भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| अध्याय ५५ ] | शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन | २३७ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
करनेवाले हैं॥ २५-३७१/२॥
आदित्यं परमं भानुं भाभिराप्याययन्ति ते।<br>पुलस्त्याद्याः कौशिकान्ता मुनयो मुनिसत्तमाः॥ ३९<br><br>द्वादशैव स्तवैर्भानुं स्तुवन्ति च यथाक्रमम्।<br>नागाश्चाश्वतरान्तास्तु वासुकिप्रमुखाः शुभाः॥ ४०<br><br>द्वादशैव महादेवं वहन्त्येवं यथाक्रमम्।<br>क्रमेण सूर्यवर्चान्तास्तुम्बुरुप्रमुखाम्बुपम्॥ ४१<br><br>गीतैरेनमुपासन्ते गन्धर्वा द्वादशोत्त्तमाः।<br>कृतस्थलाद्या रम्भान्ता दिव्याश्चाप्सरसो रविम्॥ ४२<br><br>ताण्डवैः सरसैः सर्वाश्चोपासन्ते यथाक्रमम्।<br>दिव्याः सत्यजिदन्ताश्च ग्रामण्यो रथकृन्मुखाः॥ ४३<br><br>द्वादशास्य क्रमेणैव कुर्वते भीषुसङ्ग्रहम्।<br>प्रयान्ति यज्ञोपेतान्ता रक्षोहेतिमुखाः सह॥ ४४<br><br>सायुधा द्वादशैवैते राक्षसाश्च यथाक्रमम्।धातासे लेकर विष्णुपर्यन्त जो बारह देवता (आदित्य) कहे गये हैं, वे अपने तेजसे परम भानुको सन्तृप्त करते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! पुलस्त्यसे लेकर कौशिकतक [कहे गये] बारह मुनिगण यथाक्रम स्तुतियोंके द्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं। इसी प्रकार वासुकिसे लेकर अश्वतरतक [कहे गये] बारह शुभ नाग यथाक्रम महादेव (सूर्य)-का वहन करते हैं। तुम्बुरुसे लेकर सूर्यवर्चातक [कहे गये] बारह उत्तम गन्धर्व क्रमसे गीतोंके द्वारा इन सूर्यकी उपासना करते हैं। कृतस्थलासे लेकर रम्भा-पर्यन्त [कही गयी] सभी दिव्य अप्सराएँ यथाक्रम सरस नृत्योंके द्वारा सूर्यकी उपासना करती हैं। रथकृत्से लेकर सत्यजित्पर्यन्त [कहे गये] बारह दिव्य ग्रामणी क्रमसे इस सूर्यकी रथरश्मियोंका संग्रह करते हैं। रक्षोहेतिसे लेकर यज्ञोपेततक [कहे गये]—ये प्रमुख बारह राक्षस शस्त्र धारण करके क्रमसे [सूर्यके] पीछे-पीछे चलते हैं॥ ३८-४४१/२॥
धातार्यमा पुलस्त्यश्च पुलहश्च प्रजापतिः॥ ४५<br><br>उरगो वासुकिश्चैव कङ्कणीकश्च तावुभौ।<br>तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ गायतां वरौ॥ ४६<br><br>कृतस्थलाप्सराश्चैव तथा वै पुञ्जिकस्थला।<br>ग्रामणी रथकृच्चैव रथौजाश्चैव तावुभौ॥ ४७<br><br>रक्षो हेतिः प्रहेतिश्च यातुधानावुदाहृतौ।<br>मधुमाधवयोरेष गणो वसति भास्करे॥ ४८धाता तथा अर्यमा [दो आदित्य], प्रजापति पुलस्त्य तथा पुलह [दो ऋषि], वे दोनों नाग वासुकि एवं कंकणीक, गान करनेवालोंमें श्रेष्ठ गन्धर्व तुम्बुरु तथा नारद, कृतस्थला एवं पुंजिकस्थला अप्सराएँ, वे दोनों ग्रामणी रथकृत् तथा रथौजा और यातुधान कहे गये राक्षस हेति तथा प्रहेति—यह समुदाय चैत्र एवं वैशाख महीनोंमें सूर्यमें निवास करता है॥ ४५-४८॥
वसन्ति ग्रीष्मकौ मासौ मित्रश्च वरुणश्च ह।<br>ऋषिरत्रिर्वसिष्ठश्च तक्षको नाग एव च॥ ४९<br><br>मेनका सहजन्या च गन्धर्वौ च हाहाहूहूः।<br>सुबाहुनामा ग्रामण्यौ रथचित्रश्च तावुभौ॥ ५०<br><br>पौरुषेयो वधश्चैव यातुधानावुदाहृतौ।<br>एते वसन्ति वै सूर्ये मासयोः शुचिशुक्रयोः॥ ५१इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतुके दो महीनोंमें भी ये लोग निवास करते हैं। [दो आदित्य] मित्र तथा वरुण, ऋषि अत्रि एवं वसिष्ठ, [सर्प] तक्षक तथा नाग, [दो अप्सराएँ] मेनका और सहजन्या, दो गन्धर्व हाहा तथा हूहू, रथचित्र एवं सुबाहु नामक वे दोनों ग्रामणी और यातुधान कहे गये पौरुषेय तथा वध—ये सब शुक्र (ज्येष्ठ) तथा शुचि (आषाढ़) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ४९-५१॥
ततः सूर्ये पुनश्चान्या निवसन्तीह देवताः।<br>इन्द्रश्चैव विवस्वांश्च अङ्गिरा भृगुरेव च॥ ५२<br><br>एलापत्रस्तथा सर्पः शङ्खपालश्च तावुभौ।<br>विश्वावसुस्सुसेनौ च वरुणश्च रथस्वनः॥ ५३इसके बाद अन्य देवता सूर्यमें निवास करते हैं। [आदित्य] इन्द्र तथा विवस्वान्, [ऋषि] अंगिरा तथा भृगु, वे दोनों सर्प एलापत्र एवं शंखपाल, [गन्धर्व]