवान् रुद्रकी आज्ञासे उनके पुत्रके रूपमें उस अंगणमें प्रादुर्भूत हो गया, उस समय मैं प्रलयाग्निके समान प्रभासे समन्वित था॥ १४-१५॥ |
| ववर्षुस्तदा पुष्करावर्तकाद्या<br>जगुः खेचराः किन्नराः सिद्धसाध्याः।<br>शिलादात्मजत्वं गते मय्युपेन्द्रः<br>ससर्जाथ वृष्टिं सुपुष्पौघमिश्राम् ॥ १६ | उस समय शिलादमुनिके पुत्ररूपमें मेरे आविर्भूत होनेपर पुष्कर, आवर्तक आदि मेघ बरसने लगे; किन्नर, सिद्ध, साध्य आदि गगनचारी देवतागण गान करने लगे और इन्द्र पुष्पराशिमिश्रित वृष्टि करने लगे॥ १६॥ |
| मां दृष्ट्वा कालसूर्याभं जटामुकुटधारिणम्।<br>त्र्यक्षं चतुर्भुजं बालं शूलटङ्कगदाधरम् ॥ १७<br><br>वज्रिणं वज्रदंष्ट्रं च वज्रिणाराधितं शिशुम्।<br>वज्रकुण्डलिनं घोरं नीरदोपमनिःस्वनम् ॥ १८<br><br>ब्रह्माद्यास्तुष्टुवुः सर्वे सुरेन्द्रश्च मुनीश्वराः।<br>नेदुः समन्ततः सर्वे ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १९ | उस समय कालसूर्यके समान आभावाले, जटा-मुकुट धारण किये, तीन नेत्रोंसे युक्त, चार भुजाओंवाले, हाथोंमें शूल-टंक-गदा धारण करनेवाले, वज्र लिये हुए, हीरेके सदृश उज्ज्वल दाँतोंवाले, इन्द्रके द्वारा आराधित, कानोंमें हीरेका कुण्डल धारण किये हुए, घोर विग्रहवाले तथा मेघसदृश गम्भीर ध्वनिसे सम्पन्न मुझ बाल-शिशुको देखकर ब्रह्मा आदि, इन्द्र तथा सभी मुनीश्वर स्तुति करने लगे और सभी अप्सराएँ चारों ओरसे वाद्ययन्त्र बजाने लगीं तथा नृत्य करने लगीं ॥ १७-१९॥ |
| ऋषयो मुनिशार्दूल ऋग्यजुःसामसम्भवैः।<br>मन्त्रैर्माहेश्वरैः स्तुत्वा सम्प्रणेमुर्मुदान्विताः ॥ २० | हे मुनिश्रेष्ठ! ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदके माहेश्वर मन्त्रोंके द्वारा आनन्दपूर्वक मेरी स्तुति करके ऋषियोंने मुझे प्रणाम किया॥ २०॥ |
| ब्रह्मा हरिश्च रुद्रश्च शक्रः साक्षाच्छिवाम्बिका।<br>जीवश्चेन्दुर्महातेजा भास्करः पवनोऽनलः ॥ २१<br><br>ईशानो निर्ऋतिर्यक्षो यमो वरुण एव च।<br>विश्वेदेवास्तथा रुद्रा वसवश्च महाबलाः ॥ २२ | ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, साक्षात् अम्बिका शिवा, देवगुरु बृहस्पति, चन्द्रमा, महातेजस्वी सूर्य, वायु, अग्नि, ईशान, निर्ऋति, यक्ष, यम, वरुण, विश्वेदेव, |
| १९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| लक्ष्मीः साक्षाच्छची ज्येष्ठा देवी चैव सरस्वती।<br>अदितिश्च दितिश्चैव श्रद्धा लज्जा धृतिस्तथा॥ २३<br>नन्दा भद्रा च सुरभी सुशीला सुमनास्तथा।<br>वृषेन्द्रश्च महातेजा धर्मो धर्मात्मजस्तथा॥ २४<br>आवृत्य मां तथालिङ्ग्य तुष्टुवुर्मुनिसत्तम।<br>शिलादोऽपि मुनिर्दृष्ट्वा पिता मे तादृशं तदा॥ २५<br>प्रीत्या प्रणम्य पुण्यात्मा तुष्टावेष्टप्रदं सुतम्। | सभी रुद्र, महाबली वसुगण, साक्षात् लक्ष्मी, इन्द्राणी, देवी ज्येष्ठा, सरस्वती, अदिति, दिति, श्रद्धा, लज्जा, धृति, नन्दा, भद्रा, सुरभी, सुशीला, सुमना, वृषेन्द्र, महातेजस्वी धर्म तथा धर्मपुत्र मुझे घेरकर मेरा आलिङ्गन करके मेरी स्तुति करने लगे। हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय पुण्य आत्मावाले मेरे पिता मुनि शिलाद भी उस प्रकारके रूपवाले इष्टप्रद पुत्रको देखकर प्रेमपूर्वक प्रणाम करके मेरी स्तुति करने लगे॥ २१-२५ १/२॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्र्यम्बक ममाव्यय॥ २६<br>पुत्रोऽसि जगतां यस्मात्त्राता दुःखाद्वि किं पुनः।<br>रक्षको जगतां यस्मात्पिता मे पुत्र सर्वग॥ २७<br>अयोनिज नमस्तुभ्यं जगद्योने पितामह।<br>पिता पुत्र महेशान जगतां च जगद्गुरो॥ २८<br>वत्स वत्स महाभाग पाहि मां परमेश्वर।<br>त्वयाहं नन्दितो यस्मान्नन्दी नाम्ना सुरेश्वर॥ २९ | **शिलाद बोले—**हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्र्यम्बक! हे अव्यय! आप मेरे पुत्र हैं और जगत्के रक्षक हैं, अतः अब मुझे दुःख किस बातका! हे पुत्र! हे सर्वग (सर्वव्यापी)! आप जगत्के रक्षक हैं, अतः मेरे भी पिता हैं। हे अयोनिज! आपको नमस्कार है। हे जगद्योने! हे पितामह! हे पुत्र! हे महेशान! हे जगद्गुरो! आप जगत्के पिता हैं। हे वत्स! हे वत्स! हे महाभाग! हे परमेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये। हे सुरेश्वर! आपने मुझे आनन्दित किया है, अतः आप ‘नन्दी’ नामसे विख्यात होंगे; हे नन्दिन्! मुझे आनन्द प्रदान कीजिये, मैं आप जगदीश्वरको प्रणाम करता हूँ॥ २६-२९ १/२॥ |
