श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| २४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हिमोद्वाहाश्च ता नाड्यो रश्मयस्त्रिशताः पुनः।<br>रेशा मेघाश्च वात्याश्च ह्रादिन्यो हिमसर्जनाः॥ २६<br><br>चन्द्रभा नामतः सर्वाः पीताभाश्च गभस्तयः।<br>शुक्लाश्च ककुभाश्चैव गावो विश्वभृतस्तथा॥ २७<br><br>शुक्लास्ता नामतः सर्वास्त्रिशतीर्घर्मसर्जनाः।<br>सोमो बिभर्ति ताभिस्तु मनुष्यपितृदेवताः॥ २८<br><br>मनुष्यानौषधेनेह स्वधया च पितॄनपि।<br>अमृतेन सुरान् सर्वांस्तिसृभिस्तर्पयत्यसौ॥ २९ | तीन सौ हिमवाहिनी नाड़ियाँ हैं। वे रेशा, मेघा, वात्या तथा ह्रादिनी हैं; चन्द्रभा नामवाली वे सभी रश्मियाँ हिमका सर्जन करनेवाली हैं और पीत आभावाली हैं। शुक्ला, ककुभा, गौ तथा विश्वभृत्—ये रश्मियाँ शुक्ला नामवाली हैं; वे सब तीन सौ रश्मियाँ ऊष्मा उत्पन्न करनेवाली हैं। चन्द्रमा उन तीनों किरणोंके द्वारा मनुष्य, पितृगणों तथा देवताओंका भरण करता है। वह मनुष्योंको औषधिसे, पितरोंको स्वधासे और सभी देवताओंको अमृतसे तृप्त करता है॥ २६–२९॥ |
| वसन्ते चैव ग्रीष्मे च शतैः स तपते त्रिभिः।<br>वर्षास्वथो शरदि च चतुर्भिः सम्प्रवर्षति॥ ३०<br><br>हेमन्ते शिशिरे चैव हिममुत्सृजते त्रिभिः।<br>इन्द्रो धाता भगः पूषा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा॥ ३१<br><br>अंशुर्विवस्वांस्त्वष्टा च पर्जन्यो विष्णुरेव च।<br>वरुणो माघमासे तु सूर्य एव तु फाल्गुने॥ ३२<br><br>चैत्रे मासि भवेदंशुर्धाता वैशाखतापनः।<br>ज्येष्ठे मासि भवेदिन्द्र आषाढे चार्यमा रविः॥ ३३<br><br>विवस्वान् श्रावणे मासि प्रोष्ठपादे भगः स्मृतः।<br>पर्जन्योऽश्वयुजे मासि त्वष्टा वै कार्तिके रविः॥ ३४<br><br>मार्गशीर्षे भवेन्मित्रः पौषे विष्णुः सनातनः।<br>पञ्चरश्मिसहस्राणि वरुणस्यार्ककर्मणि॥ ३५ | वह [सूर्य] वसन्त तथा ग्रीष्ममें तीन सौ किरणोंसे तपता है, वर्षा तथा शरदमें चार सौ किरणोंसे वर्षा करता है और हेमन्त तथा शिशिरमें तीन सौ किरणोंसे हिम छोड़ता है। इन्द्र, धाता, भग, पूषा, मित्र, वरुण, अर्यमा, अंशु, विवस्वान्, त्वष्टा, पर्जन्य और विष्णु—ये [बारह] सूर्य हैं। वरुण माघमासमें सूर्य है एवं पूषा फाल्गुनमासमें सूर्य है। अंशु चैत्रमासमें सूर्य होता है और धाता वैशाखमासमें सूर्य होता है। इन्द्र ज्येष्ठमासमें सूर्य होता है और अर्यमा आषाढ़मासमें सूर्य होता है। विवस्वान् श्रावणमासमें और भग भाद्रपदमासमें सूर्य कहा गया है। पर्जन्य आश्विन मासमें सूर्य होता है और त्वष्टा कार्तिकमासमें सूर्य होता है। मित्र मार्गशीर्षमासमें सूर्य होता है और सनातन विष्णु पौषमासमें सूर्य होता है॥ ३०–३४१/२॥ |
| षड्भिः सहस्रैः पूषा तु देवोंऽशुः सप्तभिस्तथा।<br>धाताष्टभिः सहस्रैस्तु नवभिस्तु शतक्रतुः॥ ३६<br><br>विवस्वान् दशभिर्याति यात्येकादशभिर्भगः।<br>सप्तभिस्तपते मित्रस्त्वष्टा चैवाष्टभिः स्मृतः॥ ३७<br><br>अर्यमा दशभिर्याति पर्जन्यो नवभिस्तथा।<br>षड्भी रश्मिसहस्रैस्तु विष्णुस्तपति मेदिनीम्॥ ३८ | सूर्यसम्बन्धी कर्ममें वरुणकी पाँच हजार रश्मियाँ होती हैं। पूषा छः हजार किरणोंसे, अंशुदेव सात हजार किरणोंसे, धाता आठ हजार किरणोंसे और इन्द्र नौ हजार किरणोंसे सूर्यकर्म करते हैं। विवस्वान् दस हजार किरणोंसे गमन करता है और भग ग्यारह हजार किरणोंसे गमन करता है। मित्र सात हजार रश्मियोंसे तपता है। त्वष्टा आठ हजार किरणोंसे युक्त कहा गया है। अर्यमा दस हजार किरणोंसे तथा पर्जन्य नौ हजार किरणोंसे गमन करता है। विष्णु [नामक सूर्य] छः हजार रश्मियोंसे पृथ्वीपर तपता है॥ ३५–३८॥ |
| वसन्ते कपिलः सूर्यो ग्रीष्मे काञ्चनसप्रभः।<br>श्वेतो वर्षासु वर्णेन पाण्डुः शरदि भास्करः॥ ३९ | सूर्य वसन्त-ऋतुमें कपिल वर्णके और ग्रीष्म-ऋतुमें स्वर्णकी प्रभावाले होते हैं। वे सूर्य वर्षाऋतुमें |