भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 240
२३८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रम्लोचा चैव विख्याता अनुम्लोचा च ते उभे।<br>यातुधानास्तथा सर्पो व्याघ्रश्चैव तु तावुभौ॥ ५४<br>नभोनभस्ययोरेष गणो वसति भास्करे।विश्वावसु तथा उग्रसेन, [ग्रामणी] वरुण एवं रथस्वन, विख्यात प्रम्लोचा तथा अनुम्लोचा—वे दोनों अप्सराएँ और वे दोनों यातुधान सर्प तथा व्याघ्र—यह समुदाय नभ (श्रावण) तथा नभस्य (भाद्रपद) महीनोंमें सूर्यमें निवास करता है॥ ५२—५४ १/२॥
पर्जन्यश्चैव पूषा च भरद्वाजोऽथ गौतमः॥ ५५<br>धनञ्जय इरांवांश्च सुरुचिः सपरावसुः।<br>घृताची चाप्सरःश्रेष्ठा विश्वाची चातिशोभना॥ ५६<br>सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।<br>आपो वातश्च तावेतौ यातुधानावुभौ स्मृतौ॥ ५७<br>वसन्त्येते तु वै सूर्ये मास ऊर्ज इषे च ह।[आदित्य] पर्जन्य तथा पूषा, [ऋषि] भरद्वाज एवं गौतम, [सर्प] धनंजय तथा इरावान् (ऐरावत), [गन्धर्व] सुरुचि तथा परावसु, अप्सराओंमें श्रेष्ठ घृताची तथा परम सुन्दर विश्वाची, वे दोनों ग्रामणी—सेनानी सेनजित् तथा सुषेण और यातुधान कहे गये वे दोनों आप तथा वात—ये सब इष (आश्विन) तथा ऊर्ज (कार्तिक) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ५५—५७ १/२॥
हैमन्तिकौ तु द्वौ मासौ वसन्ति च दिवाकरे॥ ५८<br>अंशुर्भगश्च द्वावेतौ कश्यपश्च क्रतुः सह।<br>भुजङ्गश्च महापद्मः सर्पः कर्कोटकस्तथा॥ ५९<br>चित्रसेनश्च गन्धर्व ऊर्णायुश्चैव तावुभौ।<br>उर्वशी पूर्वचित्तिश्च तथैवाप्सरसावुभे॥ ६०<br>तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीर्ग्रामणीश्च तौ।<br>विद्युद्दिवाकरश्चोभौ यातुधानावुदाहृतौ॥ ६१<br>सहे चैव सहस्ये च वसन्त्येते दिवाकरे।इसी प्रकार हेमन्त ऋतुके दो महीनोंमें भी ये लोग सूर्यमें निवास करते हैं। ये दोनों [आदित्य] अंशु तथा भग, [ऋषि] कश्यप तथा क्रतु, भुजंग महापद्म तथा सर्प कर्कोटक, वे दोनों गन्धर्व चित्रसेन तथा ऊर्णायु, दोनों अप्सराएँ उर्वशी तथा पूर्वचित्ति, ग्रामणी—सेनानी तार्क्ष्य तथा अरिष्टनेमि और यातुधान कहे गये दोनों विद्युत् तथा दिवाकर—ये सब सह (मार्गशीर्ष) तथा सहस्य (पौष) महीनोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ५८—६१ १/२॥
ततः शैशिरयोश्चापि मासयोर्निवसन्ति वै॥ ६२<br>त्वष्टा विष्णुर्जमदग्निर्विश्वामित्रस्तथैव च।<br>काद्रवेयौ तथा नागौ कम्बलाश्वतरावुभौ॥ ६३<br>धृतराष्ट्रः सगन्धर्वः सूर्यवर्चास्तथैव च।<br>तिलोत्तमाप्सराश्चैव देवी रम्भा मनोहरा॥ ६४<br>रथजित्सत्यजिच्चैव ग्रामण्यौ लोकविश्रुतौ।<br>ब्रह्मोपेतस्तथा रक्षो यज्ञोपेतश्च यः स्मृतः॥ ६५इसके बाद [आदित्य] त्वष्टा तथा विष्णु, [ऋषि] जमदग्नि तथा विश्वामित्र, कद्रूके पुत्र दोनों नाग कम्बल तथा अश्वतर, गन्धर्व धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा, मनोहर अप्सरा देवी रम्भा तथा तिलोत्तमा, लोकमें प्रसिद्ध ग्रामणी रथजित् तथा सत्यजित् और ब्रह्मोपेत तथा यज्ञोपेत—जो यातुधान कहे गये हैं—ये सब शिशिर ऋतुके दो महीनों (माघ और फाल्गुन)-में [सूर्यमें] निवास करते हैं॥ ६२—६५॥
एते देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः॥ ६६<br>सूर्यमाप्याययन्त्येते तेजसा तेज उत्तमम्।<br>ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्॥ ६७<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव नृत्यगेयैरुपासते।<br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषुसङ्ग्रहम्॥ ६८<br>सर्पा वहन्ति वै सूर्यं यातुधानानुयान्ति वै।<br>बालखिल्या नयन्त्यस्तं परिवार्योदयाद्रविम्॥ ६९ये देवतागण क्रमसे दो-दो महीने सूर्यमें निवास करते हैं। बारहकी संख्यामें ये सात समूह अपने स्थानका अभिमान करनेवाले हैं। ये सब तेजके द्वारा उत्तम तेजवाले सूर्यको सन्तृप्त करते हैं। मुनिगण अपने द्वारा विरचित स्तुतियोंसे सूर्यका स्तवन करते हैं, गन्धर्व तथा अप्सराएँ नृत्य-गानोंसे उनकी उपासना करते हैं, ग्रामणी-यक्ष-भूत रथरश्मियोंको पकड़े रहते हैं, सर्पगण सूर्यका वहन करते हैं, यातुधान पीछे-पीछे चलते हैं और बालखिल्य