भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत (मूल श्लोक)हिन्दी अनुवाद
अलातचक्रवद्यान्ति वातचक्रेरितानि तु।<br>यस्माद्वहति ज्योतींषि प्रवहस्तेन स स्मृतः॥ ७घुमाते हैं। वातचक्रसे प्रेरित तारागण अंगारचक्रके समान घूमते हैं। चूँकि इन ग्रह-नक्षत्रोंका वहन वायु करता है, इसलिये उसे प्रवह कहा गया है॥ ५-७॥
नक्षत्रसूर्य्याश्च तथा ग्रहतारागणैः सह।<br>उन्मुखाभिमुखाः सर्वे चक्रभूताः श्रिता दिवि॥ ८<br>ध्रुवेणाधिष्ठिताश्चैव ध्रुवमेव प्रदक्षिणम्।<br>प्रयान्ति चेश्वरं द्रष्टुं मेढीभूतं ध्रुवं दिवि॥ ९ग्रहों तथा तारागणोंके साथ नक्षत्र तथा सूर्य सब-के-सब चक्ररूपमें उन्मुख एवं अभिमुख होकर आकाशमें स्थित हैं। ध्रुवके द्वारा नियन्त्रित वे सब ध्रुवकी प्रदक्षिणा करते हैं। वे धुरीरूप ईश्वर ध्रुवको देखनेके लिये आकाशमें भ्रमण करते हैं॥ ८-९॥
नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ १०<br>द्विगुणः सूर्य्यविस्ताराद्विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाधस्तात्प्रसर्पति॥ ११<br>उद्धृत्य पृथिवीछायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत्स्थानं तृतीयं यत्तमोमयम्॥ १२सूर्यका व्यास नौ हजार योजन कहा गया और इस प्रमाणके अनुसार उनके मण्डलका विस्तार तीन गुना है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना बताया गया है। उन दोनोंके बराबर होकर राहु नीचेसे चलता है। मण्डलाकार बनी हुई पृथ्वीछायाको लेकर राहुका तीसरा बड़ा स्थान है, जो अन्धकारमय है॥ १०-१२॥
चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते।<br>विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनाच्च प्रमाणतः॥ १३<br>भार्गवात्पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः।<br>पादहीनौ वक्रसौरी तथायामप्रमाणतः॥ १४<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः।<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै॥ १५<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्तारान्मण्डलादपि।<br>प्रायशश्चन्द्रयोगीनि विद्यादृक्षाणि तत्त्ववित्॥ १६योजनके प्रमाणसे शुक्रका व्यास तथा मण्डल चन्द्रमाके व्यास एवं मण्डलका सोलहवाँ भाग कहा गया है। [आकारमें] बृहस्पतिको शुक्रसे एक चौथाई कम कहा गया है। विस्तारके प्रमाणसे मंगल तथा शनि बृहस्पतिसे एक चौथाई कम हैं। [अर्थात् मंगल एवं शनि विस्तारमें बृहस्पतिके तीन चौथाई हैं] बुध विस्तार तथा मण्डलमें उन दोनोंका तीन चौथाई है। तारा-नक्षत्ररूप जो पिण्ड हैं, वे विस्तार तथा मण्डलमें बुधके तुल्य हैं, तत्त्ववेत्ताको चन्द्रमासे युक्त उन नक्षत्रोंको 'ऋक्ष' नामसे जानना चाहिये॥ १३-१६॥
तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्।<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने॥ १७<br>सर्वोपरि निकृष्टानि तारकामण्डलानि तु।<br>योजनद्वयमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते॥ १८<br>उपरिष्टात्रयस्तेषां ग्रहा ये दूरसर्पिणः।<br>सौरौऽङ्गिराश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः॥ १९<br>तेभ्योऽधस्तात्तु चत्वारः पुनरन्ये महाग्रहाः।<br>सूर्यः सोमो बुधश्चैव भार्गवश्चैव शीघ्रगाः॥ २०छोटे-छोटे असंख्य तारे तथा नक्षत्र परस्पर पाँच, चार, तीन एवं दो योजनकी दूरीपर हैं। सबसे ऊपर अत्यन्त छोटे तारामण्डल हैं, जो केवल दो योजन विस्तारवाले हैं, उनसे छोटे तारे नहीं हैं। उनके ऊपर तीन ग्रह शनि, बृहस्पति तथा मंगल; जो दूरकी यात्रा करनेवाले हैं, उन्हें मन्दगतिवाला जानना चाहिये। उनके नीचे चार अन्य बड़े ग्रह सूर्य, चन्द्रमा, बुध तथा शुक्र हैं, जो तेजीसे चलनेवाले हैं॥ १७-२०॥
तावन्त्यस्तारकाः कोट्यो यावन्त्यृक्षाणि सर्वशः।<br>ध्रुवात्तु नियमाच्चैषामृक्षमार्गे व्यवस्थितिः॥ २१<br>सप्ताश्वस्यैव सूर्यस्य नीचोच्चत्वमनुक्रमात्।<br>उत्तरायणमार्गस्थो यदा पर्वसु चन्द्रमाः॥ २२तारागण उतने ही करोड़ हैं, जितने सभी ऋक्ष (नक्षत्र) हैं। ऋक्षमार्गमें उनकी भी स्थिति ध्रुवके नियन्त्रणसे ही है। सात घोड़ोंवाले सूर्यका अनुक्रमसे