श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ५८ ] | ब्रह्माद्वारा शिवके आदेशसे ग्रहों आदिकी प्रतिष्ठाका निरूपण | २४५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रुद्राणां देवदेवेशं नीललोहितमीश्वरम्।<br>विघ्नानां व्योमजं देवं गजास्यं तु विनायकम्॥ ७<br>स्त्रीणां देवीमुमादेवीं वचसां च सरस्वतीम्।<br>विष्णुं मायाविनां चैव स्वात्मानं जगतां तथा॥ ८<br>हिमवन्तं गिरीणां तु नदीनां चैव जाह्नवीम्।<br>समुद्राणां च सर्वेषामधिपं पयसां निधिम्॥ ९<br>वृक्षाणां चैव चाश्वत्थं प्लक्षं च प्रपितामहः॥ १० | मातृगणोंका अधिपति, देवदेवेश ईश्वर नीललोहितको रुद्रोंका अधिपति, व्योमसे उत्पन्न तथा हाथीके समान मुखवाले विनायकको विघ्नोंका अधिपति, देवी उमाको स्त्रियोंका अधिपति, देवी सरस्वतीको वाणीका अधिपति, विष्णुको मायावियोंका अधिपति, स्वयं अपनेको सम्पूर्ण जगत्का अधिपति, हिमालयको पर्वतोंका अधिपति, गंगाको नदियोंका अधिपति, जलनिधि (महासागर)-को सभी समुद्रोंका अधिपति और अश्वत्थ तथा प्लक्षको वृक्षोंका अधिपति बनाया॥ ३-१०॥ |
| गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणा-<br>मीशं पुनश्चित्ररथं चकार।<br>नागाधिपं वासुकिमुग्रवीर्यं<br>सर्पाधिपं तक्षकमग्रवीर्यम्॥ ११ | उन्होंने चित्ररथको गन्धर्वों-विद्याधरों तथा किन्नरोंका अधिपति, उग्र तेजवाले वासुकिको नागोंका अधिपति और उग्र वीर्यवाले तक्षकको सर्पोंका अधिपति बनाया॥ ११॥ |
| दिग्वारणानामधिपं चकार<br>गजेन्द्रमैरावतमुग्रवीर्यम् ।<br>सुपर्णमीशं पततामथाश्व-<br>राजानमुच्चैःश्रवसं चकार॥ १२ | उन्होंने उग्र पराक्रमवाले गजेन्द्र ऐरावतको दिग्गजोंका स्वामी, गरुड़को पक्षियोंका स्वामी और उच्चैःश्रवाको घोड़ोंका स्वामी बनाया॥ १२॥ |
| सिंहं मृगाणां वृषभं गवां च<br>मृगाधिपानां शरभं चकार।<br>सेनाधिपानां गुहमप्रमेयं<br>श्रुतिस्मृतीनां लकुलीशमीशम्॥ १३ | उन्होंने सिंहको मृगोंका स्वामी, वृषभको गौओंका स्वामी, शरभको सिंहोंका स्वामी, अतुलनीय गुह (कार्तिकेय)-को सेनाधिपोंका स्वामी और लकुलीशको श्रुतियों तथा स्मृतियोंका स्वामी बनाया॥ १३॥ |
| अभ्यषिञ्चत्सुधर्माणं तथा शङ्खपदं दिशाम्।<br>केतुमन्तं क्रमेणैव हेमरोमाणमेव च॥ १४<br>पृथिव्यां पृथुमीशानं सर्वेषां तु महेश्वरम्।<br>चतुर्मूर्तिषु सर्वज्ञं शङ्करं वृषभध्वजम्॥ १५ | उन्होंने सुधर्मा, शंखपद, केतुमान् तथा हेमरोमको क्रमशः सभी दिशाओंके अधिपति रूपमें अभिषिक्त किया। उन्होंने पृथुको पृथ्वीका स्वामी, महेश्वरको सबका स्वामी और सब कुछ जाननेवाले वृषभध्वज शंकरको चारों (विश्व, प्राज्ञ, तैजस, तुरीय) मूर्तियोंका स्वामी बनाया॥ १४-१५॥ |
| प्रसादाद्गगवाञ्छम्भोश्चाभ्यषिञ्चद्यथाक्रमम्।<br>पुराभिषिच्य पुण्यात्मा रराज भुवनेश्वरः॥ १६ | इस प्रकार भगवान् ब्रह्माने शम्भुकी कृपासे पूर्वकालमें [इन सभीको] क्रमसे अभिषिक्त किया। इन्हें अभिषिक्त करके लोकोंके स्वामी पुण्यात्मा ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हो गये॥ १६॥ |
| एतद्वो विस्तरेणैव कथितं मुनिपुङ्गवाः।<br>अभिषिक्तास्ततस्वेते विशिष्टा विश्वयोनिना॥ १७ | हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने आपलोगोंको यह विस्तारसे बता दिया; विश्वको उत्पन्न करनेवाले ब्रह्माने [इसी तरहसे] विशिष्ट गुणोंसे युक्त इन सबको अभिषिक्त किया था॥ १७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्याद्याभिषेककथनं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्य आदिका अभिषेककथन' नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