श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ६५ ] | सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम | २७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अम्बरीषस्य दायादो युवनाश्वोऽपरः स्मृतः ।<br>हरितो युवनाश्वस्य हरितास्तु यतः स्मृताः ॥ ४०<br>एते ह्याङ्गिरसः पक्षे क्षत्रोपेता द्विजातयः ।<br>पुरुकुत्सस्य दायादस्त्रसदस्युर्महायशाः ॥ ४१<br>नर्मदायां समुत्पन्नः सम्भूतिस्तस्य चात्मजः ।<br>विष्णुवृद्धः सुतस्तस्य विष्णुवृद्धा यतः स्मृताः ॥ ४२<br>एते ह्याङ्गिरसः पक्षे क्षत्रोपेताः समाश्रिताः ।<br>सम्भूतिरपरं पुत्रमनरण्यमजीजनत् ॥ ४३<br>रावणेन हतो योऽसौ त्रैलोक्यविजये द्विजाः ।<br>बृहदश्वोऽनरण्यस्य हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ॥ ४४<br>हर्यश्वात्तु दृषद्वत्यां जज्ञे वसुमना नृपः ।<br>तस्य पुत्रोऽभवद्राजा त्रिधन्वा भवभावितः ॥ ४५<br>प्रसादाद् ब्रह्मसूनोर्वै तण्डिनः प्राप्य शिष्यताम् ।<br>अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्य तदाज्ञया ॥ ४६<br>गणैश्वर्यमनुप्राप्तो भवभक्तः प्रतापवान् ।<br>कथं चैवाश्वमेधं वै करोमीति विचिन्तयन् ॥ ४७<br>धनहीनश्च धर्मात्मा दृष्टवान् ब्रह्मणः सुतम् ।<br>तण्डिसंज्ञं द्विजं तस्माल्लब्धवान् द्विजसत्तमाः ॥ ४८<br>नाम्नां सहस्रं रुद्रस्य ब्रह्मणा कथितं पुरा ।<br>तेन नाम्नां सहस्रेण स्तुत्वा तण्डिर्महेश्वरम् ॥ ४९<br>लब्धवान् गाणपत्यं च ब्रह्मयोनिर्द्विजोत्तमः ।<br>ततस्तस्मान्नृपो लब्ध्वा तण्डिना कथितं पुरा ॥ ५०<br>नाम्नां सहस्रं जप्त्वा वै गाणपत्यमवाप्तवान् । | ये तीनों लोकोंमें विख्यात थे। अम्बरीषके पुत्र युवनाश्व द्वितीय बताये गये हैं। युवनाश्वके पुत्र हरित थे, जिनसे उत्पन्न सभी पुत्र 'हरित' [नामवाले] कहे गये हैं। ये सब अंगिराके वंशके ब्राह्मण थे, किन्तु क्षत्रिय-स्वभाववाले थे॥ ३१–४० १/२॥<br><br>पुरुकुत्सके पुत्र महायशस्वी त्रसदस्यु थे। उनके पुत्र सम्भूति थे, जो नर्मदाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। उन [सम्भूति]-के पुत्र विष्णुवृद्ध थे। विष्णुवृद्धके सभी वंशज विष्णुवृद्ध [नामवाले] कहे गये हैं। ये सब भी अंगिराके वंशमें [ब्राह्मण] थे, किन्तु क्षत्रिय-स्वभावसे युक्त थे। हे द्विजो! सम्भूतिने अनरण्य नामक दूसरे पुत्रको उत्पन्न किया, जो त्रैलोक्य-विजयके समय रावणके द्वारा मार दिये गये। अनरण्यके पुत्र बृहदश्व और बृहदश्वके पुत्र हर्यश्व थे। हर्यश्वसे [उनकी पत्नी] दृषद्वतीके गर्भसे राजा 'वसुमना' उत्पन्न हुए। उनके त्रिधन्वा नामक पुत्र हुए; वे शिवभक्त थे। उन प्रतापी तथा शिवभक्तने ब्रह्माके पुत्र तण्डीकी कृपासे उनकी शिष्यता प्राप्त करके और उनकी आज्ञासे हजार अश्वमेधका फल प्राप्तकर गणोंके स्वामीका पद ग्रहण कर लिया था। 'मैं अश्वमेध कैसे करूँ'—[किसी समय] ऐसा सोचते हुए उन धनहीन धर्मात्मा [त्रिधन्वा]-ने ब्रह्माके पुत्र तण्डी नामक ब्राह्मणको देखा और हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! रुद्रसहस्रनामको उनसे प्राप्त कर लिया। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने [तण्डीको] रुद्रसहस्रनाम बताया था; उसी सहस्रनामसे महेश्वरकी स्तुति करके ब्रह्माजीके पुत्र द्विजश्रेष्ठ तण्डीने गणाधिप पद प्राप्त किया था। तदनन्तर पूर्वकालमें तण्डीके द्वारा बताये गये रुद्र सहस्रनामको ग्रहण करके राजा [त्रिधन्वा]-ने भी गणाधिप पद प्राप्त किया॥ ४१–५० १/२ ॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>नाम्नां सहस्रं रुद्रस्य तण्डिना ब्रह्मयोनिना ॥ ५१<br>कथितं सर्ववेदार्थसञ्चयं सूत सुव्रत ।<br>नाम्नां सहस्रं विप्राणां वक्तुमर्हसि शोभनम् ॥ ५२ | **ऋषिगण बोले—**ब्रह्माके पुत्र तण्डीके द्वारा कहा गया रुद्रसहस्रनाम समग्र वेदार्थोंसे परिपूर्ण है; हे सूतजी! हे सुव्रत! उस उत्तम सहस्रनामको कृपा करके [हम] विप्रोंको बताइये॥ ५१–५२॥ |
| सूत उवाच<br>सर्वभूतात्मभूतस्य हरस्यामिततेजसः ।<br>अष्टोत्तरसहस्रं तु नाम्नां शृणुत सुव्रताः ॥ ५३ | **सूतजी बोले—**हे सुव्रतो! हे श्रेष्ठ मुनियो! सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप तथा अमित तेजवाले रुद्रके एक |