भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 238
२३६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम्।<br>इत्येते वै वसन्तीह द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥ २१<br>मधुश्च माधवश्चैव शुक्रश्च शुचिरेव च।<br>नभोनभस्यौ विप्रेन्द्रा इषश्चोर्जस्तथैव च॥ २२<br>सहःसहस्यौ च तथा तपस्यश्च तपः पुनः।<br>एते द्वादश मासास्तु वर्षं वै मानुषं द्विजाः॥ २३<br>वासन्तिकस्तथा ग्रैष्मः शुभो वै वार्षिकस्तथा।<br>शारदश्च हिमश्चैव शैशिरो ऋतवः स्मृताः॥ २४<br>धातार्यमाथ मित्रश्च वरुणश्चेन्द्र एव च।<br>विवस्वांश्चैव पूषा च पर्जन्योऽशुर्भगस्तथा॥ २५<br>त्वष्टा विष्णुः पुलस्त्यश्च पुलहश्चात्रिरेव च।<br>वसिष्ठश्चाङ्गिराश्चैव भृगुर्बुद्धिमतां वरः॥ २६<br>भारद्वाजो गौतमश्च कश्यपश्च क्रतुस्तथा।<br>जमदग्निः कौशिकश्च वासुकिः कङ्कणीकरः॥ २७<br>तक्षकश्च तथा नाग एलापत्रस्तथा द्विजाः।<br>शङ्खपालस्तथा चान्यस्तैरावत इति स्मृतः॥ २८<br>धनञ्जयो महापद्मस्तथा कर्कोटकः स्मृतः।<br>कम्बलोऽश्वतरश्चैव तुम्बुरुर्नारदस्तथा॥ २९<br>हाहा हूहूर्मुनिश्श्रेष्ठा विश्वावसुस्तनुत्तमः।<br>उग्रसेनोऽथ सुरुचिरन्यश्चैव परावसुः॥ ३०<br>चित्रसेनो महातेजाश्चोर्णायुश्चैव सुव्रताः।<br>धृतराष्ट्रः सूर्यवर्चा देवी साक्षात्कृतस्थला॥ ३१<br>शुभानना शुभश्रोणिर्दिव्या वै पुञ्जिकस्थला।<br>मेनका सहजन्या च प्रम्लोचाथ शुचिस्मिता॥ ३२<br>अनुम्लोचा घृताची च विश्वाची चोर्वशी तथा।<br>पूर्वचित्तिरिति ख्याता देवी साक्षात्तिलोत्तमा॥ ३३<br>रम्भा चाम्भोजवदना रथकृद् ग्रामणीः शुभः।<br>रथौजा रथचित्रश्च सुबाहुर्वै रथस्वनः॥ ३४<br>वरुणश्च तथैवान्यः सुषेणः सेनजिच्छुभः।<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च क्षतजित्सत्यजित्तथा॥ ३५<br>रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च पौरुषेयो वधस्तथा।<br>सर्पो व्याघ्रः पुनश्चापो वातो विद्युद्दिवाकरः॥ ३६<br>ब्रह्मोपेतश्च रक्षेन्द्रो यज्ञोपेतस्तथैव च।<br>एते देवादयः सर्वे वसन्त्यर्के क्रमेण तु॥ ३७<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः।<br>धात्रादिविष्णुपर्यन्ता देवा द्वादश कीर्तिताः॥ ३८ | करते हैं; यातुधान (राक्षसगण) उनका अनुगमन करते हैं और बालखिल्य [नामक ऋषिगण] उदयकालसे प्रारम्भ करके चारों ओरसे घेरकर सूर्यको अस्ताचलकी ओर ले जाते हैं। ये सब दो-दो महीने सूर्यमें निवास करते हैं॥ १९–२१॥<br><br>हे विप्रेन्द्रो! मधु (चैत्र), माधव (वैशाख), शुक्र (ज्येष्ठ), शुचि (आषाढ़), नभ (श्रावण), नभस्य (भाद्रपद), इष (आश्विन), ऊर्ज (कार्तिक), सह (मार्गशीर्ष), सहस्य (पौष), तपस्य (माघ) तथा तप (फाल्गुन)—ये बारह महीने मानव वर्षमें होते हैं। हे द्विजो! वसन्त, ग्रीष्म, शुभ वर्षा, शरद, हिम (हेमन्त) तथा शिशिर—ये ऋतुएँ कही गयी हैं॥ २२–२४॥<br><br>धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, इन्द्र, विवस्वान्, पूषा, पर्जन्य, अंशु, भग, त्वष्टा, विष्णु—ये बारह आदित्य हैं; पुलस्त्य, पुलह, अत्रि, वसिष्ठ, अंगिरा, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भृगु, भारद्वाज, गौतम, कश्यप, क्रतु, जमदग्नि तथा कौशिक—ये बारह ऋषि हैं; हे द्विजो! वासुकि, कंकणीकर, तक्षक, नाग, एलापत्र, शंखपाल, ऐरावत, धनंजय, महापद्म, कर्कोटक, कम्बल तथा अश्वतर—ये बारह सर्प कहे गये हैं; हे मुनिश्रेष्ठो! तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू, श्रेष्ठ विश्वावसु, उग्रसेन, सुरुचि, परावसु, चित्रसेन, महातेजस्वी ऊर्णायु, धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा—ये बारह गन्धर्व हैं; हे सुव्रतो! साक्षात् देवी कृतस्थला, सुन्दर मुखवाली—उत्तम श्रोणिवाली दिव्य पुंजिकस्थला, मेनका, सहजन्या, पवित्र मुसकानवाली प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, विश्वाची, उर्वशी, पूर्वचित्ति, साक्षात् देवी तिलोत्तमा तथा कमलके समान मुखवाली रम्भा—ये बारह अप्सराएँ कही गयी हैं; रथकृत्, शुभ रथौजा, रथचित्र, सुबाहु, रथस्वन, वरुण, सुषेण, शुभ सेनजित्, तार्क्ष्य, अरिष्टनेमि, क्षतजित् तथा सत्यजित्—ये बारह ग्रामणी हैं; हेति, प्रहेति, पौरुषेय, वध, सर्प, व्याघ्र, आप, वात, विद्युत्, दिवाकर, ब्रह्मोपेत और राक्षसराज यज्ञोपेत—ये बारह यातुधान (राक्षस) हैं—ये सभी देवता आदि क्रमसे सूर्यमें निवास करते हैं। बारहकी संख्यावाले ये सात गण अपने स्थानका अभिमान |