श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ५९] पार्थिव, शुचि तथा वैद्युत नामसे अग्निके तीन रूपोंका वर्णन २४७
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तस्मादपः पिबन् सूर्यो गोभिर्दीप्यत्यसौ विभुः।<br>जले चाब्जः समाविष्टो नाद्भिरग्निः प्रशाम्यति॥ १२<br><br>मानवानां च कुक्षिस्यो नाद्भिः शाम्यति पावकः।<br>अर्चिष्मान् पवनः सोऽग्निर्निष्प्रभो जाठरः स्मृतः॥ १३<br><br>यश्चायं मण्डली शुक्ली निरूष्मा सम्प्रजायते।<br>प्रभा सौरी तु पादेन ह्यास्तं याते दिवाकरे॥ १४<br><br>अग्निमाविशते रात्रौ तस्माद्दूरात्प्रकाशते।<br>उद्यन्तं च पुनः सूर्यमौष्ण्यमग्नेः समाविशेत्॥ १५<br><br>पादेन पार्थिवस्याग्नेस्तस्मादग्निस्तपत्यसौ।<br>प्रकाशोष्णस्वरूपे च सौराग्नेये तु तेजसी॥ १६ | विभु सूर्य अपनी किरणोंसे जलको पीते हुए चमकते हैं। जलसे उत्पन्न अग्नि जलमें समाविष्ट रहती है और वह जलसे नहीं बुझती है। मनुष्योंके उदरमें रहनेवाली अग्नि प्रशान्त नहीं होती। वह पवन अग्नइज्वलायुक्त होती है, किंतु निष्प्रभ होती है, उसे जाठर अग्नि कहा गया है। यह जो अग्नि है, वह एक मण्डलके रूपमें, शुक्ल वर्णवाली तथा ऊष्मारहित होती है। सूर्यके अस्त हो जानेपर उनकी सम्पूर्ण प्रभा एक पाद (चौथाई) रह जाती है। वह प्रभा रात्रिके समय अग्निमें प्रविष्ट हो जाती है, इसलिये वह दूरसे प्रकाश दिया करती है। जब सूर्य पुनः उगता है, तब पार्थिव अग्निकी उष्णता एक चरणसे सूर्यमें प्रवेश कर जाती है, इसलिये अग्नि तपती है॥ १२-१५ १/२॥ |
| परस्परानुप्रवेशादाप्यायेते परस्परम्।<br>उत्तरे चैव भूम्यर्धे तथा ह्यग्निश्च दक्षिणे॥ १७<br><br>उत्तिष्ठति पुनः सूर्यः पुनर्वै प्रविशत्यपः।<br>तस्मात्ताम्रा भवन्त्यापो दिवा रात्रिप्रवेशनात्॥ १८<br><br>अस्तं याति पुनः सूर्यो अहर्वै प्रविशत्यपः।<br>तस्मान्नक्तं पुनः शुक्ला आपो दृश्यन्ति भास्वराः॥ १९<br><br>एतेन क्रमयोगेन भूम्यर्धे दक्षिणोत्तरे।<br>उदयास्तमने नित्यमहोरात्रं विशत्यपः॥ २० | सूर्य तथा अग्निके तेज प्रकाश एवं उष्ण गुण-स्वरूपवाले हैं, ये दोनों परस्पर अनुप्रवेशके कारण एक-दूसरेको आप्यायित करते हैं। मेरुके दक्षिणी तथा उत्तरी भूम्यर्धमें, जब सूर्य उदित होता है, तब रात्रि जलमें प्रवेश कर जाती है, इसलिये दिनके समय रात्रिके [जलमें] प्रवेश करनेके कारण जल ताम्रवर्ण हो जाता है। जब सूर्य अस्त होता है, तब दिन जलमें प्रवेश कर जाता है, इसलिये रातमें जल पुनः शुक्ल वर्णवाला तथा चमकीला दिखायी पड़ता है। इसी क्रमयोगसे उदय एवं अस्त दोनों समयोंमें दिन और रात दक्षिणोत्तर भूम्यर्धमें जलमें प्रवेश किया करते हैं॥ १६-२०॥ |
| यश्चासौ तपते सूर्यः पिबन्नम्भो गभस्तिभिः।<br>पार्थिवाग्निविमिश्रोऽसौ दिव्यः शुचिरिति स्मृतः॥ २१<br><br>सहस्रपादसौ वह्निर्वृत्तकुम्भनिभः स्मृतः।<br>आदत्ते स तु नाडीनां सहस्रेण समन्ततः॥ २२<br><br>नादेयीश्चैव सामुद्रीः कूपाश्चैव तथा घनाः।<br>स्थावरा जङ्गमाश्चैव वापीकुल्यादिका अपः॥ २३<br><br>तस्य रश्मिसहस्रं तच्छीतवर्षोष्णनिःस्रवम्।<br>तासां चतुःशता नाड्यो वर्षन्ते चित्रमूर्तयः॥ २४<br><br>भजनाश्चैव माल्याश्च केतनाः पतनास्तथा।<br>अमृता नामतः सर्वा रश्मयो वृष्टिसर्जनाः॥ २५ | जो यह सूर्य [अपनी] किरणोंसे जलको पीता हुआ तपता रहता है, उसे पार्थिवाग्निमिश्रित दिव्य शुचि (अग्नि) कहा गया है। हजार पाद (किरण)-वाली यह अग्नि वृत्तकुम्भके तुल्य कही गयी है। वह अपनी हजार नाड़ियों (किरणों)-से चारों ओरसे नदियों, समुद्रों, कूपों, बावलियों, नालों आदि स्थावर-जंगमसे जलोंको ग्रहण करती है। उसकी एक हजार नाड़ियाँ हैं; जो शीत, उष्ण और वर्षासे युक्त हैं। उनमेंसे विचित्र रूपोंवाली चार सौ नाड़ियाँ वर्षा करती हैं। वे भजना, माल्या, केतना तथा पतना हैं; अमृता नामवाली ये सभी रश्मियाँ वृष्टि करनेवाली हैं॥ २१-२५॥ |