श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१९
| तौ वाराहे तु भूर्लोके तेजः सङ्क्षिप्य धिष्ठितौ।<br>तावुभौ मोक्षकर्मणावारोग्यात्मानमात्मनि॥ १७२<br><br>प्रजां धर्मं च कामं च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितौ।<br>यथोत्पन्नस्तथैवेह कुमारः स इहोच्यते॥ १७३<br><br>तस्मात्सनत्कुमारोति नामास्येह प्रकीर्तितम्।<br>सनन्दं सनकं चैव विद्वांसं च सनातनम्॥ १७४<br><br>विज्ञानेन निवृत्तास्ते व्यवर्तन्त महौजसः।<br>सम्बुद्धाश्चैव नानात्वे अप्रवृत्ताश्च योगिनः॥ १७५<br><br>असृष्ट्वैव प्रजासर्गं प्रतिसर्गं गताः पुनः।<br>ततस्तेषु व्यतीतेषु ततोऽन्यान् साधकान् सुतान्॥ १७६ | वे दोनों वाराहकल्पमें [अपने] तेजको संक्षिप्त करके पृथ्वीलोकमें अधिष्ठित हुए। मोक्षके लिये कर्मपरायण वे दोनों [मानसपुत्र] आत्माको अपनेमें स्थिर करके प्रजा, धर्म तथा कामका त्याग करके वैराग्यमें स्थित हो गये। सनत्कुमार जिस रूपमें उत्पन्न हुए थे, वैसे ही कुमार-रूपमें विद्यमान कहे जाते हैं, इसलिये इनका नाम 'सनत्कुमार' प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रकार ब्रह्माने [जिन] सनन्द, सनक तथा विद्वान् सनातनको उत्पन्न किया था, वे विशेष ज्ञानके द्वारा सांसारिकतासे निवृत्त रहे। महान् ओजवाले वे सब अविद्यापरिकल्पित भेदके प्रति सम्बुद्ध होकर अर्थात् उसे मिथ्या समझकर प्रवृत्तिसे रहित योगी हुए। प्रजाओंकी सृष्टि किये बिना ही वे मोक्षको प्राप्त हुए॥ १७०-१७५ १/२॥ | | मानसानसृजद् ब्रह्मा पुनः स्थानाभिमानिनः।<br>आभूतसम्प्लवावस्था यैरियं विधृता मही॥ १७७<br><br>आपोऽग्निं पृथिवीं वायुमन्तरिक्षं दिवं तथा।<br>समुद्रांश्च नदीश्चैव तथा शैलवनस्पतीन्॥ १७८<br><br>ओषधीनां तथात्मानो वल्लीनां वृक्षवीरुधाम्।<br>लताः काष्ठाः कलाश्चैव मुहूर्ताः सन्धिररात्र्यहान्॥ १७९<br><br>अर्धमासांश्च मासांश्च अयनाब्दयुगानि च।<br>स्थानाभिमानिनः सर्वे स्थानाख्याश्चैव ते स्मृताः॥ १८० | उन सबके मोक्षको प्राप्त हो जानेपर ब्रह्माने अपने स्थानके अभिमानी तथा कार्यक्षम अन्य मानस पुत्रोंका सृजन किया, जिन्होंने प्रलयपर्यन्त इस पृथ्वीको धारण किया। इसके बाद ब्रह्माने जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, समुद्रों, नदियों, पर्वतों, वनस्पतियों, औषधियों, वल्लियों, वृक्षों, झाड़ियों, लताओं, काष्ठाओं, कलाओं, मुहूर्तों, सन्धियों, रात्रि, दिन, पक्षों, मासों, अयनों, वर्षों तथा युगोंका सृजन किया। अपने स्थानोंके अभिमानी वे सब अपने स्थानोंके नामवाले कहे गये हैं॥ १७६-१८०॥ | | देवानृषींश्च महतो गदतस्तान्निबोधत।<br>मरीचिभृग्वङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्॥ १८१<br><br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजन्मानसान्नव।<br>नव ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥ १८२<br><br>तेषां ब्रह्मात्मकानां वै सर्वेषां ब्रह्मवादिनाम्।<br>स्थानानि कल्पयामास पूर्ववत्पद्मसम्भवः॥ १८३<br><br>ततोऽसृजच्च सङ्कल्पं धर्मञ्चैव सुखावहम्।<br>सोऽसृजद्व्यवसायात्तु धर्मं देवो महेश्वरः॥ १८४<br><br>सङ्कल्पञ्चैव सङ्कल्पात्सर्वलोकपितामहः।<br>मानसश्च रुचिर्नाम विजज्ञे ब्रह्मणः प्रभोः॥ १८५ | अब मैं महान् देवताओं तथा ऋषियोंके विषयमें बता रहा हूँ; आपलोग उन्हें जान लें। उन [ब्रह्मा]-ने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—इन नौ मानस पुत्रोंका भी सृजन किया। ये लोग पुराणमें नौ ब्रह्माके रूपमें निर्धारित किये गये हैं। ब्रह्माने पूर्वकी भाँति ब्रह्माके स्वरूपवाले तथा ब्रह्मवादी उन सभीके लिये स्थानोंको कल्पित किया। इसके बाद उन्होंने सुख देनेवाले धर्म एवं संकल्पका भी सृजन किया। सभी लोकोंके पितामह देव महेश्वरने व्यवसायसे धर्मका तथा संकल्पके द्वारा संकल्पका सृजन किया। प्रभु ब्रह्माके मनसे [प्रजापति] रुचि नामक मानसपुत्र भी उत्पन्न हुआ॥ १८१-१८५॥ |