श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २५४ | श्रीलिङ्गमहापुराणं | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| विष्कम्भान्मण्डलाच्चैव योजनाग्रात्प्रमाणतः।<br>भार्गवात्पादहीनस्तु विज्ञेयो वै बृहस्पतिः॥ ३३<br>बृहस्पतेः पादहीनौ वक्रसौरी उभौ स्मृतौ।<br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पादहीनस्तयोर्बुधः॥ ३४<br>तारानक्षत्ररूपाणि वपुष्मन्तीह यानि वै।<br>बुधेन तानि तुल्यानि विस्तारान्मण्डलाच्च वै॥ ३५ | मण्डल (घेरा)-में चन्द्रमाका सोलहवाँ भाग कहा गया है। बृहस्पतिको शुक्रसे एक चौथाई कम जानना चाहिये। बृहस्पतिसे एक चौथाई कम मंगल तथा शनि—ये दोनों बताये गये हैं। बुध विस्तार तथा मण्डलमें उन दोनोंसे एक चौथाई कम है। तारा-नक्षत्ररूपवाले जो पिण्ड हैं, वे विस्तार तथा मण्डलमें बुधके बराबर हैं॥ ३२—३५॥ |
| प्रायशश्चन्द्रयोगीनि विद्यादृक्षाणि तत्त्ववित्।<br>तारानक्षत्ररूपाणि हीनानि तु परस्परम्॥ ३६<br>शतानि पञ्च चत्वारि त्रीणि द्वे चैव योजने।<br>सर्वोपरि निकृष्टानि तारकामण्डलानि तु॥ ३७<br>योजनान्यर्धमात्राणि तेभ्यो ह्रस्वं न विद्यते।<br>उपरिष्टात्त्रयस्तेषां ग्रहास्ते दूरसर्पिणः॥ ३८<br>सौरोऽङ्गिरसश्च वक्रश्च ज्ञेया मन्दविचारिणः।<br>पूर्वमेव समाख्याता गतिस्तेषां यथाक्रमम्॥ ३९ | तत्त्ववेत्ताको प्रायः सभी नक्षत्रोंको चन्द्रमासे सम्बद्ध जानना चाहिये। तारा-नक्षत्ररूपवाले वे परस्पर बहुत छोटे हैं। वे [छोटे तारे] पाँच, चार, तीन तथा दो योजन विस्तारवाले हैं। इन सबके ऊपर अत्यन्त छोटे तारा-मण्डल हैं, जो केवल आधे योजनके हैं, उनसे छोटा कोई तारा नहीं है। उनके ऊपर तीन ग्रह हैं, वे दूर-दूर भ्रमण करनेवाले हैं। वे सौर, अंगिरा (बृहस्पति) तथा वक्र (भौम) हैं, इन्हें मन्दगतिसे भ्रमण करनेवाला जानना चाहिये। उनकी गतिके विषयमें पहले ही क्रमसे बता दिया गया है॥ ३६—३९॥ |
| एतेष्वेव ग्रहाः सर्वे नक्षत्रेषु समुत्थिताः।<br>विवस्वानदितेः पुत्रः सूर्यो वै मुनिसत्तमाः॥ ४०<br>विशाखासु समुत्पन्नो ग्रहाणां प्रथमो ग्रहः।<br>त्विषिमान् धर्मपुत्रस्तु सोमो देवो वसुस्तु सः॥ ४१<br>शीतरश्मिः समुत्पन्नः कृत्तिकासु निशाकरः।<br>षोडशार्चिर्भृगोः पुत्रः शुक्रः सूर्यादनन्तरम्॥ ४२<br>ताराग्रहाणां प्रवरस्तिष्ये क्षेत्रे समुत्थितः।<br>ग्रहश्चाङ्गिरसः पुत्रो द्वादशार्चिर्बृहस्पतिः॥ ४३<br>फाल्गुनीषु समुत्पन्नः पूर्वाख्यासु जगद्गुरुः।<br>नवार्चिर्लोहिताङ्गश्च प्रजापतिसुतो ग्रहः॥ ४४<br>आषाढास्विह पूर्वांसु समुत्पन्न इति स्मृतः।<br>रेवतीष्वेव सप्ताचिःस्थाने सौरिः शनैश्चरः॥ ४५<br>सौम्यो बुधो धनिष्ठासु पञ्चार्चिरुदितो ग्रहः।<br>तमोमयो मृत्युसुतः प्रजाक्षयकरः शिखी॥ ४६<br>आश्लेषासु समुत्पन्नः सर्वहारी महाग्रहः।<br>तथा स्वनामधेयेषु दाक्षायण्यः समुत्थिताः॥ ४७<br>तमोवीर्यमयो राहुः प्रकृत्या कृष्णमण्डलः।<br>भरणीषु समुत्पन्नो ग्रहश्चन्द्रार्कमर्दनः॥ ४८ | सभी ग्रह इन्हीं नक्षत्रोंमें उत्पन्न हुए हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! अदितिका पुत्र विवस्वान् सूर्य, जो ग्रहोंमें प्रथम है, विशाखा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। धर्मका पुत्र ओजस्वी सोम वसु देवता है, वह शीत रश्मिवाला चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। सोलह रश्मियोंवाला भृगुपुत्र शुक्र जो ताराग्रहोंमें श्रेष्ठ है, सूर्यके बाद तिष्य नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। बारह किरणोंवाला अंगिरापुत्र जगद्गुरु बृहस्पति ग्रह पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। नौ किरणोंसे युक्त तथा लोहित अंगवाला प्रजापतिपुत्र भौमग्रह पूर्वाषाढ नक्षत्रमें उत्पन्न होनेवाला कहा गया है। सात किरणोंसे युक्त सूर्यपुत्र शनैश्चर रेवती नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। पाँच किरणोंवाला चन्द्रपुत्र बुध ग्रह धनिष्ठा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। अन्धकारमय, प्रजाका क्षय करनेवाला तथा सबका विनाशक महाग्रह मृत्युपुत्र शिखी (केतु) आश्लेषा नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है। दक्षकी पुत्रियाँ अपने-अपने नामवाले नक्षत्रोंमें उत्पन्न हुई हैं। अन्धकार तथा ओजसे परिपूर्ण, प्रकृतिसे काले मण्डलवाला और सूर्य-चन्द्रका मर्दन करनेवाला ग्रह राहु भरणी नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है॥ ४०—४८॥ |