श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 251, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 251
अध्याय ६० ] मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन २४९
| हेमन्ते ताम्रवर्णस्तु शिशिरे लोहितो रविः ।<br>इति वर्णाः समाख्याता मया सूर्यसमुद्भवाः ॥ ४० | श्वेतवर्ण और शरद्-ऋतुमें पाण्डुवर्णके होते हैं। रवि हेमन्त-ऋतुमें ताम्र वर्णवाले और शिशिर-ऋतुमें लोहित वर्णवाले होते हैं। इस प्रकार मैंने सूर्यमें होनेवाले रंगोंका वर्णन किया ॥ ३९-४० ॥ |
|---|---|
| ओषधीषु बलं धत्ते स्वधया च पितृष्वपि ।<br>सूर्योऽमरेष्वप्यमृतं त्रयं त्रिषु नियच्छति ॥ ४१ | सूर्य औषधियोंको बल देते हैं, स्वधासे पितरोंको तृप्त करते हैं और देवताओंको अमृत प्रदान करते हैं, इस प्रकार वे उन तीनोंको तीन वस्तुएँ देते हैं। इस प्रकार सूर्यकी वे हजारों किरणें लोककल्याण करती हैं। शीत, उष्ण तथा वर्षा करनेवाली ये किरणें लोकमें पहुँचकर भिन्न-भिन्न रूप धारण करती हैं ॥ ४१-४२ ॥ |
| एवं रश्मिसहस्रं तत्सौरं लोकार्थसाधकम् ।<br>भिद्यते लोकमासाद्य जलशीतोष्णनिःस्रवम् ॥ ४२ | |
| इत्येतन्मण्डलं शुक्लं भास्करं सूर्यसंज्ञितम् ।<br>नक्षत्रग्रहसोमानां प्रतिष्ठायानिरैव च ॥ ४३ | शुक्ल वर्णवाला तथा देदीप्यमान यह मण्डल सूर्य नामवाला है। यह नक्षत्रों, ग्रहों एवं चन्द्रमाकी प्रतिष्ठाका कारण है। चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रह—इन सभीको सूर्यसे उत्पन्न जानना चाहिये। चन्द्रमा नक्षत्रोंका अधिपति है और शिवजीका बायाँ नेत्र है। स्वयं सूर्य शिवजीके दाहिने नेत्र हैं। वे इस लोकमें लोगोंको ले जाते हैं, इसीलिये ये नयन कहे जाते हैं ॥ ४३-४५ ॥ |
| चन्द्रर्क्षग्रहाः सर्वे विज्ञेयाः सूर्यसम्भवाः ।<br>नक्षत्राधिपतिः सोमो नयनं वाममीशितुः ॥ ४४ | |
| नयनं चैवमीशस्य दक्षिणं भास्करः स्वयम् ।<br>तेषां जनानां लोकेऽस्मिन्नयनं नयते यतः ॥ ४५ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यरश्मिस्वरूपकथनं नामैकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यरश्मिस्वरूपकथन' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥
साठवाँ अध्याय
मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रहों एवं सूर्यके माहात्म्यका वर्णन
| सूत उवाच | **सूतजी बोले—**सूर्य अग्निके रूपमें पढ़ा जाता है और चन्द्रमाको जल कहा गया है। शेष [भौम आदि] पाँच ग्रहोंको ईश्वर तथा इच्छाके अनुसार भ्रमण करनेवाला जानना चाहिये ॥ १ ॥ |
|---|---|
| शेषाः पञ्च ग्रहा ज्ञेया ईश्वराः कामचारिणः ।<br>पठ्यते चाग्निरदित्य उदकं चन्द्रमाः स्मृतः ॥ १ | |
| शेषाणां प्रकृतिं सम्यग् वक्ष्यमाणां निबोधत ।<br>सुरसेनापतिः स्कन्दः पठ्यतेऽङ्गारको ग्रहः ॥ २ | [हे ऋषियो!] मैं शेष ग्रहोंकी प्रकृति भलीभाँति बताता हूँ, आपलोग सुनिये। भौम (मंगल) ग्रहको देवताओंका सेनापति स्कन्द कहा जाता है। ज्ञानीलोग बुधको नारायण देव कहते हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! मन्द गतिवाला महाग्रह शनैश्चर समस्त लोकोंका स्वामी तथा लोकप्रभु साक्षात् यम है। देवताओं और असुरोंके गुरु भानुमान् महाग्रह बृहस्पति तथा शुक्र प्रजापतिके पुत्र कहे गये हैं। आदित्य ही सम्पूर्ण त्रैलोक्यका मूल है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २–५ ॥ |
| नारायणं बुधं प्राहुर्देवं ज्ञानविदो जनाः ।<br>सर्वलोकप्रभुः साक्षाद्यमो लोकप्रभुः स्वयम् ॥ ३ | |
| महाग्रहो द्विजश्रेष्ठा मन्दगामी शनैश्चरः ।<br>देवासुरगुरू द्वौ तु भानुमन्तौ महाग्रहौ ॥ ४ | |
| प्रजापतिसुतावुक्तौ ततः शुक्रबृहस्पती ।<br>आदित्यमूलमखिलं त्रैलोक्यं नात्र संशयः ॥ ५ |