श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ५७ ] बुध आदि ग्रहोंके रथोंका स्वरूप तथा उनकी गतिका निरूपण २४३
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
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| उच्चत्वाद दृश्यते शीघ्रं नातिव्यक्तैर्गभस्तिभिः।<br>तदा दक्षिणमार्गस्थो नीचां वीथीमुपाश्रितः॥ २३<br><br>भूमिरेखावृतः सूर्यः पौर्णिमावास्ययोस्तदा।<br>ददृशे च यथाकालं शीघ्रमस्तमुपैति च॥ २४<br><br>तस्मादुत्तरमार्गस्थो ह्यमावास्यां निशाकरः।<br>ददृशे दक्षिणे मार्गे नियमाद् दृश्यते न च॥ २५ | नीचोच्चत्व (नीचा तथा ऊँचा होना) होता रहता है। जब सूर्य उत्तरायणमार्गमें स्थित होते हैं और चन्द्रमा पूर्ण मण्डलमें होते हैं, तब सूर्य कुछ अस्पष्ट किरणोंके साथ उच्चत्वके कारण शीघ्र दिखायी पड़ते हैं। जब सूर्य दक्षिणायनमार्गमें स्थित होते हैं, तब वे नीचेवाली वीथीमें रहते हैं। पृथ्वीकी रेखाद्वारा ढँका हुआ सूर्य उससे नीचे होता है। पूर्णिमा तथा अमावास्याके दिनोंमें यथासमय दिखायी देता है; क्योंकि यह शीघ्र अस्त हो जाता है। अतः नये चन्द्रमाकी तिथि [अमावास्या]-पर चन्द्रमा उत्तरायणमें होता है। यह दक्षिण मार्गमें दिखायी नहीं पड़ता; क्योंकि नक्षत्रोंके गतियोगके कारण यह [चन्द्रमा] सूर्यके अन्धकारसे ढँका हुआ होता है॥ २१—२५ १/२ ॥ |
| ज्योतिषां गतियोगेन सूर्यस्य तमसा वृतः।<br>समानकालास्तमयौ विषुवत्सु समोदयौ॥ २६<br><br>उत्तरासु च वीथीषु व्यन्तरास्तमनोदयौ।<br>पौर्णिमावास्ययोर्ज्ञेयौ ज्योतिष्चक्रानुवर्तिनौ॥ २७<br><br>दक्षिणायनमार्गस्थौ यदा चरति रश्मिवान्।<br>ग्रहाणां चैव सर्वेषां सूर्योऽधस्तात्प्रसर्पति॥ २८<br><br>विस्तीर्णं मण्डलं कृत्वा तस्योर्ध्वं चरते शशी।<br>नक्षत्रमण्डलं कृत्स्नं सोमादूर्ध्वं प्रसर्पति॥ २९<br><br>नक्षत्रेभ्यो बुधश्चोर्ध्वं बुधादूर्ध्वं तु भार्गवः।<br>वक्रस्तु भार्गवादूर्ध्वं वक्रादूर्ध्वं बृहस्पतिः॥ ३०<br><br>तस्माच्छनैश्चरश्चोर्ध्वं तस्मात्सप्तर्षिमण्डलम्।<br>ऋषीणां चैव सप्तानां ध्रुवस्योर्ध्वं व्यवस्थितिः॥ ३१<br><br>तं विष्णुलोकं परमं ज्ञात्वा मुच्येत किल्बिषात्। | सूर्य तथा चन्द्रमा विषुवत् स्थानोंपर समान कालमें अस्त एवं उदय होते हैं। उत्तरायणमें पूर्णिमा तथा अमावास्या तिथियोंपर ज्योतिष्चक्रका अनुसरण करनेवाले इन दोनोंको बिना किसी अन्तरके उदय तथा अस्त होनेवाला जानना चाहिये। जब सूर्य दक्षिणायनमार्गमें स्थित होकर चलता है, तब वह सभी ग्रहोंके नीचेसे गुजरता है, उस समय चन्द्रमा अपने मण्डलको विस्तृत करके उस [सूर्य]-के ऊपर चलते हैं और सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल चन्द्रमासे ऊपर भ्रमण करता है। नक्षत्रोंसे ऊपर बुध, बुधसे ऊपर शुक्र, शुक्रसे ऊपर मंगल, मंगलसे ऊपर बृहस्पति, उस बृहस्पतिसे ऊपर शनि और उससे ऊपर सप्तर्षिमण्डल विद्यमान है। सात ऋषियोंके ऊपर ध्रुवकी स्थिति है। उस परम विष्णुलोकको जानकर मनुष्य पापसे मुक्त हो जाता है॥ २६—३१ १/२ ॥ |
| द्विगुणेषु सहस्रेषु योजनानां शतेषु च॥ ३२<br><br>ग्रहनक्षत्रतारासु उपरिष्टाद्यथाक्रमम्।<br>ग्रहाश्च चन्द्रसूर्यौ च युतौ दिव्येन तेजसा॥ ३३<br><br>नित्यमृक्षेषु युज्यन्ते गच्छन्तोऽहर्निशं क्रमात्।<br>ग्रहनक्षत्रसूर्यास्ते नीचोच्चऋजुसंस्थिताः॥ ३४<br><br>समागमे च भेदे च पश्यन्ति युगपत्प्रजाः।<br>ऋतवः षट् स्मृताः सर्वे समागच्छन्ति पञ्चधा॥ ३५<br><br>परस्परास्थिता ह्येते युज्यन्ते च परस्परम्।<br>असङ्करेण विज्ञेयस्तेषां योगस्तु वै बुधैः॥ ३६ | दो सौ हजार योजन दूरीपर ग्रह-नक्षत्र-तारोंसे ऊपर यथाक्रम सभी ग्रह और दिव्य तेजसे युक्त चन्द्रमा-सूर्य दिन-रात भ्रमण करते हुए सदा नक्षत्रोंसे जुड़े रहते हैं। वे ग्रह, नक्षत्र तथा सूर्य कभी नीचे, कभी ऊँचे एवं कभी सीधी रेखामें स्थित रहते हैं। समागम तथा भेद दोनों स्थितियोंमें वे प्रजाओंको एक साथ देखते हैं। ऋतुएँ छः कही गयी हैं, वे सब पाँच प्रकारसे आती हैं। एक-दूसरेपर आश्रित होनेके कारण ये परस्पर जुड़ी |