भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ४९] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन [२१३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चतुर्वर्णः स सौवर्णो मेरुश्चोध्र्वायतः स्मृतः।<br>वृत्ताकृतिपरीणाहश्चतुरस्रः समुत्थितः॥ १९<br><br>नीलश्च वैडूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः।<br>मयूरबर्हवर्णस्तु शातकुम्भस्त्रिशृङ्गवान्॥ २०स्वर्णयुक्त है। निषध पर्वत मध्याह्नकालीन सूर्यके समान स्वर्णमय कहा गया है। चार वर्णोंवाला वह सुवर्णमय मेरु पर्वत ऊपरकी ओर फैला हुआ बताया गया है। यह परिधिमें वृत्ताकार है और चौकोर ऊँचा उठा हुआ है। नील पर्वत वैडूर्यमय है। श्वेत पर्वत शुक्लवर्णवाला है एवं स्वर्णसे पूर्ण रहता है। तीन चोटियोंवाला शृंगी पर्वत सुवर्णमय तथा मोरके पंखके रंगका है॥ १८—२०॥
एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्ताः पुनः शृणु गिरीश्वरान्।<br>मन्दरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ॥ २१<br><br>कैलासो गन्धमादश्च हेमवांश्चैव पर्वतौ।<br>पूर्वतश्चायतौवेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ २२<br><br>निषधः पारियात्रश्च द्वावेतौ वरपर्वतौ।<br>यथा पूर्वौ तथा याम्यावेतौ पश्चिमतः श्रितौ॥ २३<br><br>त्रिशृङ्गो जारुचिश्चैव उत्तरौ वरपर्वतौ।<br>पूर्वतश्चायतौवेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ ॥ २४<br><br>मर्यादापर्वतानेतानष्टावाहुर्मनीषिणः ।इस प्रकार पर्वतोंका वर्णन कर दिया गया, अब श्रेष्ठ पर्वतोंके विषयमें सुनिये। मन्दर तथा देवकूट पर्वत पूर्व दिशामें है। कैलास एवं स्वर्णमय गन्धमादन—ये दोनों पर्वत पूर्वकी ओर फैले हुए हैं और उनका अन्त समुद्रके भीतर होता है। निषध तथा पारियात्र—ये दोनों श्रेष्ठ पर्वत पश्चिमसे पूर्व तथा दक्षिणमें स्थित हैं। त्रिशृंग एवं जारुचि—ये दोनों महापर्वत उत्तरमें हैं तथा पूर्वकी ओर फैले हैं और समुद्रके भीतर व्यवस्थित हैं। विद्वान् लोग इन आठों पर्वतोंको मर्यादापर्वत कहते हैं॥ २१—२४ १/२॥
योऽसौ मेरुर्द्विजश्रेष्ठाः प्रांशुः कनकपर्वतः॥ २५<br><br>तस्य पादास्तु चत्वारश्चतुर्दिक्षु नगोत्तमाः।<br>यैर्विष्टब्धा न चलति सप्तद्वीपवती मही॥ २६<br><br>दशयोजनसाहस्रमायामस्तेषु पठ्यते।हे श्रेष्ठ द्विजो! मेरु नामक जो पर्वत है, वह ऊँचा स्वर्णमय पर्वत है। उसके चार चरणोंके रूपमें उसके चारों दिशाओंमें बड़े-बड़े चार उत्तम पर्वत हैं, जिनसे सहारा प्राप्त की हुई सात द्वीपवाली पृथ्वी हिलती नहीं है। उनका आयाम दस हजार योजन कहा गया है॥ २५-२६ १/२॥
पूर्वे तु मन्दरो नाम दक्षिणे गन्धमादनः॥ २७<br><br>विपुलः पश्चिमे पार्श्वे सुपार्श्वश्चोत्तरे स्मृतः।<br>महावृक्षाः समुत्पन्नाश्चत्वारो द्वीपकेतवः॥ २८<br><br>मन्दरस्य गिरेः शृङ्गे महावृक्षः स केतुराट्।<br>प्रलम्बशाखाशिखरः कदम्बश्चैत्यपादपः॥ २९पूर्वमें मन्दर, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिम भागमें विपुल और उत्तरमें सुपार्श्व नामक पर्वत कहा गया है। इनपर चार विशाल वृक्ष उगे हुए हैं, जो द्वीपके पताकातुल्य प्रतीत होते हैं। मन्दर पर्वतकी चोटीपर कदम्बका विशाल वृक्ष है। वह पताकाओंका राजा है और वह लम्बी लटकती हुई शाखाओंवाला है। यह कदम्बवृक्ष चैत्यपादप (पवित्र स्थानमें लगे वृक्ष)-के रूपमें प्रतिष्ठित है॥ २७—२९॥
दक्षिणस्यापि शैलस्य शिखरे देवसेविता।<br>जम्बूः सदा पुण्यफला सदा माल्योपशोभिता॥ ३०<br><br>सकेतुर्दक्षिणे द्वीपे जम्बूर्लोकेषु विश्रुता।<br>विपुलस्यापि शैलस्य पश्चिमे च महात्मनः॥ ३१दक्षिणमें स्थित [गन्धमादन] पर्वतके शिखरपर सदा देवताओंसे सेवित पवित्र फलोंसे सम्पन्न तथा पुष्पोंसे सुशोभित जम्बूवृक्ष है। यह जम्बूवृक्ष दक्षिण द्वीपमें पताकाके रूपमें है और सभी लोकोंमें प्रसिद्ध है॥ ३० १/२॥
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