| तस्मान्नन्दय मां नन्दिन्नमामि जगदीश्वरम्।<br>प्रसीद पितरौ मेऽद्य रुद्रलोकं गतौ विभो॥ ३०<br>पितामहाश्च भो नन्दिन्नवतीर्णे महेश्वरे।<br>ममैव सफलं लोके जन्म वै जगतां प्रभो॥ ३१<br>अवतीर्णे सुते नन्दिन् रक्षार्थं महामीश्वर।<br>तुभ्यं नमः सुरेशान नन्दीश्वर नमोऽस्तु ते॥ ३२<br>पुत्र पाहि महाबाहो देवदेव जगद्गुरो।<br>पुत्रत्वमेव नन्दीश मत्वा यत्कीर्तितं मया॥ ३३<br>त्वया तत्क्षम्यतां वत्स स्तवस्तव्य सुरारैः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि मम पुत्र प्रभाषितम्॥ ३४ | हे विभो! आप प्रसन्न होइये। हे नन्दिन्! आप महेश्वरके [मेरे यहाँ] अवतीर्ण होनेपर आज मेरे माता-पिता रुद्रलोक चले गये; पितामह, प्रपितामह आदि भी रुद्रलोक चले गये। हे जगत्प्रभो! मेरे रक्षार्थ पुत्र-रूपमें आपके अवतार लेनेपर आज संसारमें मेरा जन्म सफल हो गया। हे सुरेशान! आपको नमस्कार है। हे नन्दीश्वर! आपको नमस्कार है। हे पुत्र! हे महाबाहो! हे देवदेव! हे जगद्गुरो! मेरी रक्षा कीजिये। हे नन्दीश! देवताओं तथा दानवोंके द्वारा स्तुतियोंसे स्तवनके योग्य हे वत्स! आपके प्रति पुत्रभाव समझकर मैंने जो भी कहा है, उसे आप क्षमा करें। हे पुत्र! जो मेरेद्वारा कहे गये इस स्तवनका भक्तिपूर्वक पाठ या श्रवण करता है अथवा द्विजोंको इसे सुनाता है, वह मेरे साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ३०-३४ १/२॥ |
| श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या मया सार्धं स मोदते।<br>एवं स्तुत्वा सुतं बालं प्रणम्य बहुमानतः॥ ३५ | इस प्रकार बालरूप पुत्र नन्दीकी स्तुति करके अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें प्रणामकर उत्तम व्रत धारण |
४३- शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना, ऋषियोंद्वारा नन्दिकेश्वरकी आयु अल्प बतानेपर शिलादका दुःखी होना तथा नन्दिकेश्वरद्वारा त्र्यम्बकमन्त्रका जप एवं महेश्वर-पार्वतीद्वारा उन्हें अपने पुत्ररूपमें अमर होनेका वरदान देना
अध्याय ४३] शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना १९३
| मुनीश्वरांश्च सम्प्रेक्ष्य शिलादोवाच सुव्रतः।<br>पश्यध्वं मुनयः सर्वे महाभाग्यं ममाव्ययः॥ ३६<br><br>नन्दी यज्ञाङ्गणे देवश्चावतीर्णो यतः प्रभुः।<br>मत्समः कः पुमाँल्लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ३७<br><br>एष नन्दी यतो जातो यज्ञभूमौ हिताय मे॥ ३८ | करनेवाले मुनि शिलाद मुनीश्वरोंकी ओर देखकर बोले—हे मुनिगण! आप सभी लोग मेरे महान् अक्षुण्ण भाग्यको देख लें, जो कि मेरे यज्ञांगणमें अविनाशी भगवान् महेश्वर [मेरे पुत्र होकर] नन्दीके रूपमें अवतरित हुए हैं। सम्पूर्ण जगत्में कौन मनुष्य, देवता अथवा दानव मेरे समान है; क्योंकि मेरे हितार्थ ये नन्दी मेरी यज्ञभूमिमें प्रादुर्भूत हुए हैं॥ ३५—३८॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वरोत्पत्तिर्नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वरोत्पत्ति' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४२॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना, ऋषियोंद्वारा नन्दिकेश्वरकी आयु अल्प बतानेपर शिलादका दुःखी होना तथा नन्दिकेश्वरद्वारा त्र्यम्बकमन्त्रका जप एवं महेश्वर-पार्वतीद्वारा उन्हें अपने पुत्ररूपमें अमर होनेका वरदान देना
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>मया सह पिता हृष्टः प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>उटजं स्वं जगामाशु निधिं लब्ध्वेव निर्धनः॥ १ | नन्दिकेश्वर बोले—महेश्वरको प्रणाम करके पिताजी मुझको साथ लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी कुटीमें लौट गये, जैसे निर्धन व्यक्ति निधि पाकर हर्षित हो जाता है, वैसे ही वे उस समय हर्षयुक्त थे॥ १॥ | | यदागतोऽहमुटजं शिलादस्य महामुने।<br>तदा वै दैविकं रूपं त्यक्त्वा मानुष्यमास्थितः॥ २ | हे महामुने! जब मैं शिलादकी कुटीमें गया, तब अपना दैविक (दिव्य) रूप छोड़कर मैं मनुष्यरूपमें हो गया॥ २॥ | | नष्टा चैव स्मृतिर्दिव्या येन केनापि कारणात्।<br>मानुष्यमास्थितं दृष्ट्वा पिता मे लोकपूजितः॥ ३<br><br>विललापातिदुःखार्तः स्वजनैश्च समावृतः।<br>जातकर्मादिकांश्चैव चकार मम सर्ववित्॥ ४<br><br>शालङ्कायनपुत्रो वै शिलादः पुत्रवत्सलः।<br>उपदिष्टा हि तेनैव ऋक्शाखा यजुषस्तथा॥ ५ | [उस समय] किसी अज्ञात कारणवश मेरी दिव्य स्मृति नष्ट हो गयी। लोकपूजित मेरे पिताजीने मुझे मानवरूपमें देखकर अपने बन्धुओंसहित दुःखसे व्याकुल होकर अत्यधिक विलाप किया। पुत्रवत्सल तथा सर्वज्ञ शालंकायनपुत्र शिलादने मेरे जातकर्म आदि संस्कार किये॥ ३-४½॥ | | सामशाखासहस्रं च साङ्गोपाङ्गं महामुने।<br>आयुर्वेदं धनुर्वेदं गान्धर्वं चाश्वलक्षणम्॥ ६<br><br>हस्तिनां चरितं चैव नराणां चैव लक्षणम्।<br>सम्पूर्णे सप्तमे वर्षे ततोऽथ मुनिसत्तमौ॥ ७ | हे महामुने! उन्होंने ही मुझको ऋग्वेद तथा यजुर्वेदकी शाखाओं और सामवेदकी हजार शाखाओंका सांगोपांग उपदेश किया। साथ ही उन्होंने मुझे आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्वविद्या, अश्वलक्षण, हाथियोंके लक्षण, मनुष्योंके लक्षण आदिकी शिक्षा प्रदान की॥ ५-६½॥ | | मित्रावरुणनामानौ तपोयोगबलान्वितौ।<br>तस्याश्रमं गतौ दिव्यौ द्रष्टुं मां चाज्ञया विभोः॥ ८ | मेरा सातवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर परमेश्वरकी आज्ञासे मुझे देखनेके लिये तप तथा योगशक्तिसे सम्पन्न मित्र- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वरुण नामक दो दिव्य मुनिश्रेष्ठ उनके (मेरे पिताके) आश्रममें गये॥ ७-८॥ | |
| ऊचतुश्च महात्मानौ मां निरीक्ष्य मुहुर्मुहुः।<br>तात नन्द्ययमल्पायुः सर्वशास्त्रार्थपारगः॥ ९ | मुझको बार-बार देखकर उन दोनों महात्माओंने कहा—हे तात! यह नन्दी सभी शास्त्रोंके ज्ञानमें पारंगत होगा, किंतु यह अल्प आयुवाला है। ऐसा आश्चर्य तो कभी नहीं देखा गया है, इसकी आयु आजसे मात्र एक वर्षकी है॥ ९ १/२॥ |
| न दृष्टमेवमाश्चर्यमायुर्वर्षादतः परम्।<br>इत्युक्तवति विप्रेन्द्रः शिलादः पुत्रवत्सलः॥ १०<br><br>समालिङ्ग्य च दुःखार्तो रुरोदातीव विस्वरम्।<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति पपात च समन्ततः॥ ११<br><br>अहो बलं दैवविधेर्विधातुश्चेति दुःखितः। | उनके ऐसा कहनेपर पुत्रसे स्नेह रखनेवाले विप्रवर शिलाद मेरा आलिंगन करके दुःखसे व्याकुल होकर करुण स्वरमें अत्यधिक रुदन करने लगे—हा पुत्र! हा पुत्र! हा पुत्र! अहो, दैवविधि तथा विधाताका ऐसा बल! [यह कहकर] वे दुःखित होकर भूमिपर गिर पड़े॥ १०-११ १/२॥ |
| तस्य चार्तस्वरं श्रुत्वा तदाश्रमनिवासिनः॥ १२<br><br>निपेतुर्विह्वलात्यर्थं रक्षाश्चक्रुश्च मङ्गलम्।<br>तुष्टुवुश्च महादेवं त्रियम्बकमुमापतिम्॥ १३<br><br>हुत्वा त्रियम्बकेनैव मधुनाव च सम्प्लुताम्।<br>दूर्वामयुतसंख्यातां सर्वद्रव्यसमन्विताम्॥ १४ | तब उनकी दुःखभरी वाणी सुनकर आश्रमवासी इकट्ठे हो गये। वे [इस अशुभके लिये] विह्वल होकर मंगल रक्षाकृत्य करने लगे। उन्होंने अन्य सभी सामग्रियोंसहित मधुलिप्त दस हजार दूर्वाकी त्रियम्बक मन्त्रसे आहुति देकर उमापति त्रियम्बक महादेवको सन्तुष्ट किया॥ १२—१४॥ |
| पिता विगतसंज्ञश्च तथा चैव पितामहः।<br>विचेष्टश्च ललापासौ मृतवन्निपपात च॥ १५ | पिताजी संज्ञाशून्य हो गये। पितामहने भी बहुत विलाप किया, वे भी चेतनारहित हो मृतकी भाँति पड़े रहे॥ १५॥ |
| मृत्योर्भीतोऽहमचिराच्छिरसा चाभिवन्द्य तम्।<br>मृतवत्पतितं साक्षात्पितरं च पितामहम्॥ १६<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य च तं रुद्रजाप्यरतोऽभवम्।<br>हृत्पुण्डरीके सुषिरे ध्यात्वा देवं त्रियम्बकम्॥ १७<br><br>त्र्यक्षं दशभुजं शान्तं पञ्चवक्त्रं सदाशिवम्।<br>सरितश्चान्तरे पुण्ये स्थितं मां परमेश्वरः॥ १८ | मैं मृत्युसे भयभीत हो गया और साक्षात् मृतककी भाँति [भूमिपर पड़े हुए] अपने पिता तथा पितामहको शीघ्रतापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करके एवं उनकी प्रदक्षिणा करके रुद्रजपमें संलग्न हो गया। त्रिनेत्र, दस भुजाओंवाले, शान्त, पाँच मुखोंवाले, सदाशिव भगवान् त्रियम्बकका अपने हृदयकमलमें ध्यान करके मैं जप कर रहा था; [तब मैंने देखा कि] नदीके पुण्यतटपर मैं स्थित हूँ और अर्धचन्द्रमाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले महादेव उमासहित प्रसन्न होकर [प्रकट हुए और] मुझसे कहने लगे—॥ १६—१८ १/२॥ |
