भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ५५] शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन [२३१

एतेषामेव देवानां यथा तेजो यथा तपः।<br>यथायोगं यथामन्त्रं यथाधर्मं यथाबलम्॥ ७०<br><br>तथा तपत्यसौ सूर्यस्तेषामिद्धस्तु तेजसा।<br>इत्येते वै वसन्तीह द्वौ द्वौ मासौ दिवाकरे॥ ७१<br><br>ऋषयो देवगन्धर्वपन्नगाप्सरसां गणाः।<br>ग्रामण्यश्च तथा यक्षा यातुधानाश्च मुख्यतः॥ ७२<br><br>एते तपन्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।<br>भूतानामशुभं कर्म व्यपोहन्तीह कीर्तिताः॥ ७३<br><br>मानवानां शुभं ह्येते हरन्ति च दुरात्मनाम्।<br>दुरितं सुप्रचाराणां व्यपोहन्ति क्वचित्क्वचित्॥ ७४[ऋषिगण] चारों ओरसे घेरकर सूर्यको उदयसे अस्तकी प्राप्ति कराते हैं॥ ६६-६९॥<br><br>इन्हीं देवताओंका जैसा तेज, जैसा तप, जैसा योग, जैसा मन्त्र, जैसा धर्म तथा जैसा बल होता है, उनसे समृद्ध होकर वे सूर्य तेजयुक्त होकर तपते हैं। ये सभी सूर्यमें दो-दो महीने निवास करते हैं। ऋषिगण, देवता, गन्धर्व, सर्प, अप्सराओंके समूह, ग्रामणी, यक्ष तथा यातुधान (राक्षस) ये ही मुख्यरूपसे तपते हैं, बरसते हैं, प्रकाश करते हैं, सृजन करते हैं और आराधित होकर प्राणियोंके अशुभ कर्मका नाश करते हैं। ये लोग दुरात्मा मनुष्योंके शुभका नाश करते हैं और कहीं-कहीं सज्जनोंके पापका हरण करते हैं॥ ७०-७४॥
विमाने च स्थिता दिव्ये कामगे वातरंहसि।<br>एते सहैव सूर्येण भ्रमन्ति दिवसानुगाः॥ ७५<br><br>वर्षन्तश्च तपन्तश्च ह्लादयन्तश्च वै द्विजाः।<br>गोपायन्तीह भूतानि सर्वाणि ह्यामन्वक्षयात्॥ ७६ये इच्छानुसार चलनेवाले तथा वायुवेगसे गमन करनेवाले दिव्य विमानमें स्थित होकर सूर्यके साथ पूरे दिन भ्रमण करते हैं। हे द्विजो! ये वर्षा करते हुए, तपते हुए और [सबको] आह्लादित करते हुए सभी प्राणियोंको एक मन्वन्तरपर्यन्त विनाशसे बचाते हैं॥ ७५-७६॥
स्थानाभिमानिनामेतत्स्थानं मन्वन्तरेषु वै।<br>अतीतानागतानां वै वर्तन्ते साम्प्रतं च ये॥ ७७<br><br>एते वसन्ति वै सूर्ये सप्तकास्ते चतुर्दश।<br>चतुर्दशसु सर्वेषु गणा मन्वन्तरेष्विह॥ ७८अतीत तथा अनागत (भविष्यमें होनेवाले) स्थानाभिमानियोंका तथा इस समय जो विद्यमान हैं, उन सभीका यह स्थान सभी मन्वन्तरोंमें हुआ करता है। ये चौदह गण सात-सातके समूहमें सभी चौदह मन्वन्तरोंमें सूर्यमें निवास करते हैं॥ ७७-७८॥
सङ्क्षेपादद्विस्तराच्चैव यथावृत्तं यथाश्रुतम्।<br>कथितं मुनिशार्दूला देवदेवस्य धीमतः॥ ७९<br><br>एते देवा वसन्त्यर्के द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>स्थानाभिमानिनो ह्येते गणा द्वादश सप्तकाः॥ ८०हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने बुद्धिमान् देवदेवके क्रिया-कलापका संक्षेपमें तथा विस्तारसे वर्णन कर दिया, जैसा घटित हुआ था और जैसा मैंने सुना था। ये देवता दो-दो महीने क्रमसे सूर्यमें निवास करते हैं। बारह-बारह देवताओंके ये सात समूह अपने स्थान (पद)-का अभिमान करनेवाले हैं॥ ७९-८०॥
इत्येष एकचक्रेण सूर्यस्तूर्णं रथेन तु।<br>हरितैरक्षरैरश्वैः सर्पतेऽसौ दिवाकरः॥ ८१<br><br>अहोरात्रं रथेनासावेकचक्रेण तु भ्रमन्।<br>सप्तद्वीपसमुद्रां गां सप्तभिः सर्पते दिवि॥ ८२इस प्रकार ये दिवाकर सूर्य हरितवर्णके [सात] अविनाशी अश्वोंद्वारा खींचे जाते हुए एक चक्रवाले रथसे वेगपूर्वक चलते हैं। ये सूर्य एक चक्रवाले रथसे [उक्त] सात समूहोंके साथ आकाशमें दिन-रात भ्रमण करते हुए सात द्वीपों तथा समुद्रोंवाली पृथ्वीके ऊपर भ्रमण करते हैं॥ ८१-८२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यरथनिर्णयो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यरथनिर्णय' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५५॥