श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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उनसठवाँ अध्याय
पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन, बारह मासके बारह सूर्योंका नामनिर्देश एवं सूर्यरश्मियोंका वर्णन
| सूत उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा तु मुनयः पुनस्तं संशयान्विताः।<br>पप्रच्छुरुत्तरं भूयस्तदा ते रोमहर्षणम्॥ १ | **सूतजी बोले—**यह सुनकर मुनिलोग संशयमें पड़ गये और उन्होंने उन रोमहर्षण (सूतजी)-से पुनः यह बात पूछी॥ १॥ |
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| ऋषय ऊचुः<br>यदेतदुक्तं भवता सूतेह वदतां वर।<br>एतद्विस्तरतो ब्रूहि ज्योतिषां च विनिर्णयम्॥ २ | **ऋषिगण बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ हे सूतजी! आपने यहाँ जो कहा है, उसे तथा ग्रहोंके निर्णयको विस्तारसे बताइये॥ २॥ |
| श्रुत्वा तु वचनं तेषां तदा सूतः समाहितः।<br>उवाच परमं वाक्यं तेषां संशयनिर्णये॥ ३ | तब उनका वचन सुनकर उनके सन्देहको दूर करनेके लिये सूतजी एकाग्रचित्त होकर उत्तम बात कहने लगे॥ ३॥ |
| अस्मिन्नर्थे महाप्राज्ञैर्यदुक्तं शान्तबुद्धिभिः।<br>एतद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि सूर्यचन्द्रमसोर्गतिम्॥ ४<br><br>यथा देवगृहाणीह सूर्यचन्द्रादयो ग्रहाः।<br>अतः परं तु त्रिविधमग्नेर्वक्ष्ये समुद्भवम्॥ ५<br><br>दिव्यस्य भौतिकस्याग्नेस्तथोऽग्नेः पार्थिवस्य च। | इस विषयमें शान्तबुद्धिवाले महाज्ञानियोंने जो कुछ बताया है, उसे मैं आपलोगोंसे कहूँगा और चन्द्रमा तथा सूर्यकी गतिका वर्णन करूँगा। मैं यह बताऊँगा कि सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह किस प्रकार देवताओंके निवासस्थान हैं, इसके बाद मैं अग्निकी तीन प्रकारकी उत्पत्तिका वर्णन करूँगा। दिव्य अग्नि, भौतिक अग्नि तथा पार्थिव अग्निके विषयमें बताऊँगा॥ ४-५ १/२॥ |
| व्युष्टायां तु रजन्यां च ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः॥ ६<br><br>अव्याकृतमिदं त्वासीन्नैशेन तमसा वृतम्।<br>चतुर्भागावशिष्टेऽस्मिन् लोके नष्टे विशेषतः॥ ७<br><br>स्वयंभूर्भगवान्स्तत्र लोकसर्वार्थसाधकः।<br>खद्योतवत्स व्यचरदाविर्भावचिकीर्षया॥ ८ | अव्यक्तसे उत्पन्न होनेवाले ब्रह्माकी रात्रि बीत जानेपर यह दृश्य जगत् अस्पष्ट था और घोर अन्धकारसे आच्छन्न था। इस लोकके विशेष रूपसे नष्ट हो जानेपर तथा इसका चौथाई भाग अवशिष्ट रहनेपर संसारका कार्य सिद्ध करनेवाले वे भगवान् ब्रह्मा सृष्टिकी कामनासे खद्योतकी भाँति वहाँ विचरण करने लगे॥ ६-८॥ |
| सोऽग्निं सृष्ट्वाथ लोकादौ पृथिवीजलसंश्रितः।<br>संहृत्य तत्प्रकाशार्थं त्रिधा व्यभजदीश्वरः॥ ९<br><br>पवनो यस्तु लोकेऽस्मिन् पार्थिवो वह्निरुच्यते।<br>यश्चासौ तपते सूर्ये शुचिरग्निस्तु स स्मृतः॥ १०<br><br>वैद्युतोऽब्जस्तु विज्ञेयस्तेषां वक्ष्ये तु लक्षणम्।<br>वैद्युतो जाठरः सौरो वारिगर्भस्त्रयोऽग्नयः॥ ११ | तदनन्तर पृथ्वी तथा जलमें संश्रित उन जगदीश्वरने लोकके आदिमें अग्निका सृजन करके पृथ्वीके जलका संहरणकर उसके प्रकाशके लिये अग्निको तीन भागोंमें विभक्त किया। इस लोकमें जो पवन है, वह पार्थिव अग्नि कहा जाता है और जो अग्नि सूर्यमें तपती है, उसे शुचि अग्नि कहा गया है। विद्युत्से उत्पन्न अग्निको अब्ज जानना चाहिये। इस प्रकार जलके गर्भसे उत्पन्न वैद्युत, जाठर तथा सौर—ये तीन अग्नियाँ हैं। अब मैं उनके लक्षणोंको बताऊँगा॥ ९-११॥ |