श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४९ ] जम्बूद्वीपका विस्तृत वर्णन...वहाँ रहनेवाले लोगोंका वर्णन २१५
| Sanskrit | Hindi |
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| इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः।<br>तेषु तेषु च सर्वेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ ४८<br>रुद्रक्षेत्राणि दिव्यानि स्थापितानि सुरोत्तमैः।<br>दिग्भागे दक्षिणे प्रोक्ताः पश्चिमे च वदामि वः ॥ ४९<br>अपरेण सितोदश्च सुरपश्च महाबलः।<br>कुमुदो मधुमांश्चैव ह्यञ्जनो मुकुटस्तथा ॥ ५०<br>कृष्णाश्च पाण्डुरश्चैव सहस्रशिखरश्च यः।<br>पारिजातश्च शैलेन्द्रः श्रीशृङ्गश्चाचलोत्तमः ॥ ५१<br>इत्येते देवचरिता उत्कटाः पर्वतोत्तमाः।<br>सर्वे पश्चिमदिग्भागे रुद्रक्षेत्रसमन्विताः ॥ ५२ | ये सब देवताओंके द्वारा सेवित, उत्कट तथा उत्तम पर्वत हैं। उन-उन सभी पर्वतोंपर और वनोंमें श्रेष्ठ देवताओंके द्वारा दिव्य रुद्रक्षेत्र स्थापित किये गये हैं। इस प्रकार दक्षिण दिशामें स्थित पर्वतोंको बता दिया गया, अब मैं आपलोगोंको पश्चिममें विद्यमान पर्वतोंको बताता हूँ ॥ ४८–४९ ॥<br><br>सितोदके पश्चिममें सुरप, महाबल, कुमुद, मधुमान्, अंजन, मुकुट, कृष्ण, पाण्डुर, सहस्रशिखर, शैलेन्द्र, पारिजात और पर्वतोंमें उत्तम श्रीशृंग हैं। ये सभी उत्कट तथा उत्तम पर्वत पश्चिम दिशामें हैं, जो देवताओंके द्वारा सेवित हैं और रुद्रक्षेत्रोंसे युक्त हैं ॥ ५०–५२ ॥ |
| महाभद्रस्य सरसश्चोत्तरे च महाबलाः।<br>ये स्थिताः कीर्त्यमानांस्तान् सङ्क्षिप्येह निबोधत ॥ ५३<br>शङ्खकूतो महाशैलो वृषभो हंसपर्वतः।<br>नागश्च कपिलश्चैव इन्द्रशैलश्च सानुमान् ॥ ५४<br>नीलः कण्टकशृङ्गश्च शतशृङ्गश्च पर्वतः।<br>पुष्पकोशः प्रशैलश्च विरजश्चाचलोत्तमः ॥ ५५<br>वराहपर्वतश्चैव मयूरश्चाचलोत्तमः।<br>जारुधिश्चैव शैलेन्द्र एत उत्तरसंस्थिताः ॥ ५६<br>तेषु शैलेषु दिव्येषु देवदेवस्य शूलिनः।<br>असंख्यातानि दिव्यानि विमानानि सहस्रशः ॥ ५७ | महाभद्रसरके उत्तरमें जो शक्तिशाली पर्वत स्थित हैं, मैं उनका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ, आपलोग सुनिये। शंखकूट, महाशैल, वृषभ, हंसपर्वत, नाग, कपिल, इन्द्रशैल, सानुमान्, नील, कण्टकश्रृंग, पर्वत शतश्रृंग, पुष्पकोश, प्रशैल, पर्वतश्रेष्ठ विरज, वराहपर्वत, पर्वतश्रेष्ठ मयूर तथा शैलराज जारुधि—ये सब उत्तरमें स्थित हैं। उन दिव्य पर्वतोंपर देवदेव शिवके असंख्य दिव्य विमान हैं ॥ ५३–५७ ॥ |
| एतेषां शैलमुख्यानामन्तरेषु यथाक्रमम्।<br>सन्ति चैवान्तरद्रोण्यः सरांस्युपवनानि च ॥ ५८<br>वसन्ति देवा मुनयः सिद्धाश्च शिवभाविताः।<br>कृतवासाः सपत्नीकाः प्रसादात्परमेष्ठिनः ॥ ५९<br>लक्ष्म्याद्यानां बिल्ववने ककुभे कश्यपादयः।<br>तथा तालवने प्रोक्तमिन्द्रोपेन्द्रोरगात्मनाम् ॥ ६०<br>उदुम्बरे कर्दमस्य तथान्येषां महात्मनाम्।<br>विद्याधराणां सिद्धानां पुण्ये त्वाम्रावने शुभे ॥ ६१<br>नागानां सिद्धसङ्घानां तथा निम्बवने स्थितिः।<br>सूर्यस्य किंशुकवने तथा रुद्रगणस्य च ॥ ६२<br>बीजपूरवने पुण्ये देवाचार्यो व्यवस्थितः।<br>कौमुदे तु वने विष्णुप्रमुखानां महात्मनाम् ॥ ६३ | इन प्रमुख पर्वतोंके भीतर झरने, सरोवर तथा उपवन यथाक्रम स्थित हैं। यहाँ परमेष्ठी शिवकी कृपासे देवता, मुनि एवं सिद्ध शिवभक्तिसे युक्त होकर अपने निवासस्थान बनाकर पत्नियोंके साथ रहते हैं। लक्ष्मी आदिका निवास बिल्ववनमें है। कश्यप आदि ककुभ वनमें रहते हैं। इन्द्र, उपेन्द्र तथा श्रेष्ठ सर्पोंका निवास तालवनमें कहा गया है। कर्दम और अन्य महात्माओंका निवास उदुम्बरवनमें, विद्याधरों तथा सिद्धोंका निवास पवित्र एवं सुन्दर आम्रवनमें और नागों तथा सिद्धगणोंका निवास निम्बवनमें है। सूर्य तथा रुद्रगणोंका निवास किंशुकवनमें है। देवताओंके आचार्य पुण्यमय बीजपूरवन (बिजौरा नींबूका वन)-में निवास करते हैं। विष्णु आदि महात्माओंका वास कौमुद वनमें है ॥ ५८–६३ ॥ |
| स्थलपद्मवनान्तस्थन्यग्रोधेऽशेषभोगिनः ।<br>शेषस्त्वशेषजगतां पतिरास्तेऽतिगर्वितः ॥ ६४ | सर्पगण स्थलपद्मवनके अन्दर स्थित न्यग्रोधवनमें रहते हैं और जो सम्पूर्ण जगत्के पति गर्वित शेषनाग हैं, |