श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४८ ] भूमध्यमें स्थित मेरु ( सुमेरु ) पर्वत और इन्द्र आदि लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शराववत्संस्थितत्वाद् द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः।<br>विस्तारात्त्रिगुणश्चास्य परिणाहोऽनुमण्डलः॥ ३ | यह एक चौड़े शराव (कसोरा)-के समान स्थित है और बत्तीस हजार योजन चोटीपर फैला हुआ है। इसका घेरा इसके विस्तारसे तीन गुना है॥ २-३॥ |
| हैमीकृतो महेशस्य शुभाङ्गस्पर्शनेन च।<br>धत्तूरपुष्पसङ्काशः सर्वदेवनिकेतनः॥ ४ | यह महेश्वरके शुभ शरीरके स्पर्शसे सुवर्णका हो गया है। यह धतूरेके पुष्पके समान आभावाला, सभी देवताओंका निवासस्थान तथा देवताओंकी क्रीड़ाभूमि है और अनेक आश्चर्योंसे भरा हुआ है॥ ४ १/२॥ |
| क्रीडाभूमिश्च देवानामेकाश्चर्यसंयुतः।<br>लक्षयोजन आयामस्तस्यैवं तु महागिरेः॥ ५<br><br>ततः षोडशसाहस्रं योजनानि क्षितेरधः।<br>शेषञ्चोपरि विप्रेन्द्रा धरायास्तस्य शृङ्गिणः॥ ६<br><br>मूलायामप्रमाणं तु विस्तारान्मूलतो गिरेः।<br>ऊर्ध्वविस्तारमस्यैव द्विगुणं मूलतो गिरेः॥ ७ | इस महान् पर्वतका आयाम एक लाख योजन है। पृथ्वीके नीचे यह सोलह हजार योजनतक है और हे विप्रेन्द्रो! उस पर्वतका शेष भाग पृथ्वीके ऊपर है। इस पर्वतके मूलके आयाम (दैर्घ्य)-का प्रमाण विस्तारमें है; उसके विस्तारको पर्वतके मूलसे दुगुना कहा गया है॥ ५-७॥ |
| पूर्वतः पद्मरागाभो दक्षिणे हेमसंन्निभः।<br>पश्चिमे नीलसङ्काश उत्तरे विद्रुमप्रभः॥ ८ | यह पूर्वमें पद्मरागकी आभाके समान, दक्षिणमें स्वर्णके समान, पश्चिममें नीलमणिके समान और उत्तरमें मूँगेके समान है॥ ८॥ |
| अमरावती पूर्वभागे नानाप्रासादसङ्कुला।<br>नानादेवगणैः कीर्णा मणिजालसमावृता॥ ९<br><br>गोपुरैर्विविधाकारैर्हेमरत्नविभूषितैः ।<br>तोरणैर्हेमचित्रैस्तु मणिक्लृप्तैः पथि स्थितैः॥ १०<br><br>सँल्लापालापकुशलैः सर्वाभरणभूषितैः।<br>स्तनभारविनम्रैश्च मदघूर्णितलोचनैः॥ ११<br><br>स्त्रीसहस्रैः समाकीर्णा चाप्सरोभिः समन्ततः।<br>दीर्घिकाभिर्विचित्राभिः फुल्लाम्भोरुहसङ्कुलैः॥ १२<br><br>हेमसोपानसंयुक्तैर्हेमसैकतराशिभिः ।<br>नीलोत्पलैश्चोत्पलैश्च हैमैश्चापि सुगन्धिभिः॥ १३<br><br>एवंविधैस्तटाकैश्च नदीभिश्च नदैर्युता।<br>विराजते पुरी शुभ्रा तयासौ पर्वतः शुभः॥ १४ | इसके पूर्वभागमें अमरावती (इन्द्रपुरी) है, जो अनेक प्रकारके महलोंसे युक्त, अनेक देवताओंसे भरी हुई और मणिमय जालोंसे घिरी हुई है। यह विविध आकारवाले तथा स्वर्ण एवं रत्नोंसे विभूषित गोपुरों, सोने तथा मणियोंके बने हुए अद्भुत तोरणों, राजमार्गपर स्थित-वार्तालापमें प्रवीण-सभी आभूषणोंसे अलंकृत-स्तनके भारसे झुकी हुई एवं मदके कारण घूर्णित नेत्रोंवाली हजारों स्त्रियोंसे भरी और चारों ओरसे अप्सराओंसे घिरी हुई है। यह विचित्र बावलियोंसे युक्त है। यह खिले हुए कमलोंसे सुशोभित, स्वर्णकी बनी हुई सीढ़ियोंवाले, स्वर्णमय बालुओंवाले, नीलकमलों तथा अन्य प्रकारके कमलोंसे शोभायमान, सुगन्धित नील कमलों एवं स्वर्णकमलोंवाले इस प्रकारके सरोवरोंसे तथा नदियों और नदोंसे युक्त यह सुन्दर पुरी [अत्यन्त] शोभित है। उस पुरीसे यह सुन्दर पर्वत भी सुशोभित होता है॥ ९-१४॥ |
| तेजस्विनी नाम पुरी आग्नेय्यां पावकस्य तु।<br>अमरावतीसमा दिव्या सर्वभोगसमन्विता॥ १५ | इस पर्वतके आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भागमें अग्निदेवकी तेजस्विनी नामक पुरी है। यह अमरावतीतुल्य, दिव्य तथा समस्त भोगोंसे परिपूर्ण है॥ १५॥ |