श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| जीमूतस्य च जीमूतो रोहितस्य च रोहितः।<br>वैद्युतो वैद्युतस्यापि मानसस्य च मानसः॥ ४०<br>सुप्रभः सुप्रभस्यापि सप्त वै देशलाञ्छकाः।<br>प्लक्षद्वीपे तु वक्ष्यामि जम्बूद्वीपादनन्तरम्॥ ४१<br>सप्त मेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वराः नृपाः।<br>ज्येष्ठः शान्तभयस्तेषां सप्तवर्षाणि तानि वै॥ ४२<br>तस्माच्छान्तभयाच्चैव शिशिरस्तु सुखोदयः।<br>आनन्दश्च शिवश्चैव क्षेमकश्च ध्रुवस्तथा॥ ४३<br>तानि तेषां तु नामानि सप्तवर्षाणि भागशः।<br>निवेशितानि तैस्तानि पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ४४<br>मेधातिथेस्तु पुत्रैस्तैः प्लक्षद्वीपनिवासिभिः।<br>वर्णाश्रमाचारयुताः प्रजास्तत्र निवेशिताः॥ ४५<br>प्लक्षद्वीपादिवर्षेषु शाकद्वीपान्तिकेषु वै।<br>ज्ञेयः पञ्चसु धर्मो वै वर्णाश्रमविभागशः॥ ४६<br>सुखमायुः स्वरूपं च बलं धर्मो द्विजोत्तमाः।<br>पञ्चस्वेतेषु द्वीपेषु सर्वसाधारणं स्मृतम्॥ ४७<br>रुद्रार्चनरता नित्यं महेश्वरपरायणाः।<br>अन्ये च पुष्करद्वीपे प्रजाताश्च प्रजेश्वराः॥ ४८<br>प्रजापतेश्च रुद्रस्य भावामृतसुखोत्कटाः॥ ४९ | हारित, जीमूतके देशको जीमूत, रोहितके देशको रोहित, वैद्युतके देशको वैद्युत, मानसके देशको मानस और सुप्रभके देशको सुप्रभ कहा गया है। इस प्रकार राजाओंके नामसे सात देश हैं॥ ३८-४०^{१}/२॥<br>अब मैं जम्बूद्वीपके बाहर स्थित प्लक्षद्वीपका वर्णन करूँगा। प्लक्षद्वीपके राजा मेधातिथिके सात पुत्र थे, वे सब प्लक्षद्वीपमें [अलग-अलग देशोंके] शासक नरेश हुए। उनमें शान्तभय ज्येष्ठ थे। उस द्वीपमें सात देश हैं। उस शान्तभयके बाद शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक और ध्रुव—ये अन्य पुत्रोंके नाम थे। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें उनके नामोंसे द्वीपके भागानुसार सात वर्ष (देश) बसाये गये॥ ४१-४४॥<br>मेधातिथिके प्लक्षद्वीपनिवासी उन पुत्रोंद्वारा वर्णाश्रम-धर्मसे सम्पन्न प्रजाएँ वहाँ बसायी गयीं। प्लक्षद्वीप तथा शाकद्वीप आदि पाँचों द्वीपोंमें वर्ण एवं आश्रमके धर्मोंका सम्यक् पालन होता था। हे श्रेष्ठ द्विजो! इन पाँचों द्वीपोंमें सुख, आयु, स्वरूप, बल तथा धर्म सबके लिये समान बताया गया है। सभी लोग सदा रुद्रके अर्चनमें लीन रहते हैं तथा महेश्वरमें भक्ति रखते हैं। पुष्कर-द्वीपमें अन्य जो प्रजाएँ एवं राजा हैं, वे सब प्रजापालक रुद्रके श्रद्धारूपी अमृतपानके सुखकी प्रबल इच्छा रखते हैं॥ ४५-४९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशे द्वीपद्वीपेश्वरकथनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशमें द्वीपद्वीपेश्वरकथन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥
सैंतालीसवाँ अध्याय
जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन तथा आग्नीध्रके शिवभक्त नौ पुत्रोंका अजनाभवर्ष (भारतवर्ष), किम्पुरुषवर्ष आदि नौ वर्षों (देशों)-का स्वामी बनना
| सूत उवाच<br>आग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं काम्यपुत्रं महाबलम्।<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चद्वै जम्बूद्वीपेश्वरं नृपः॥ १<br>सोऽतीव भवभक्तश्च तपस्वी तरुणः सदा।<br>भवार्चनरतः श्रीमान् गोमान् धीमान् द्विजर्षभाः॥ २ | सूतजी बोले—राजा प्रियव्रतने अपने ज्येष्ठ उत्तराधिकारी महाबली प्रिय पुत्र आग्नीध्रको जम्बूद्वीपके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया॥ १॥<br>हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह महान् शिवभक्त, तपस्वी, तरुण, सदा शिवपूजनमें रत रहनेवाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, |