श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| एवं सङ्क्षिप्य कथितं ग्रहाणां गमनं द्विजाः।<br>भास्करप्रमुखानां च यथादृष्टं यथाश्रुतम्॥ ३७<br><br>ग्रहाधिपत्ये भगवान् ब्रह्मणा पद्मयोनिना।<br>अभिषिक्तः सहस्रांशू रुद्रेण तु यथा गुहः॥ ३८<br><br>तस्माद् ग्रहार्थना कार्या अग्नौ चोद्यं यथाविधि।<br>आदित्यग्रहपीडायां सद्भिः कार्यार्थसिद्धये॥ ३९ | होती हैं, किंतु उनका यह योग एक-दूसरेके साथ बिना संकर (मिश्रण)-के ही होता है—ऐसा विद्वानोंको जानना चाहिये॥ ३२–३६॥<br><br>हे द्विजो! इस प्रकार मैंने जैसा देखा तथा सुना है, उसके अनुसार संक्षेपमें सूर्य आदि ग्रहोंकी गतिका वर्णन किया। पद्मयोनि ब्रह्माने ग्रहोंके अधिपतिके रूपमें हजार किरणोंवाले भगवान् सूर्यको अभिषिक्त किया है। जैसे रुद्रने कार्तिकेयको अभिषिक्त किया है। अतः सज्जनोंको [अपने] कार्यकी सिद्धिके लिये सूर्य ग्रहकी पीड़ाके समय कहे गये विधानके अनुसार यथाविधि अग्निमें ग्रहर्चन करना चाहिये॥ ३७–३९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ज्योतिषचक्रे ग्रहचारकथनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ज्योतिषचक्रमें ग्रहचारकथन' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५७॥
अट्टावनवाँ अध्याय
ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों, नक्षत्रों, जलों आदिके अधिपतिके रूपमें सूर्य, चन्द्रमा, वरुण आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>अभ्यषिञ्चत्कथं ब्रह्मा चाधिपत्ये प्रजापतिः।<br>देवदैत्यमुखान् सर्वान् सर्वात्मा वद साम्प्रतम्॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] सर्वात्मा प्रजापति ब्रह्माजीने सभी प्रमुख देवताओं तथा दैत्योंको अधिपतिके रूपमें किस प्रकार अभिषिक्त किया, इस समय [हमलोगोंको] बताइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>ग्रहाधिपत्ये भगवानभ्यषिञ्चद्दिवाकरम्।<br>ऋक्षाणामोषधीनां च सोमं ब्रह्मा प्रजापतिः॥ २ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] भगवान् ब्रह्माने ग्रहोंके अधिपतिके रूपमें सूर्यका और नक्षत्रों तथा औषधियोंके अधिपतिके रूपमें चन्द्रमाका अभिषेक किया॥ २॥ |
| अपां च वरुणं देवं धनानां यक्षपुङ्गवम्।<br>आदित्यानां तथा विष्णुं वसूनां पावकं तथा॥ ३<br><br>प्रजापतीनां दक्षं च मरुतां शक्रमेव च।<br>दैत्यानां दानवानां च प्रह्लादं दैत्यपुङ्गवम्॥ ४<br><br>धर्मं पितॄणामधिपं निर्ऋतिं पिशिताशिनाम्।<br>रुद्रं पशूनां भूतानां नन्दिनां गणनायकम्॥ ५<br><br>वीराणां वीरभद्रं च पिशाचानां भयङ्करम्।<br>मातॄणां चैव चामुण्डां सर्वदेवनमस्कृताम्॥ ६ | उन पितामहने वरुणदेवको जलोंका अधिपति, यक्षोंमें श्रेष्ठ कुबेरको धनोंका अधिपति, विष्णुको आदित्योंका अधिपति, अग्निको वसुओंका अधिपति, दक्षको प्रजापतियोंका अधिपति, इन्द्रको मरुतोंका अधिपति, दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादको दैत्यों तथा दानवोंका अधिपति, धर्मको पितरोंका अधिपति, निर्ऋतिको राक्षसोंका अधिपति, रुद्रको पशुओंका अधिपति, गणोंके नायक नन्दीको भूतोंका अधिपति, भयंकर वीरभद्रको वीर पिशाचोंका अधिपति, सभी देवताओंद्वारा नमस्कृत चामुण्डाको |