भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ४७] जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन २०७


अनेक गायोंका स्वामी तथा बुद्धिमान् था॥ २॥
तस्य पुत्रा बभूवुस्ते प्रजापतिसमा नव।<br>सर्वे माहेश्वराश्चैव महादेवपरायणाः॥ ३उसके प्रजापतिके समान नौ पुत्र हुए। वे सभी शिवभक्त तथा शिवपरायण थे॥ ३॥
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरुषोऽनुजः।<br>हरिवर्षस्तृतीयस्तु चतुर्थो वै त्विलावृतः॥ ४<br>रम्यस्तु पञ्चमस्तत्र हिरण्मन् षष्ठ उच्यते।<br>कुरुस्तु सप्तमस्तेषां भद्राश्वस्त्वष्टमः स्मृतः॥ ५<br>नवमः केतुमालस्तु तेषां देशान्निबोधत।उनमें ज्येष्ठ पुत्र नाभि नामसे प्रसिद्ध था। उसके छोटे भाईका नाम किम्पुरुष था। तीसरा पुत्र हरिवर्ष तथा चौथा पुत्र इलावृत था। रम्य पाँचवाँ पुत्र था। हिरण्मन् छठा पुत्र कहा जाता है। कुरु उनमें सातवाँ था और भद्राश्व आठवाँ पुत्र कहा गया है। नौवाँ केतुमाल था। अब उनके देशोंके विषयमें सुनिये॥ ४-५ १/२॥
नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हेमाख्यं तु पिता ददौ॥ ६<br>हेमकूटं तु यद्वर्षं ददौ किम्पुरुषाय सः।<br>नैषधं यत्स्मृतं वर्षं हरये तत्पिता ददौ॥ ७पिताने [ज्येष्ठ पुत्र] नाभिको दक्षिणमें स्थित हेम नामक वर्ष (देश) प्रदान किया। उन्होंने हेमकूट नामक जो वर्ष था, उसे किम्पुरुषको दिया। नैषध नामक जो वर्ष कहा गया है, उसे पिताने हरिको दे दिया॥ ६-७॥
इलावृताय प्रददौ मेरूर्यत्र तु मध्यमः।<br>नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता॥ ८<br>श्वेतं यदुत्तरं तस्मात्पित्रा दत्तं हिरण्मते।<br>यदुत्तरं शृङ्गवर्षं पिता तत्कुरवे ददौ॥ ९<br>वर्षं माल्यवतं चापि भद्राश्वस्य न्यवेदयत्।<br>गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्॥ १०पिताने मेरु पर्वतसे आवृत मध्य देश इलावृतको दिया और नीलाचल नामक वर्ष रम्यको दिया। पिताने हिरण्मन्‌को उत्तरमें स्थित श्वेत नामक वर्ष दिया और उत्तरमें जो शृंगवर्ष है, उसे उन्होंने कुरु नामक पुत्रको दिया। इसी प्रकार उन्होंने भद्राश्वको माल्यवान्वर्ष दिया और केतुमालको गन्धमादनवर्ष दिया॥ ८-१०॥
इत्येतानि महान्तीह नव वर्षाणि भागशः।<br>आग्नीध्रस्तेषु वर्षेषु पुत्रांस्तानभिषिच्य वै॥ ११<br>यथाक्रमं स धर्मात्मा ततस्तु तपसि स्थितः।<br>तपसा भावितश्चैव स्वाध्यायनिरतस्त्वभूत्॥ १२<br>स्वाध्यायनिरतः पश्चाच्छिवध्यानरतस्त्वभूत्।विभागके अनुसार ये नौ महान् वर्ष हैं। धर्मात्मा राजा आग्नीध्र उन वर्षोंमें अपने उन पुत्रोंको [राजपदपर] क्रमानुसार अभिषिक्त करके तपस्यामें रत हो गये। तपसे अपनेको शुद्ध करनेके अनन्तर वे स्वाध्यायमें संलग्न हो गये और स्वाध्यायमें रत रहनेवाले वे बादमें शिवके ध्यानमें निमग्न हो गये॥ ११-१२ १/२॥
यानि किम्पुरुषाद्यानि वर्षाण्यष्टौ शुभानि च॥ १३<br>तेषां स्वभावतः सिद्धिः सुखप्राया ह्ययत्नतः।<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति जरामृत्युभयं न च॥ १४<br>धर्माधर्मौ न तेष्वास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।<br>न तेष्वस्ति युगावस्था क्षेत्रेष्वष्टसु सर्वतः॥ १५किम्पुरुष आदि जो आठ शुभ वर्ष थे, उनमें स्वभावतः बिना प्रयत्नके ही सुखमय सिद्धि थी। उनमें [किसी प्रकारका] विपरीत भाव नहीं था और [प्रजाओंमें] बुढ़ापे तथा मृत्युका भय नहीं था। उनमें न धर्म था न अधर्म और उत्तम, मध्यम तथा अधम—ये भाव नहीं थे। उन आठों क्षेत्रोंमें हर प्रकारसे युगकी अवस्था नहीं थी॥ १३-१५॥
रुद्रक्षेत्रे मृताश्चैव जङ्गमाः स्थावरास्तथा।<br>भक्ताः प्रासङ्गिकाश्चापि तेषु क्षेत्रेषु यान्ति ते॥ १६<br>तेषां हिताय रुद्रेण चाष्टक्षेत्रं विनिर्मितम्।<br>तत्र तेषां महादेवः सान्निध्यं कुरुते सदा॥ १७रुद्रक्षेत्रमें जो भी स्थावर, जंगम, भक्त अथवा अस्थायी आगन्तुक प्राणी मृत होते हैं, वे उन्हीं क्षेत्रोंमें जाते हैं। रुद्रने उनके कल्याणके लिये ही आठों क्षेत्रोंका निर्माण किया है। वहाँपर महादेव सदा उनका सान्निध्य