| तुष्टोऽब्रवीन्महादेवः सोमः सोमार्धभूषणः।<br>वत्स नन्दिन् महाबाहो मृत्योर्भीतिः कुतस्तव॥ १९<br><br>मयैव प्रेषितौ विप्रौ मत्समस्त्वं न संशयः।<br>वत्सैतत्तव देहं च लौकिकं परमार्थतः॥ २० | हे वत्स! हे नन्दिन्! हे महाबाहो! तुमको भला मृत्युसे भय कहाँ, मैंने ही उन दोनों विप्रोंको भेजा |
अध्याय ४३ ] शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना [ १९५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नास्त्येव दैविकं दृष्टं शिलादेन पुरा तव।<br>देवैश्च मुनिभिः सिद्धैर्गन्धर्वैर्दानवोत्तमैः॥ २१<br>पूजितं यत्पुरा वत्स दैविकं नन्दिकेश्वर।<br>संसारस्य स्वभावोऽयं सुखं दुःखं पुनः पुनः॥ २२<br>नृणां योनिपरित्यागः सर्वथैव विवेकिनः। | था, तुम मेरे ही समान हो, इसमें सन्देह नहीं है। हे वत्स! वास्तवमें तुम्हारा यह देह लौकिक नहीं है, यह दिव्य है। हे वत्स! पूर्वमें शिलाद, देवताओं, मुनियों, सिद्धों, गन्धर्वों तथा श्रेष्ठ दानवोंने तुम्हारे जिस शरीरका दर्शन किया था और जिसका पूजन किया था, वह दिव्य था। हे नन्दिकेश्वर! संसारका यह स्वभाव है कि सुख-दुःख बार-बार आते रहते हैं। मनुष्योंके लिये स्त्रीभोगका परित्याग ही सर्वथा उचित है—ऐसा विवेकी पुरुष कहते हैं॥ १९—२२ १/२॥ |
| एवमुक्त्वा तु मां साक्षात्सर्वदेवमहेश्वरः॥ २३<br>कराभ्यां सुशुभाभ्यां च उभाभ्यां परमेश्वरः।<br>पस्पर्श भगवान् रुद्रः परमार्तिहरो हरः॥ २४<br>उवाच च महादेवस्तुष्टात्मा वृषभध्वजः।<br>निरीक्ष्य गणपांश्चैव देवीं हिमवतः सुताम्॥ २५ | मुझसे ऐसा कहकर महान् कष्टोंको दूर करनेवाले, सभी देवताओंके महेश्वर, भगवान् रुद्र, हर, वृषभध्वज तथा परमेश्वर महादेवने अपने दोनों अत्यन्त शुभ हाथोंसे मुझे स्पर्श किया और उनका मन प्रसन्न हो गया। तदनन्तर गणेश्वरोंको एवं हिमालयपुत्री पार्वतीको भलीभाँति देखकर वे सुरेश्वर महादेव प्रसन्नचित्त होकर मेरी ओर देखकर कहने लगे—॥ २३—२५ १/२॥ |
| समालोक्य च तुष्टात्मा महादेवः सुरेश्वरः।<br>अजरो जरया त्यक्तो नित्यं दुःखविवर्जितः॥ २६<br>अक्षयश्चाव्ययश्चैव सपिता ससुहृज्जनः।<br>ममेष्टो गणपश्चैव मद्वीर्यो मत्पराक्रमः॥ २७<br>इष्टो मम सदा चैव मम पार्श्वगतः सदा।<br>मद्बलश्चैव भविता महायोगबलान्वितः॥ २८ | तुम अपने पिता तथा सुहृज्जनोंसहित अजर-अमर, बुढ़ापारहित, दुःखसे हीन, क्षयरहित एवं अव्यय रहोगे। तुम मेरे प्रिय गणेश्वर होओ, तुम मेरे समान तेज तथा पराक्रमवाले होओ। तुम सदा मेरे इष्ट बनकर सदा मेरे समीप विराजमान रहोगे। तुम मेरे सदृश बलशाली एवं महान् योगबलसे सम्पन्न होओगे॥ २६—२८॥ |
| एवमुक्त्वा च मां देवो भगवान् सगणस्तदा।<br>कुशेशयमयीं मालां समुन्मुच्यात्मनस्तदा॥ २९<br>आबबन्ध महातेजा मम देवो वृषध्वजः।<br>तयाहं मालया जातः शुभया कण्ठसक्तया॥ ३० | मुझसे ऐसा कहकर गणोंसहित महातेजस्वी वृषभध्वज भगवान् महादेवने कुशेशयमयी अर्थात् शतदलकमलसे निर्मित अपनी माला उतारकर मेरे कण्ठमें बाँध दी। कण्ठमें बँधी हुई उस सुन्दर मालासे मैं तीन नेत्रोंवाले तथा दस भुजाओंवाले दूसरे शंकरके समान हो गया॥ २९—३० १/२॥ |
| त्र्यक्षो दशभुजश्चैव द्वितीय इव शङ्करः।<br>तत एव समादाय हस्तेन परमेश्वरः॥ ३१<br>उवाच ब्रूहि किं तेऽद्य ददामि वरमुत्तमम्।<br>ततो जटाश्रितं वारि गृहीत्वा चातिनिर्मलम्॥ ३२ | तत्पश्चात् परमेश्वरने मुझको हाथसे पकड़कर कहा—बोलो, मैं तुम्हें कौन-सा उत्तम वर प्रदान करूँ? तब उन वृषभध्वजने अपनी जटामें समाहित अति निर्मल |
| १९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| उक्त्वा नदी भवस्वेति उत्ससर्ज वृषध्वजः।<br>ततः सा दिव्यतोया च पूर्णासितजला शुभा॥ ३३<br><br>पद्मोत्पलवनोपेता प्रावर्तत महानदी। | जलको [हाथमें] लेकर कहा—नदी हो जाओ—ऐसा कहकर उन्होंने जलको छोड़ दिया। तब दिव्य जलवाली, श्याम जलसे परिपूर्ण, कमल तथा उत्पलके वनोंसे युक्त शुभ महानदी बन गयी॥ ३१—३३१/२ ॥ | | तामाह च महादेवे नदीं परमशोभनाम्॥ ३४<br><br>यस्माज्जटोदकादेव प्रवृत्ता त्वं महानदी।<br>तस्माज्जतोदका पुण्या भविष्यसि सरिद्वरा॥ ३५<br><br>त्वयि स्नात्वा नरः कश्चित्सर्वपापैः प्रमुच्यते। | तदनन्तर महादेवने उस परम सुन्दर नदीसे कहा—चूँकि तुम जटाके जलसे महानदीके रूपमें निकली हो, अतः तुम्हारा नाम जटोदका होगा। तुम पवित्र तथा नदियोंमें श्रेष्ठ होओगी। कोई भी मनुष्य तुम्हारे जलमें स्नान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ३४-३५१/२ ॥ | | ततो देव्या महादेवः शिलादतनयं प्रभुः॥ ३६<br><br>पुत्रस्तेऽयमिति प्रोच्य पादयोः संन्यपातयत्।<br>सा मामाघ्राय शिरसि पाणिभ्यां परिमार्जती॥ ३७<br><br>पुत्रप्रेम्णाभ्यषिञ्चच्च स्रोतोभिस्तनयैस्त्रिभिः।<br>पयसा शङ्खगौरेण देवदेवं निरीक्ष्य सा॥ ३८<br><br>तानि स्रोतांसि त्रीण्यस्याः स्रोतस्विन्योऽभवंस्तदा।<br>नदीं त्रिस्रोतसं देवो भगवानवदद्भवः॥ ३९ | तत्पश्चात् प्रभु महादेवने 'यह तुम्हारा पुत्र है'—ऐसा कहकर मुझ शिलादतनयको देवी पार्वतीके चरणोंमें डाल दिया। तब उन्होंने मेरा सिर सूंघकर दोनों हाथोंसे मुझे [स्नेहपूर्वक] सहलाते हुए पुनः देवदेव शंकरकी ओर देखकर पुत्रप्रेममें तीन पुत्ररूप स्रोतोंके द्वारा शंखके समान श्वेतवर्णवाले जलरूप अश्रुबिन्दुओंसे मुझे अभिसींचित कर दिया। इनके वे ही तीनों स्रोत तीन नदियाँ बन गयीं। भगवान् भव महादेवने इसे त्रिस्रोतस् (तीन धाराओंवाली) नदीकी संज्ञा प्रदान की॥ ३६—३९॥ | | त्रिस्रोतसं नदीं दृष्ट्वा वृषः परमहर्षितः।<br>ननाद नादात्तस्माच्च सरिदन्या ततोऽभवत्॥ ४०<br><br>वृषध्वनिरिति ख्याता देवदेवेन सा नदी। | उस त्रिस्रोतस् नदीको देखकर वृषने अत्यन्त प्रसन्न होकर नाद किया, तब उस ध्वनिसे एक दूसरी नदी आविर्भूत हो गयी। देवदेव शंकरने उस नदीका नाम वृषध्वनि रखा॥ ४०१/२ ॥ | | जाम्बूनदमयं चित्रं सर्वरत्नमयं शुभम्॥ ४१<br><br>स्वं देवश्चाद्भुतं दिव्यं निर्मितं विश्वकर्मणा।<br>मुकुटं चाबबन्धेशो मम मूर्ध्नि वृषध्वजः॥ ४२<br><br>कुण्डले च शुभे दिव्ये वज्रवैडूर्यभूषिते।<br>आबबन्ध महादेवः स्वयमेव महेश्वरः॥ ४३ | इसके बाद भगवान् वृषध्वजने विश्वकर्माके द्वारा निर्मित, स्वर्णमय, सभी रत्नोंसे जटिल, अलौकिक, शुभ, अद्भुत तथा दिव्य अपने मुकुटको मेरे सिरपर बाँध दिया। उन महेश्वर महादेवने हीरे तथा वैडूर्यमणिसे मण्डित दो शुभ तथा दिव्य कुण्डल [मेरे कानोंमें] स्वयं पहना दिये॥ ४१—४३॥ | | मां तथाभ्यर्चितं व्योम्नि दृष्ट्वा मेघैः प्रभाकरः।<br>मेघाम्भसा चाभ्यषिञ्चच्छिलादनमथो मुने॥ ४४<br><br>तस्याभिषिक्तस्य तदा प्रवृत्ता स्रोतसा भृशम्।<br>यस्मात्सुवर्णान्निःसृत्य नद्येषा सम्प्रवर्तते॥ ४५<br><br>स्वर्णोदकेति तामाह देवदेवस्त्रियम्बकः।<br>जाम्बूनदमयाद्यस्माद् द्वितीया मुकुटाच्छुभा॥ ४६ | हे मुने! मुझको इस प्रकार पूजित देखकर सूर्यने आकाशमें मेघोंके जलसे मुझ नन्दीका अभिसेचन किया। तब उस अभिषेकके जलसे सोनेकी नदी बन गयी। उस स्वर्णजलसे निकलकर यह नदी बनी, इसलिये देवोंके देव त्रियम्बक शिवने उसे स्वर्णोदका (स्वर्ण जलवाली) कहा। उसी प्रकार सोनेके मुकुटसे |
४४- भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवोंके द्वारा नन्दि-केश्वरका अभिषेक तथा शिवनाममन्त्रकी महिमा
| अध्याय ४४ ] | भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना | १९७ |
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| प्रावर्तत नदी पुण्या ऊचुर्जाम्बूनदीति ताम्।<br>एतत्पञ्चनदं नाम जप्येश्वरसमीपगम्॥ ४७<br><br>यः पञ्चनदमासाद्य स्नात्वा जप्येश्वरेश्वरम्।<br>पूजयेच्छिवसायुज्यं प्रयात्येव न संशयः॥ ४८ | दूसरी पवित्र तथा शुभ नदी उत्पन्न हुई, अतः उसे जाम्बूनदी कहा जाता है। इस प्रकार ये पाँच नदियाँ भगवान् जप्येश्वरके समीप जानेवाली हैं। जो पंचनदपर पहुँचकर इसमें स्नान करके भगवान् जप्येश्वरेश्वरकी पूजा करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४७-४८॥ |
| अथ देवो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः।<br>देवीमुवाच शर्वाणीमुमां गिरिसुतामजाम्॥ ४९<br><br>देवि नन्दीश्वरं देवमभिषिञ्चामि भूतपम्।<br>गणेन्द्रं व्याहरिष्यामि किं वा त्वं मन्यसेऽव्यये॥ ५० | इसके बाद सभी भूतोंके स्वामी भगवान् महादेवने हिमालयपुत्री, अजन्मा, शर्वाणी, उमा देवीसे कहा—हे देवि! मैं भूतोंके स्वामी देव नन्दीश्वरका अभिषेचन करता हूँ और उन्हें गणेन्द्र नामवाला कहूँगा, हे अव्यये! [इस विषयमें] तुम क्या सोचती हो?॥ ४९-५०॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भवानी हर्षितानना।<br>स्मयन्ती वरदं प्राह भवं भूतपतिं पतिम्॥ ५१<br><br>सर्वलोकाधिपत्यं च गणेशत्वं तथैव च।<br>दातुमर्हसि देवेश शैलादिस्तनयो मम॥ ५२ | उनका यह वचन सुनकर हर्षयुक्त मुखवाली भवानीने वर प्रदान करनेवाले तथा भूतोंके स्वामी अपने पति शिवसे मुसकराते हुए इस प्रकार कहा—हे देवेश! शैलादि मेरा पुत्र है, अतः आप इसे सभी लोकोंका स्वामित्व और गणेशत्व प्रदान करनेकी कृपा कीजिये॥ ५१-५२॥ |
