भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ६१ ]ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन२५१
रवे रश्मिसहस्रं यत्प्राङ्मया समुदाहृतम्।<br>तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मयो ग्रहयोनयः॥ १९<br>सुषुम्नो हरिकेशश्च विश्वकर्मा तथैव च।<br>विश्वव्यचाः पुनश्चाद्यः सन्नद्धश्च ततः परः॥ २०<br>सर्वावसुः पुनश्चान्यः स्वराडन्यः प्रकीर्तितः।<br>सुषुम्नः सूर्यरश्मिस्तु दक्षिणां राशिमैधयत्॥ २१<br>न्यगूर्ध्वाधः प्रचारोऽस्य सुषुम्नः परिकीर्तितः।<br>हरिकेशः पुरस्ताद्यो ऋक्षयोनिः प्रकीर्त्यते॥ २२<br>दक्षिणे विश्वकर्मा च रश्मिर्वर्धयते बुधम्।<br>विश्वव्यचास्तु यः पश्चाच्छुक्रयोनिः स्मृतो बुधैः॥ २३<br>सन्नद्धश्च तु यो रश्मिः स योनिर्लोहितस्य तु।<br>षष्ठः सर्वावसू रश्मिः स योनिस्तु बृहस्पतेः॥ २४<br>शनैश्चरं पुनश्चापि रश्मिराप्यायते स्वराट्।<br>एवं सूर्यप्रभावेन नक्षत्रग्रहतारकाः॥ २५<br>दृश्यन्ते दिवि ताः सर्वाः विश्वं चेदं पुनर्जगत्।<br>न क्षीयन्ते यतस्तानि तस्मान्नक्षत्रता स्मृता॥ २६मैं सूर्यकी जिन हजार किरणोंको पहले बता चुका हूँ, उनमें सात श्रेष्ठ किरणें ग्रहोंको उत्पन्न करनेवाली हैं। वे सुषुम्ना, हरिकेश, विश्वकर्मा, विश्वव्यचा, सन्नद्ध, सर्वावसु और स्वराट् [नामवाली] कही गयी हैं। सूर्यकी सुषुम्ना [नामका] रश्मि दक्षिण राशिकी वृद्धि करती है। इस सुषुम्नाका गमन पार्श्व, ऊपर तथा नीचे सभी ओर कहा गया है। सामनेकी ओर जो हरिकेश [रश्मि] है, उसे नक्षत्रोंकी योनि कहा जाता है। विश्वकर्मा [नामक] रश्मि दक्षिणमें बुधको विकसित करती है। पीछेकी ओर जो विश्वव्यचा [नामक रश्मि] है, उसे विद्वानोंने शुक्रकी योनि कहा है। जो सन्नद्ध [नामक] रश्मि है, वह मंगलकी योनि है। छठी जो सर्वावसु रश्मि है, वह बृहस्पतिकी योनि है। इसके बाद स्वराट् रश्मि शनैश्चरको पोषित करती है। इस प्रकार सूर्यके ही प्रभावसे सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे अन्तरिक्षमें दिखायी देते हैं और यह सम्पूर्ण जगत् दिखायी देता है। चूँकि वे नष्ट नहीं होते, इसलिये उन्हें नक्षत्र कहा गया है॥ १९-२६॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सूर्यप्रभाववर्णनं नाम षष्टितमोऽध्यायः॥ ६०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सूर्यप्रभाववर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६०॥


इकसठवाँ अध्याय

ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूप तथा नक्षत्रों और ग्रहोंकी पारस्परिक स्थितिका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
क्षेत्राण्येतानि सर्वाणि आतपन्ति गभस्तिभिः।<br>तेषां क्षेत्राण्यथादत्ते सूर्यो नक्षत्रतारकाः॥ १<br>चीर्णेन सुकृतेनेह सुकृतान्ते ग्रहाश्रयाः।<br>तारणात्तारका ह्येताः शुक्लत्वाच्चैव तारकाः॥ २[हे ऋषियो!] रात्रिमें सूर्यकिरणोंसे प्रकाशित होनेवाले ये सभी क्षेत्र भारतवर्षमें अनुष्ठित पुण्योंद्वारा पुण्यात्माओंके होते हैं, तदनन्तर सूर्य सुकृतोंके पूर्ण होनेपर ग्रहोंके आश्रयमें रहनेवाले [ग्रहाश्रित] नक्षत्र-तारोंको [अपने प्रभामण्डलमें] ले लेते हैं। शुक्ल होनेसे तथा तारक होनेसे ये तारे कहलाते हैं॥ १-२॥
दिव्यानां पार्थिवानां च नैशानां चैव सर्वशः।<br>आदानान्नित्यमादित्यस्तेजसां तमसामपि॥ ३<br>सवने स्यन्दनेऽर्थे च धातुरेष विभाव्यते।<br>सवनात्तेजसोऽपां च तेनासौ सविता मतः॥ ४<br>बहुलश्चन्द्र इत्येष ह्लादने धातुरुच्यते।<br>शुक्लत्वे चामृतत्वे च शीतत्वे च विभाव्यते॥ ५दिव्य, पार्थिव तथा रात्रिमें होनेवाले अन्धकारोंको अपने तेजसे ग्रहण कर लेनेके कारण वह आदित्य [नामवाला] है। फैलाने तथा बहाने अर्थमें यह [सु] धातु पढ़ी जाती है। अतः तेजको फैलाने तथा जलको बहानेके कारण इसे 'सविता' कहा गया है। यह [चदि] धातु आह्लाद करनेके अर्थमें कही जाती है, आह्लाद