भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 834 में से

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पृष्ठ 243

अध्याय ५७] बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप तथा उनकी गतिका निरूपण २४१ ततः पञ्चदशे भागे किञ्चिच्छिष्टे कलात्मके। आधे महीनेतक पान करके वे श्रेष्ठ देवता अमावास्या अपराह्ने पितृगणा जघन्यं पर्युपासते॥ १४ तिथिको चले जाते हैं, उसके बाद उसी अमावास्या तिथिको पितृगण चन्द्रमाके पास स्थित होते हैं और पिबन्ति द्विकलां कालं शिष्टा तस्य कला तु या। शुक्लपक्षकी प्रतिपदातक बचे हुए अमृतका पान करते निःसृतं तदमावास्यां गभस्तिभ्यः स्वधामृतम्॥ १५ हैं। अन्तिम कलाके रूपमें पन्द्रहवें भागके शेष रहनेपर अपराह्नमें पितृगण चन्द्रमाके पास आ जाते हैं और मासतृप्तिमवाप्याग्र्यां पीत्वा गच्छन्ति तेऽमृतम्। उसकी जो कला बची रहती है, उसका पान दो पितृभिः पीयमानस्य पञ्चदश्यां कला तु या॥ १६ कलावाले समय (दो घड़ी)-तक करते हैं। अमावास्या तिथिको किरणोंसे निकले हुए स्वधामृतको पीते हैं। इस यावत्तु क्षीयते तस्य भागः पञ्चदशस्तु सः। प्रकार अमृत पीकर महीनेभरकी तृप्ति प्राप्त करके वे अमावास्यां ततस्तस्या अन्तरा पूर्यते पुनः॥ १७ चले जाते हैं। प्रत्येक पक्षके आरम्भमें सोलहवें दिन चन्द्रमाकी वृद्धि तथा क्षयका होना बताया गया है। इस वृद्धिक्षयौ वै पक्षादौ षोडश्यां शशिनः स्मृतौ। प्रकार पक्षमें चन्द्रमामें होनेवाली यह वृद्धि सूर्यके कारण एवं सूर्यनिमित्तैषा पक्षवृद्धिर्निशाकरे॥ १८ होती है॥ ८-१८॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवर्णनं नाम षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवर्णन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ सत्तावनवाँ अध्याय बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप, ग्रह-नक्षत्रों एवं तारागणोंद्वारा ध्रुवका परिभ्रमण, ग्रहोंका स्वरूप-विस्तार तथा उनकी गतिका निरूपण सूत उवाच सूतजी बोले- [हे ऋषियो!] चन्द्रमाके पुत्र अष्टभिश्च हयैर्युक्तः सोमपुत्रस्य वै रथः। [बुध]-का रथ जल-अग्निमय और पिशांगवर्णवाले वारितेजोमयश्चाथ पिशाङ्गैश्चैव शोभनैः ॥ १ सुन्दर आठ घोड़ोंसे युक्त है। दैत्योंके आचार्य बुद्धिमान् दशभिश्चाकृशैश्शश्वैर्नानावर्णै रथः स्मृतः। शुक्रका रथ पुष्ट, विभिन्न वर्णोंवाले तथा पृथ्वीयम दस शुक्रस्य क्षमामयैर्युक्तो दैत्याचार्यस्य धीमतः ॥ २ घोड़ोंसे युक्त कहा गया है। मंगलका रथ सुवर्णमय, परम अष्टाश्वश्चाथ भौमस्य रथो हैमः सुशोभनः। सुन्दर एवं आठ घोड़ोंवाला है। बृहस्पतिका रथ सुवर्णमय जीवस्य हैमश्चाष्टाश्वो मन्दस्यायसनिर्मितः ॥ ३ है तथा आठ घोड़ोंसे युक्त है। शनैश्चरका रथ लोहेका बना हुआ है और वह काले वर्णवाले जलमय दस रथ आपोमयैरश्वैर्दशभिस्तु सितेतरैः। घोड़ोंसे युक्त है। राहु-केतुका रथ आठ घोड़ोंवाला कहा स्वर्भानोर्भास्करारेश्च तथा चाष्टहयः स्मृतः॥ ४ गया है ॥ १-४॥ सर्वे ध्रुवनिबद्धा वै ग्रहास्ते वातरश्मिभिः। वे सभी ग्रह वायुरश्मियोंके द्वारा ध्रुवसे बँधे हुए एतेन भ्राम्यमाणाश्च यथायोगं व्रजन्ति वै॥५ हैं। इसके द्वारा घुमाये जाते हुए वे यथायोग चलते हैं। यावन्त्यश्चैव ताराश्च तावन्तश्चैव रश्मयः। जितने तारे हैं, उतनी ही [वात] रश्मियाँ हैं। वे सब सर्वे ध्रुवनिबद्धाश्च भ्रमन्तो भ्रामयन्ति तम्॥ ६ ध्रुवसे बँधे हुए हैं और [स्वयं] घूमते हुए उस ध्रुवको

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