| ततः स भगवान् शर्वः सर्वलोकेश्वरेश्वरः।<br>सस्मार गणपान् दिव्यान् देवदेवो वृषध्वजः॥ ५३ | तत्पश्चात् सभी लोकेश्वरोंके भी ईश्वर, देवोंके देव, शर्व, भगवान् वृषध्वजने अपने दिव्य गणेश्वरोंका स्मरण किया॥ ५३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वरप्रादुर्भावनन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्रो नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वरप्रादुर्भाव तथा नन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्र' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवोंके द्वारा नन्दिकेश्वरका अभिषेक तथा शिवनाममन्त्रकी महिमा
| शैलादिरुवाच<br>स्मरणादेव रुद्रस्य सम्प्राप्ताश्च गणेश्वराः।<br>सर्वे सहस्रहस्ताश्च सहस्रायुधपाणयः॥ १<br><br>त्रिनेत्राश्च महात्मानस्त्रिदशैरपि वन्दिताः।<br>कोटिकालाग्निसङ्काशा जटामुकुटधारिणः॥ २<br><br>दंष्ट्राकरालवदना नित्या बुद्धाश्च निर्मलाः।<br>कोटिकोटिगणैस्तुल्यैरात्मना च गणेश्वराः।<br>असंख्याता महात्मानस्तत्राजग्मुर्मुदा युताः॥ ३ | **शैलादि बोले—**रुद्रके स्मरण करते ही गणेश्वर लोग उपस्थित हो गये। उन सभीकी हजार-हजार भुजाएँ थीं, उन्होंने हाथोंमें हजार अस्त्र धारण कर रखे थे, उनके तीन नेत्र थे, वे महान् गण देवताओंसे वन्दित हो रहे थे, वे करोड़ों कालाग्निके समान थे, वे जटामुकुट धारण किये हुए थे, दाढ़ोंके कारण वे विकराल मुखवाले थे, वे शाश्वत, शुद्ध तथा प्रबुद्ध थे, वे अपने ही समान करोड़ों-करोड़ों अनुचरोंसे युक्त थे—ऐसे असंख्य महात्मा गणेश्वर प्रसन्नताके साथ वहाँ आये॥ १–३॥ |
१९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
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| गायन्तश्च द्रवन्तश्च नृत्यन्तश्च महाबलाः।<br>मुखाडम्बरवाद्यानि वादयन्तस्तथैव च॥ ४<br>रथैर्नागैर्हयैश्चैव सिंहमर्कटवाहनाः।<br>विमानेषु तथारूढा हेमचित्रेषु वै गणाः॥ ५ | वे महान् बलसे सम्पन्न गण गाते, दौड़ते, भागते, नाचते तथा अनेक मुखवाद्योंको बजाते हुए आये। वे रथों, हाथियों, घोड़ों, सिंहों और बन्दरोंपर सवार थे। कुछ गण स्वर्णचित्रित विमानोंपर भी आरूढ़ थे॥ ४-५॥ |
| भेरीमृदङ्गाद्यैश्च पणवानकगोमुखैः।<br>वादित्रैर्विविधैश्चान्यैः पटहैरेकपुष्करैः॥ ६<br>भेरीमुरजसंनादैराडम्बरकडिण्डिमैः ।<br>मर्दलैर्वेणुवीणाभिर्विविधैस्तालनिःस्वनैः ॥ ७<br>दर्दुरैस्तलघातैश्च कच्छपैः पणवैरपि।<br>वाद्यमानैर्महायोग्या आजग्मुर्देवसंसदम्॥ ८ | महायोगसे सम्पन्न वे गणेश्वर भेरी, मृदंग, पणव, आनक, गोमुख, पटह, एकपुष्कर, मुरज, आडम्बर, डिण्डिम, मर्दल, वेणु, वीणा, दर्दुर, तलघात, कच्छप, पणव एवं अन्य प्रकारके वाद्योंको बजाते हुए तथा विविध तालध्वनियाँ करते हुए भगवान् शिवकी सभामें आये॥ ६-८॥ |
| ते गणेशा महासत्त्वाः सर्वदेवेश्वरेश्वराः।<br>प्रणम्य देवं देवीं च इदं वचनमब्रुवन्॥ ९<br>भगवन् देवदेवेश त्र्यम्बक वृषध्वज।<br>किमर्थं च स्मृता देव आज्ञापय महाद्युते॥ १० | महान् शक्तिसे युक्त तथा सभी देवेश्वरोंके ईश्वर उन गणेश्वरोंने महादेव एवं पार्वतीको प्रणाम करके यह वचन कहा—हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्र्यम्बक! हे वृषध्वज! आपने हमलोगोंका स्मरण किसलिये किया है? हे देव! हे महाद्युते! आदेश दीजिये॥ ९-१०॥ |
| किं सागरान् शोषयामो यमं वा सह किङ्करैः।<br>हन्मो मृत्युसुतां मृत्युं पशुवद्धन्म पद्मजम्॥ ११<br>बद्ध्वेन्द्रं सह देवैश्च सह विष्णुं च वायुना।<br>आनयामः सुसङ्क्रुद्धा दैत्यान् वा सह दानवैः॥ १२<br>कस्याद्य व्यसनं घोरं करिष्यामस्तवाज्ञया।<br>कस्य वाद्योत्सवो देव सर्वकामसमृद्धये॥ १३ | क्या हमलोग समुद्रोंको सोख लें? क्या यमको उनके सेवकोंसहित मार डालें अथवा मृत्युपुत्री (जरा) तथा मृत्युको मार डालें अथवा पद्मयोनि ब्रह्माका पशुकी भाँति वध कर दें। क्या अत्यन्त कुपित होकर हमलोग देवताओंसहित इन्द्रको, वायुसहित विष्णुको अथवा दानवोंसहित दैत्योंको बाँधकर यहाँ ले आयें? हमलोग आपकी आज्ञासे आज किसका घोर अनर्थ कर डालें? हे देव! सभी कामनाओंकी समृद्धिके लिये आज किसका उत्सव है?॥ ११-१३॥ |
