श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वैवस्वती दक्षिणे तु यमस्य यमिनां वराः।<br>भवनैरावृता दिव्यैर्जाम्बूनदमयैः शुभैः॥ १६ | हे व्रतियोंमें श्रेष्ठ मुनिगण! इसके दक्षिणमें यमकी उत्तम वैवस्वती नामक पुरी है। यह सुवर्णमय, दिव्य तथा शुभ भवनोंसे घिरी हुई है॥ १६॥ |
| नैर्ऋते कृष्णवर्णा च तथा शुद्धवती शुभा।<br>तादृशी गन्धवन्ती च वायव्यां दिशि शोभना॥ १७ | इसके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-में कृष्णवर्णकी सुन्दर शुद्धवतीपुरी है और वायव्य (पश्चिम-उत्तर) दिशामें उसी प्रकारकी सुन्दर पुरी गन्धवती है। इसके उत्तरमें महोदया तथा ईशान (उत्तर-पूर्व)-में यशोवती नामक पुरी है। इस प्रकार मेरु पर्वतकी सभी दिशाओंमें द्युलोकमें पुरियाँ सर्वदा सुशोभित रहती हैं॥ १७-१८॥ |
| महोदया चोत्तरे च ऐशान्यां तु यशोवती।<br>पर्वतस्य दिगन्तेषु शोभते दिवि सर्वदा॥ १८ | |
| ब्रह्मविष्णुमहेशानां तथान्येषां निकेतनम्।<br>सर्वभोगयुतं पुण्यं दीर्घिकाभिर्नगोत्तमम्॥ १९ | यह पर्वत ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवताओंका निवासस्थान है। यह समस्त सुख-साधनोंसे सम्पन्न, पुण्यमय, अनेक झीलों और उत्तम वृक्षोंसे युक्त है। यह सिद्धों, यक्षों, गन्धर्वों, श्रेष्ठ मुनियों एवं विविध आकारवाले चारों प्रकारके प्राणियोंसे परिपूर्ण है॥ १९-२०॥ |
| सिद्धैर्यक्षैस्तु सम्पूर्णं गन्धर्वैर्मुनिपुङ्गवैः।<br>तथान्यैर्विविधाकारैर्भूतसङ्घैश्चतुर्विधैः ॥ २० | |
| गिरेरुपरि विप्रेन्द्राः शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>सहस्रभौमं विस्तीर्णं विमानं वामतः स्थितम्॥ २१ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस पर्वतके ऊपर शुद्ध स्फटिकके समान, हजार मण्डपोंसे युक्त तथा विस्तृत विमान बायीं ओर स्थित हैं। विशाल भुजाओंवाले तथा चन्द्र-सूर्य-अग्निरूप नेत्रोंवाले शिव उसमें मणिमय सिंहासनपर पार्वती-देवी तथा कार्तिकेयके साथ विराजमान रहते हैं॥ २१-२२॥ |
| तस्मिन् महाभुजः शर्वः सोमसूर्याग्निलोचनः।<br>सिंहासने मणिमये देव्यास्ते षण्मुखेन च॥ २२ | |
| हरेस्तदर्धं विस्तीर्णं विमानं तत्र सोऽपि च।<br>पद्मरागमयं दिव्यं पद्मजस्य च दक्षिणे॥ २३ | वहाँ विष्णुका भी विमान है, जो उन शिवके विमानके आधे विस्तारवाला है और दक्षिणमें पद्मयोनि ब्रह्माका पद्मरागमय दिव्य विमान है॥ २३॥ |
| तस्मिन् शक्रस्य विपुलं पुरं रम्यं यमस्य च।<br>सोमस्य वरुणस्याथ निर्ऋतेः पावकस्य च॥ २४ | उस मेरुपर शिवके भवनके चारों ओर इन्द्र, यम, चन्द्रमा, वरुण, निर्ऋति, पावक, वायु और रुद्रका विशाल तथा सुन्दर पुर है। विविध दिव्य विमानोंमें अन्य लोगोंका निवास है। उस ईश्वरक्षेत्र (शिवविमान)-में ईशानदिशामें नित्य पूजा होती रहती है। वहाँ भगवान् नन्दी सिद्धेश्वरोंके साथ रहते हैं और शिष्योंसहित सुरेश्वर सनत्कुमार सिद्धोंके साथ सुखपूर्वक आसीन रहते हैं। इसी प्रकार सनक, सनन्द और उन्हींके समान अन्य हजारों लोग विराजमान रहते हैं॥ २४-२७॥ |
| वायोश्चैव तु रुद्रस्य सर्कालयसमन्ततः।<br>तेषां तेषां विमानेषु दिव्येषु विविधेषु च॥ २५ | |
| ईशान्यामीश्वरक्षेत्रे नित्यार्चा च व्यवस्थिता।<br>सिद्धेश्वरैश्च भगवाँच्छैलादिः शिष्यसम्मतः॥ २६ | |
| सनत्कुमारः सिद्धैस्तु सुखासीनः सुरेश्वरः।<br>सनकश्च सनन्दश्च सदृशाश्च सहस्रशः॥ २७ | |
| योगभूमिः क्वचित्त्तस्मिन् भोगभूमिः क्वचित्क्वचित्।<br>बालसूर्यप्रतीकाशं विमानं तत्र शोभनम्॥ २८ | उस पर्वतपर कहीं-कहीं योगभूमि है और कहीं- |