श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ६१ ] | ज्योतिःसन्निवेशमें ग्रहोंके स्वरूपका वर्णन | २५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नक्षत्रऋक्षनामिन्यो दाक्षायण्यस्तु ताः स्मृताः।<br>स्वर्भानुः सिंहिकापुत्रो भूतसन्तापनोऽसुरः॥ २०<br><br>सोमर्क्षग्रहसूर्येषु कीर्तितास्त्वभिमानिनः।<br>स्थानान्येतान्यथोक्तानि स्थानिन्यश्चैव देवताः॥ २१ | हुआ है। नक्षत्र-ऋक्ष नामवाली जो भी हैं, वे दक्षकी पुत्रियाँ कही गयी हैं। प्राणियोंके लिये कष्टकारी असुर राहु सिंहिकापुत्र है। इस प्रकार सोम, ऋक्ष, ग्रह तथा सूर्यमें उनके निवासस्थान हैं। इन स्थानोंका वर्णन मैंने कर दिया और अपने-अपने स्थानका अभिमान करनेवाले स्थानी देवताओंका भी वर्णन कर दिया॥ १६-२१॥ |
| सौरमग्निमयं स्थानं सहस्रांशोर्विवस्वतः।<br>हिमांशोस्तु स्मृतं स्थानमम्मयं शुक्लमेव च॥ २२<br><br>आप्यं श्यामं मनोज्ञं च बुधरश्मिगृहं स्मृतम्।<br>शुक्लस्याप्यम्मयं शुक्लं पदं षोडशरश्मिवत्॥ २३<br><br>नवरश्मि तु भौमस्य लोहितं स्थानमुत्तमम्।<br>हरिद्राभं बृहच्चापि षोडशार्चिर्बृहस्पतेः॥ २४<br><br>अष्टरश्मिगृहं चापि प्रोक्तं कृष्णं शनैश्चरे।<br>स्वर्भानोस्तामसं स्थानं भूतसन्तापनालयम्॥ २५<br><br>विज्ञेयास्तारकाः सर्वास्त्वृषयस्त्वेकरश्मयः।<br>आश्रयाः पुण्यकीर्तीनां शुक्लाश्चापि स्ववर्णतः॥ २६<br><br>घनतोयात्मिका ज्ञेयाः कल्पादावेव निर्मिताः।<br>आदित्यरश्मिसंयोगात्सम्प्रकाशात्मिकाः स्मृताः॥ २७ | हजार किरणोंवाले सूर्यका अग्निमय सौरस्थान है। चन्द्रमाका स्थान जलमय तथा शुक्लवर्णका कहा गया है। बुधग्रहका निवासस्थान जलमय, श्याम तथा मनोहर बताया गया है। शुक्रका निवासस्थान भी जलमय, शुक्लवर्णवाला तथा सोलह किरणोंसे युक्त है। भौम (मंगल)-का स्थान उत्तम, लोहितवर्णवाला तथा नौ रश्मियोंसे युक्त है। बृहस्पतिका स्थान हरिद्रा (हल्दी)-की आभावाला, विशाल तथा सोलह रश्मियोंसे युक्त है। शनैश्चरका स्थान आठ रश्मियोंसे युक्त तथा कृष्ण वर्णवाला कहा गया है। राहुका स्थान अन्धकारमय है; यह प्राणियोंके लिये कष्टकारी स्थान है। सभी तारागणोंको ऋषिरूप तथा एक रश्मिवाला जानना चाहिये, ये पुण्यकीर्तिवालोंके आश्रय हैं तथा अपने वर्णसे शुक्ल हैं। इन्हें घने जलके स्वरूपवाला जानना चाहिये। ये कल्पके प्रारम्भमें ही निर्मित किये गये थे; ये सूर्यकी रश्मियोंके संयोगके कारण उत्तम प्रकाशसे युक्त कहे गये हैं॥ २२-२७॥ |
| नवयोजनसाहस्रो विष्कम्भः सवितुः स्मृतः।<br>त्रिगुणस्तस्य विस्तारो मण्डलस्य प्रमाणतः॥ २८<br><br>द्विगुणः सूर्यविस्ताराद्विस्तारः शशिनः स्मृतः।<br>तुल्यस्तयोस्तु स्वर्भानुर्भूत्वाधस्तात्प्रसर्पति॥ २९<br><br>उद्धृत्य पृथिवीछायां निर्मितां मण्डलाकृतिम्।<br>स्वर्भानोस्तु बृहत्स्थानं तृतीयं यत्तमोमयम्॥ ३०<br><br>आदित्यात्तच्च निष्क्रम्य समं गच्छति पर्वसु।<br>आदित्यमेति सोमाच्च पुनः सौरेषु पर्वसु॥ ३१<br><br>स्वर्भानुं नुदते यस्मात्तस्मात्स्वर्भानुरुच्यते। | सूर्यका विष्कम्भ (व्यास) नौ हजार योजन बताया गया है और मण्डलके प्रमाणसे उसका विस्तार तीन गुना है। चन्द्रमाका विस्तार सूर्यके विस्तारसे दुगुना कहा गया है। उन दोनोंके समान [विस्तारवाला] होकर राहु उनके नीचे गमन करता है। मण्डलके आकारकी बनी हुई पृथ्वी-छायाको लेकर राहुका तीसरा बड़ा स्थान है, जो अन्धकारमय है। वह राहु [चन्द्र] पर्वोंमें सूर्यसे निकलकर चन्द्रमाकी ओर जाता है और सौर पर्वोंमें चन्द्रमासे [निकलकर] सूर्यकी ओर जाता है। चूँकि राहु भानु (सूर्य)-को प्रेरित करता है, अतः इसे स्वर्भानु कहा जाता है॥ २८-३११/२॥ |
| चन्द्रस्य षोडशो भागो भार्गवस्य विधीयते॥ ३२ | शुक्रका विस्तार योजनके प्रमाणसे विष्कम्भ तथा |