| तांस्तथावादिनः सर्वान् गणेशान् सर्वसम्मतान्।<br>उवाच देवः सम्पूज्य कोटिकोटिशतान् प्रभुः॥ १४<br>शृणुध्वं यत्कृते यूयमिहाहूता जगद्धिताः।<br>श्रुत्वा च प्रयतात्मानः कुरुध्वं तदशङ्किताः॥ १५<br>नन्दीश्वरोऽयं पुत्रो नः सर्वेषामीश्वरेश्वरः।<br>विप्रोऽयं नायकश्चैव सेनानीर्वः समृद्धिमान्॥ १६<br>तमिमं मम सन्देशाद्यूयं सर्वेऽपि सम्मताः।<br>सेनान्यमभिषिञ्चध्वं महायोगपतिं पतिम्॥ १७ | भगवान् शंकरने वैसा कहनेवाले उन करोड़ों-करोड़ों सभी सर्वपूज्य गणेश्वरोंका सम्मान करके उनसे कहा—हे जगत्के हितकारको! सुनिये, जिसलिये मैंने तुमलोगोंको यहाँ बुलाया है, उसे सुन करके हे शुद्धात्माओ [गणेश्वरो]! निःशंक होकर कीजिये। यह नन्दी हमारा पुत्र है। यह सभीका ईश्वर है। यह समृद्धिशाली विप्र तुमलोगोंका नायक तथा सेनानी है। अतः मेरे आदेशसे तुम सभी लोग अपना स्वामी एवं सेनानी मानकर इस महायोगपतिका अभिषेक करो॥ १४-१७॥ |
| एवमुक्ता भगवता गणपाः सर्व एव ते।<br>एवमस्त्विति सम्मन्त्र्य सम्भारानाहरंस्ततः॥ १८ | भगवान् शिवके इस प्रकार कहनेपर वे सभी |
अध्याय ४४ ] भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना १९९
| श्लोक | अर्थ |
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| तस्य सर्वाश्रयं दिव्यं जाम्बूनदमयं शुभम्।<br>आसनं मेरुसङ्काशं मनोहरमुपाहरन्॥ १९<br><br>नैकस्तम्भमयं चापि चामीकरवरप्रभम्।<br>मुक्तादामावलम्बं च मणिरत्नावभासितम्॥ २०<br><br>स्तम्भैश्च वैडूर्यमयैः किङ्किणीजालसंवृतम्।<br>चारुरत्नकसंयुक्तं मण्डपं विश्वतोमुखम्॥ २१<br><br>कृत्वा विन्यस्य तन्मध्ये तदासनवरं शुभम्।<br>तस्याग्रतः पादपीठं नीलवज्रावभासितम्॥ २२<br><br>चक्रुः पादप्रतिष्ठार्थं कलशौ चास्य पार्श्वगौ।<br>सम्पूर्णौ परमाम्भोभिररविन्दावृताननौ॥ २३<br><br>कलशानां सहस्रं तु सौवर्णं राजतं तथा।<br>ताम्रजं मृण्मयं चैव सर्वतीर्थाम्बुपूरितम्॥ २४ | गणेश्वर 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर आपसमें परामर्श करके सामग्रियाँ एकत्र करने लगे॥ १८॥<br><br>वे स्वर्णनिर्मित, दिव्य, सुन्दर, मेरुसदृश तथा मनोहर सिंहासन ले आये। उन्होंने अनेक स्तम्भोंवाले, उत्तम स्वर्णकी प्रभासे युक्त, लटकती हुई मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित, मणियों एवं रत्नोंसे जटिल, वैडूर्यमणिके स्तम्भोंवाले, किंकिणियोंसे सुशोभित, सुन्दर रत्नोंसे समन्वित तथा सभी ओर मुखवाले एक मण्डपका निर्माण करके उसके मध्यमें उस सुन्दर आसनको स्थापितकर पादप्रतिष्ठाके लिये उसके आगे नीलवज्रसे जटिल एक पादपीठ रखा। उसके दोनों ओर उन्होंने दो कलश रखे, जो सुगन्धित जलसे भरे हुए थे तथा उनके मुख कमलपुष्पोंसे ढँके हुए थे। सोने, चाँदी, ताँबे और मिट्टीके हजारों कलश वहाँ रखे थे, जो सभी तीर्थोंके जलसे परिपूर्ण थे॥ १९–२४॥ |
| वासोयुगं तथा दिव्यं गन्धं दिव्यं तथैव च।<br>केयूरे कुण्डले चैव मुकुटं हारमेव च॥ २५<br><br>छत्रं शतशलाकं च बालव्यजनमेव च।<br>दत्तं महात्मना तेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना॥ २६ | महात्मा परमेष्ठी ब्रह्माने दिव्य वस्त्रयुगल, दिव्य गन्ध, केयूर, कुण्डल, मुकुट, हार, सौ शलाकाओं (तीलियों)-वाला छत्र और एक बालव्यजन प्रदान किया॥ २५–२६॥ |
| शङ्खहाराङ्गगौरेण पृष्ठेनापि विराजितम्।<br>व्यजनं चन्द्रशुभ्रं च हेमदण्डं सुचामरम्॥ २७<br><br>ऐरावतः सुप्रतीको गजावेतौ सुपूजितौ।<br>मुकुटं काञ्चनं चैव निर्मितं विश्वकर्मणा॥ २८<br><br>कुण्डले चामले दिव्ये वज्रं चैव वरायुधम्।<br>जाम्बूनदमयं सूत्रं केयूरद्वयमेव च॥ २९<br><br>सम्भाराणि तथान्यानि विविधानि बहून्यपि।<br>समन्तान्निन्युरव्यग्रा गणपा देवसम्मताः॥ ३० | शंख तथा मोतियोंकी मालाके समान गौरवर्णवाले दण्डसे सुशोभित और चन्द्रमाके समान शुभ्र व्यजन, स्वर्णका दण्ड (मूठ) लगा हुआ चामर, भलीभाँति पूजित ऐरावत तथा सुप्रतीक—ये दो हाथी, विश्वकर्माके द्वारा बनाया हुआ एक सोनेका मुकुट, दो स्वच्छ तथा दिव्य कुण्डल, श्रेष्ठ आयुध वज्र, सोनेका सूत्र तथा दो केयूर वहाँ रखे गये। देवताओंके द्वारा पूजित उन गणेश्वरोंने चारों ओर अनेक प्रकारकी अन्य आवश्यक सामग्रियोंको सावधान होकर वहाँ उपस्थित कर दिया॥ २७–३०॥ |
