भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२५०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| भवत्यस्माज्जगत्कृत्स्नं सदेवासुरमानुषम्।<br>रुद्रेन्द्रोपेन्द्रचन्द्राणां विप्रेन्द्राग्निदिवौकसाम्॥ ६<br><br>द्युतिर्द्युतिमRetainतां कृत्स्नं यत्तेजः सार्वलौकिकम्।<br>सर्वात्मा सर्वलोकेशो महादेवः प्रजापतिः॥ ७<br><br>सूर्य एव त्रिलोकेशो मूलं परमदैवतम्।<br>ततः सञ्जायते सर्वं तत्रैव प्रविलीयते॥ ८ | देवता, असुर तथा मनुष्यसहित सम्पूर्ण जगत् इसी [सूर्य]-से उत्पन्न होता है। वे सूर्य रुद्र, इन्द्र, उपेन्द्र, चन्द्रमा, श्रेष्ठ ब्राह्मणों, अग्नि एवं देवताओं—इन सब द्युतिसम्पन्न देवोंकी द्युति हैं। उनका जो सम्पूर्ण तेज है, वह सार्वलौकिक है। वे सबकी आत्मा, सभी लोकोंके ईश्वर, महादेव और प्रजापति हैं। सूर्य ही तीनों लोकोंके ईश, सबके कारणस्वरूप एवं परम देवता हैं। उन्हींसे सब कुछ उत्पन्न होता है और उन्हींमें विलीन हो जाता है॥ ६-८॥ | | भावाभावौ हि लोकानामादित्यान्निःसृतौ पुरा।<br>अविज्ञेयो ग्रहो विप्रा दीप्तिमान् सुप्रभो रविः॥ ९ | लोकोंके भाव तथा अभाव पूर्वकालमें आदित्यसे ही निकले थे। हे विप्रो! उत्तम प्रभाववाला दीप्तिमान् सूर्य [नामक] ग्रह अविज्ञेय है॥ ९॥ | | अत्र गच्छन्ति निधनं जायन्ते च पुनः पुनः।<br>क्षणा मुहूर्ता दिवसा निशाः पक्षाश्च कृत्स्नशः॥ १०<br><br>मासाः संवत्सराश्चैव ऋतवोऽथ युगानि च।<br>तदादित्यादृते ह्येषा कालसंख्या न विद्यते॥ ११<br><br>कालादृते न नियमो न दीक्षा नाह्निकक्रमः।<br>ऋतूनां च विभागश्च पुष्पं मूलं फलं कुतः॥ १२<br><br>कुतः सस्यविनिष्पत्तिस्तृणौषधिगणोऽपि च।<br>अभावो व्यवहाराणां जन्तूनां दिवि चेह च॥ १३<br><br>जगत्प्रतापनमृते भास्करं रुद्ररूपिणम्।<br>स एष कालश्चाग्निश्च द्वादशात्मा प्रजापतिः॥ १४ | क्षण, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, संवत्सर (वर्ष), ऋतु तथा युग इन्हीं सूर्यसे बार-बार उत्पन्न होते हैं और इन्हींमें समाप्त होते हैं। इसलिये सूर्यके बिना यह कालगणना नहीं होती है। कालके बिना न नियम हो सकता है, न दीक्षा हो सकती है और न दैनिक कृत्य ही हो सकता है। [इनके बिना] ऋतुओंका विभाजन, पुष्प, मूल तथा फल कैसे हो सकते हैं? धान्यकी उत्पत्ति कैसे सम्भव है और तृण तथा औषधियाँ भी कैसे हो सकती हैं? जगत्को तपानेवाले रुद्ररूप भास्करके बिना इस लोकमें तथा स्वर्गमें प्राणियोंके व्यवहारका अभाव हो जायगा। वे ही काल, अग्नि, द्वादश आत्मा तथा प्रजापति हैं॥ १०-१४॥ | | तपत्येष द्विजश्रेष्ठास्त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>स एष तेजसां राशिः समस्तः सार्वलौकिकः॥ १५<br><br>उत्तमं मार्गमास्थाय रात्र्यहोभिरिदं जगत्।<br>पार्श्वतोर्ध्वमधश्चैव तापयत्येष सर्वशः॥ १६<br><br>यथा प्रभाकरो दीपो गृहमध्येऽवलम्बितः।<br>पार्श्वतोर्ध्वमधश्चैव तमो नाशयते समम्॥ १७<br><br>तद्वत्सहस्रकिरणो ग्रहराजो जगत्प्रभुः।<br>सूर्यो गोभिर्जगत्सर्वमादीपयति सर्वतः॥ १८ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ये ही सूर्य चराचरसहित त्रैलोक्यको प्रकाश देते हैं। ये ही तेजोंकी राशि, सम्पूर्ण स्वरूपवाले तथा सार्वलौकिक हैं। उत्तम मार्गका आश्रय लेकर ये [सूर्य] ही इस जगत्को पार्श्वभागसे, ऊपरसे, नीचेसे, सभी ओरसे दिन-रात ताप प्रदान करते हैं। जिस प्रकार घरमें रखा हुआ प्रभा करनेवाला दीपक पार्श्वभागमें, ऊपर तथा नीचे समान रूपसे अन्धकारका नाश करता है, उसी तरह हजार किरणोंवाले ग्रहोंके राजा एवं जगत्के स्वामी सूर्य [अपनी] किरणोंसे सारे जगत्को सभी ओरसे प्रकाशित करते हैं॥ १५-१८॥ |

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