श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४९] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन २११
| शैलादिनः शुभं चास्ति तस्मिन्नास्ते गणेश्वरः।<br>षण्मुखस्य गणेशस्य गणानां तु सहस्रशः॥ २९<br><br>सुयशायाः सुनेत्रायाः मातृणां मदनस्य च।<br>तस्य जम्बूनदी नाम मूलमावेष्ट्य संस्थिता॥ ३०<br><br>तस्य दक्षिणपार्श्वे तु जम्बूवृक्षः सुशोभनः।<br>अत्युच्छ्रितः सुविस्तीर्णः सर्वकालफलप्रदः॥ ३१<br><br>मेरोः समन्ताद्विस्तीर्णं शुभं वर्षमिलावृतम्।<br>तत्र जम्बूफलाहाराः केचिच्चामृतभोजनाः॥ ३२<br><br>जाम्बूनदसमप्रख्या नानावर्णाश्च भोगिनः।<br>मेरुपादाश्रितो विप्रा द्वीपोऽयं मध्यमः शुभः॥ ३३<br><br>नववर्षान्वितश्चैव नदीनदगिरीश्वरैः।<br>नववर्षं तु वक्ष्यामि जम्बूद्वीपं यथातथम्॥ ३४<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव योजनैश्च निबोधत॥ ३५। | कहीं भोगभूमि है। वहाँ उगते हुए सूर्यके सदृश, सुन्दर तथा शुभ विमान है, उसमें वे गणेश्वर विराजमान रहते हैं। वहाँ छः मुखोंवाले कार्तिकेय, गणेश, हजारों गणों, सुयशा तथा सुनेत्रा—इन पार्वतीकी सखियों, सभी माताओं तथा मदन (कामदेव)-के भी विमान हैं॥ २८-२९¹/₂॥<br><br>उस पर्वतके मूलको चारों ओरसे घेरकर जम्बू नामक नदी प्रवाहित होती है। उसके दक्षिण भागमें अत्यन्त सुन्दर, बहुत ऊँचा, अतिविस्तृत तथा सभी समयोंमें फल प्रदान करनेवाला जम्बूवृक्ष है॥ ३०-३१॥<br><br>मेरु पर्वतके चारों ओर इलावृत नामक विस्तृत तथा सुन्दर वर्ष (देश) है। वहाँपर लोग जम्बूफलका आहार करनेवाले हैं और कुछ लोग अमृतका आहार करनेवाले हैं। वहाँके लोग स्वर्णके समान आभावाले तथा अन्य वर्णोंवाले भी हैं और [सब प्रकारके] सुखोंको भोगनेवाले हैं। हे विप्रो! यह द्वीप मेरुके मूलके चारों ओर फैला हुआ, सुन्दर, मध्यमें स्थित, नौ वर्षोंसे युक्त और नदियों-नदों तथा महान् पर्वतोंसे समन्वित है। अब मैं नौ वर्षोंसे युक्त जम्बूद्वीपका यथार्थ वर्णन करूँगा; योजनोंमें इसके विस्तार, मण्डल आदिको [आपलोग] सुनिये॥ ३२-३५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मेरुगिरिवर्णनं नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मेरुगिरिवर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४८॥
उनचासवाँ अध्याय
जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन, वहाँके कुलपर्वतों, नदियों, वनों तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन
| सूत उवाच<br>शतमेकं सहस्त्राणां योजनानां स तु स्मृतः।<br>अनुद्वीपं सहस्त्राणां द्विगुणं द्विगुणोत्तरम्॥ १<br><br>पञ्चाशत्कोटिविस्तीर्णा ससमुद्रा धरा स्मृता।<br>द्वीपैश्च सप्तभिर्युक्ता लोकालोकावृता शुभा॥ २<br><br>नीलस्तथोत्तरे मेरोः श्वेतस्तस्योत्तरे पुनः।<br>शृङ्गी तस्योत्तरे विप्रास्त्रयस्ते वर्षपर्वताः॥ ३ | **सूतजी बोले—**यह द्वीप एक लाख योजन विस्तृत कहा गया है। इसके समीपमें स्थित प्लक्ष नामक द्वीप उसका दुगुना है और बादवाले द्वीप क्रमशः दुगुने विस्तारवाले हैं॥ १॥<br><br>समुद्रोंसहित यह पृथ्वी पचास करोड़ योजन विस्तृत है। यह सात द्वीपोंसे युक्त, लोकालोक पर्वतसे घिरी हुई तथा [अत्यन्त] सुन्दर है॥ २॥<br><br>हे विप्रो! मेरुके उत्तरमें नील पर्वत, उसके उत्तरमें श्वेत पर्वत और पुनः उसके उत्तरमें शृंगी पर्वत है; वे |