| ततो देवाश्च सेन्द्राश्च नारायणमुखास्तथा।<br>मुनयो भगवान् ब्रह्मा नवब्रह्माण एव च॥ ३१<br><br>देवैश्च लोकाः सर्वे ते ततो जग्मुर्मुदा युताः।<br>तेष्वागतेषु सर्वेषु भगवान् परमेश्वरः॥ ३२ | तदनन्तर इन्द्रसहित विष्णु आदि देवता, मुनिगण, भगवान् ब्रह्मा, नवब्रह्माण*, देवताओंसहित सभी लोकपाल प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये। उन सभीके वहाँ आ जानेपर भगवान् परमेश्वरने समस्त संस्कारविधि सम्पन्न करानेके |
* मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—ये नौ ऋषि ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न होनेके कारण तथा ब्रह्मवादी और ब्रह्मात्मक होनेसे 'नवब्रह्माण' कहलाते हैं। (लिङ्गपु० पू० ७०। १८१–१८३)
| २०० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| लिये पितामह ब्रह्माको आदेश दिया॥ ३१-३२ १/२॥ | |
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| सर्वकार्यविधिं कर्तुमादिदेश पितामहम्।<br>पितामहोऽपि भगवान् नियोगादेव तस्य तु॥ ३३<br><br>चकार सर्वं भगवानभिषेकं समाहितः।<br>अर्चयित्वा ततो ब्रह्मा स्वयमेवाभ्यषेचयत्॥ ३४<br><br>ततो विष्णुस्ततः शक्रो लोकपालास्तथैव च।<br>अभ्यषिञ्चन्त विधिवद् गणेन्द्रं शिवशासनात्॥ ३५ | तब उनका आदेश पाते ही भगवान् ब्रह्माने भी ध्यानपूर्वक सम्पूर्ण अभिषेक-कर्म सम्पन्न कराया। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने पूजन करके स्वयं उनका अभिषेक किया। इसके बाद शिवके आदेशसे विष्णुने, फिर इन्द्रने और लोकपालोंने गणेन्द्रका विधिपूर्वक अभिषेक किया॥ ३३-३५॥ |
| ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव पितामहपुरोगमाः।<br>स्तुतवत्सु ततस्तेषु विष्णुः सर्वजगत्पतिः॥ ३६<br><br>शिरस्यञ्जलिमादाय तुष्टाव च समाहितः।<br>प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा जयशब्दं चकार च॥ ३७ | तदनन्तर ऋषियों तथा पितामह आदिने उनकी स्तुति की। तब उन सभीके स्तुति कर लेनेपर समस्त जगत्के स्वामी विष्णुने सिरपर अंजलि बाँधकर एकाग्र-चित्त होकर उनकी स्तुति की और हाथ जोड़े हुए झुककर जय-जयकार किया। तत्पश्चात् सभी गणेश्वरों, देवताओं और असुरोंने भी क्रमसे सम्पूर्ण कृत्य किया॥ ३६-३७ १/२॥ |
| ततो गणाधिपाः सर्वे ततो देवास्ततोऽसुराः।<br>एवं स्तुतश्चाभिषिक्तो देवैः सब्रह्मकैस्तदा॥ ३८<br><br>उद्वाहश्च कृतस्तत्र नियोगात्परमेष्ठिनः।<br>मरुतां च सुता देवी सुयशाख्या बभूव या॥ ३९<br><br>लब्धं शशिप्रभं छत्रं तया तत्र विभूषितम्।<br>चामरे चामरासक्तहस्ताग्रैः स्त्रीगणैर्युता॥ ४०<br><br>सिंहासनं च परमं तया चाधिष्ठितं मया।<br>अलङ्कृता महालक्ष्म्या मुकुटाद्यैः सुभूषणैः॥ ४१ | इस प्रकार ब्रह्मसहित सभी देवताओंके द्वारा उनका अभिषेक तथा स्तवन हो जानेके बाद परमेष्ठीकी आज्ञासे उन्होंने विवाह किया। सुयशा नामक जो मरुतोंकी पुत्री थी, वह उनकी भार्या हुई। उस सुयशाको चन्द्रमाके समान प्रभायुक्त और विशेष शोभासम्पन्न एक छत्र भेंट किया गया। हाथोंमें चामर लिये हुए स्त्रियोंसे युक्त उस सुयशाको दो चामर भी प्रदान किये गये। मेरे साथ उसने भी एक अत्यन्त सुन्दर सिंहासन ग्रहण किया। भगवती महालक्ष्मीने मुकुट आदि सुन्दर आभूषणोंसे उसे अलंकृत किया॥ ३८-४१॥ |
| लब्धो हारश्च परमो देव्याः कण्ठगतस्तथा।<br>वृषेन्द्रश्च सितो नागः सिंहः सिंहध्वजस्तथा॥ ४२<br><br>रथश्च हेमच्छत्रं च चन्द्रबिम्बसमप्रभम्।<br>अद्यापि सदृशः कश्चिन्मया नास्ति विभुः क्वचित्॥ ४३ | उसे देवीके गलेका अति सुन्दर हार भी प्राप्त हुआ। वृषेन्द्र, श्वेत हाथी, सिंह, सिंहध्वज, रथ और चन्द्रमण्डलके समान प्रभाववाला स्वर्णछत्र भी भेंट किया गया। अब मेरे समान कहीं भी कोई प्रभु नहीं था॥ ४२-४३॥ |
| सान्वयं च गृहीत्वेशस्तथा सम्बन्धिबान्धवैः।<br>आरुह्य वृषमीशानो मया देव्या गतः शिवः॥ ४४ | मुझको परिवारसहित लेकर सम्बन्धियों तथा बान्धवोंको भी साथ लेकर देवीके साथ भगवान् महेश्वर वृषभपर आरूढ़ हो चल पड़े॥ ४४॥ |
| तदा देवीं भवं दृष्ट्वा मया च प्रार्थयन् गणैः।<br>मुनिदेवर्षयः सिद्धा आज्ञां पाशुपतीं द्विजाः॥ ४५ | तब मेरे तथा गणोंके साथ शिव एवं पार्वतीको देखकर मुनियों, देवर्षियों, सिद्धों और द्विजोंने शिवकी आज्ञाहेतु प्रार्थना की॥ ४५॥ |
| अथाज्ञां प्रददौ तेषामर्हाणामाज्ञया विभोः।<br>नन्दिको नगजाभर्तुस्तेषां पाशुपतीं शुभाम्॥ ४६ | तत्पश्चात् हिमालयकी पुत्रीके पति प्रभु शिवकी |