भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२१२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

तीनों वर्षपर्वत हैं॥ ३॥
जठरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ।<br>निषधो दक्षिणे मेरोस्तस्य दक्षिणतो गिरिः।<br>हेमकूट इति ख्यातो हिमवांस्तस्य दक्षिणे॥ ४<br>मेरोः पश्चिमतश्चैव पर्वतौ द्वौ धराधरो।<br>माल्यवान् गन्धमादश्च द्वावेतावुद्गायतो॥ ५इसके पूर्वमें जठर तथा देवकूट पर्वत हैं। मेरुके दक्षिणमें निषध पर्वत है। उसके दक्षिणमें हेमकूट पर्वत कहा गया है और उसके दक्षिणमें हिमवान् पर्वत है। मेरुके पश्चिममें माल्यवान् एवं गन्धमादन नामक दो पर्वत हैं; ये दोनों पर्वत उत्तरकी ओर फैले हुए हैं॥ ४-५॥
एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्रमेकशः॥ ६<br>इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्।<br>हेमकूटं परं तस्मान्नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्॥ ७<br>नैषधं हेमकूटात्तु हरिवर्षं तदुच्यते।<br>हरिवर्षात्परं चैव मेरोः शुभमिलावृतम्॥ ८<br>इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्।<br>रम्यात्परतरं श्वेतं विख्यातं तद्धिरण्मयम्॥ ९<br>हिरण्मयात्परं चापि शृङ्गी चैव कुरुः स्मृतः।<br>धनुःसंस्थे तु विज्ञेये द्वे वर्षे दक्षिणोत्तरे॥ १०ये पर्वतराज सिद्धों तथा चारणोंसे सेवित हैं और उनके बीचमें नौ हजार योजनका अन्तर है। हिमवान्‌का वर्ष भारतवर्ष नामवाला कहा गया है; उसके बाद हेमकूट और उसके परे किम्पुरुष वर्ष कहा गया है। हेमकूटसे परे नैषध है, उसके परे हरिवर्ष कहा गया है। हरिवर्ष और मेरुसे परे शुभ इलावृत है। इलावृतसे परे नील एवं रम्यक् कहे गये हैं। रम्यक्‌से परे श्वेत है, उसके परे हिरण्मय नामक वर्ष कहा गया है। हिरण्मयसे परे शृङ्गी पर्वत है और उसके परे कुरुवर्ष कहा गया है। धनुषके आकारवाले इन दोनों वर्षोंको दक्षिण तथा उत्तरमें स्थित जानना चाहिये॥ ६-१०॥
दीर्घाणि तत्र चत्वारि मध्यतस्तदिलावृतम्।<br>मेरोः पश्चिमपूर्वेण द्वे तु दीर्घेतरे स्मृते॥ ११<br>अर्वाक्तु निषधस्याथ वेद्यर्धं चोत्तरं स्मृतम्।<br>वेद्यर्धे दक्षिणे त्रीणि वर्षाणि त्रीणि चोत्तरे॥ १२अन्य चार बड़े वर्ष हैं। मध्यमें इलावृत है। मेरुके पश्चिम-पूर्वमें दो वर्ष हैं, जो छोटे कहे गये हैं। निषधके बाद वेदीका अर्धभाग उत्तर माना गया है, वेदीके अर्ध भागमें दक्षिणमें तीन वर्ष और उत्तर भागमें भी तीन वर्ष माने गये हैं॥ ११-१२॥
तयोर्मध्ये च विज्ञेयं मेरुमध्यमिलावृतम्।<br>दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ १३<br>उद्गायतो महाशैलो माल्यवान्नाम पर्वतः।<br>योजनानां सहस्रे द्वे उपरिष्टात्तु विस्तृतः॥ १४<br>आयामतश्चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि प्रकीर्तितः।नीलके दक्षिण तथा निषधके उत्तरमें उन दोनोंके बीच मेरुके मध्य इलावृतवर्षको जानना चाहिये। माल्यवान् नामक महापर्वत उत्तरकी ओर फैला हुआ है। यह ऊपरकी ओर दो हजार योजन फैला है। इसका आयाम चौंतीस हजार योजन बताया गया है॥ १३-१४ १/२॥
तस्य प्रतीच्यां विज्ञेयः पर्वतो गन्धमादनः॥ १५<br>आयामतः स विज्ञेयो माल्यवानिव विस्तृतः।<br>जम्बूद्वीपस्य विस्तारात्समेन तु समन्ततः॥ १६<br>प्रागायताः सुपर्वाणः षडेते वर्षपर्वताः।<br>अवगाढाश्चोभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ॥ १७उसके पश्चिममें गन्धमादन पर्वतको जानना चाहिये। उसे आयाममें माल्यवान्‌के समान विस्तृत समझना चाहिये। जम्बूद्वीपके विस्तारसे चारों ओर यह पर्वत बराबर फैला है। अच्छे पर्वोंवाले ये छः वर्षपर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं और पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रोंसे दोनों ओरसे बँधे हुए हैं॥ १५-१७॥
हिमप्रायस्तु हिमवान् हेमकूटस्तु हेमवान्।<br>तरुणादित्यसङ्काशो हैरण्यो निषधः स्मृतः॥ १८हिमवान् सदा बर्फसे आच्छादित रहता है। हेमकूट
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