भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 322
३२०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्राणाद् ब्रह्मासृजद्दक्षं चक्षुर्भ्यां च मरीचिनम्।<br>भृगुस्तु हृदयाज्जज्ञे ऋषिः सलिलजन्मनः॥ १८६<br><br>शिरसोऽङ्गिरसश्चैव श्रोत्रादत्रिं तथासृजत्।<br>पुलस्त्यं च तथोदानाद्व्यानाच्च पुलहं पुनः॥ १८७<br><br>समानजो वसिष्ठश्च अपानान्निर्ममे क्रतुम्।<br>इत्येते ब्रह्मणः पुत्रा दिव्या एकादश स्मृताः॥ १८८ब्रह्माजीने [अपने] प्राणसे दक्षका तथा दोनों नेत्रोंसे मरीचिका सृजन किया। ऋषि भृगु जलमें जन्म लेनेवाले ब्रह्माके हृदयसे उत्पन्न हुए। उन्होंने सिरसे अंगिराको, कानसे अत्रिको, उदानवायुसे पुलस्त्यको तथा व्यानवायुसे पुलहको उत्पन्न किया। वसिष्ठ उनके समानवायुसे उत्पन्न हुए। उन्होंने अपानवायुसे क्रतुका सृजन किया। ये [संकल्प, धर्म, मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि, वसिष्ठ] ब्रह्माके ग्यारह दिव्य पुत्र कहे गये हैं॥ १८६-१८८॥
धर्मादयः प्रथमजाः सर्वे ते ब्रह्मणः सुताः।<br>भृग्वादयस्तु ते सृष्टा नवैते ब्रह्मवादिनः॥ १८९<br><br>गृहमेधिनः पुराणास्ते धर्मस्तैः सम्प्रवर्तितः।<br>तेषां द्वादश ते वंशा दिव्या देवगुणान्विताः॥ १९०प्रथम उत्पन्न धर्म आदि ब्रह्माजीके पुत्र हैं, जो भृगु आदि नौ [मानस पुत्र] सृजित किये गये, वे ब्रह्मवादी हुए। वे प्राचीन गृहस्थ थे और उन्हींके द्वारा धर्म प्रवर्तित हुआ। उनके दिव्य, देवगुणसम्पन्न, क्रियावान्, सन्तानवाले तथा महर्षियोंसे अलंकृत बारह वंश हुए॥ १८९-१९० १/२॥
क्रियावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलङ्कृताः।<br>ऋभुः सनत्कुमारश्च द्वावेतावूर्ध्वरेतसौ॥ १९१<br><br>पूर्वोत्पन्नौ परं तेभ्यः सर्वेषामपि पूर्वजौ।<br>व्यतीते त्वष्टमे कल्पे पुराणौ लोकसाक्षिणौ॥ १९२<br><br>विराजेतामुभौ लोके तेजः सङ्क्षिप्य धिष्ठितौ।<br>तावुभौ योगकर्माणौवारोप्यात्मानमात्मनि॥ १९३<br><br>प्रजां धर्मं च कामञ्च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितौ।<br>यथोत्पन्नः स एवेह कुमारः स इहोच्यते॥ १९४ऋभु तथा सनत्कुमार—ये दोनों ब्रह्मचारी थे; ये उनसे पहले उत्पन्न हुए थे और सभीके पूर्वज थे। आठवें कल्पके व्यतीत होनेपर प्राचीन तथा लोकोंके साक्षी वे दोनों [अपने] तेजको संक्षिप्त करके लोकमें प्रतिष्ठित होकर विराजमान हुए। योगकर्मपरायण वे दोनों आत्माको अपनेमें आरोपित करके प्रजा, धर्म तथा कामका त्याग करके वैराग्यमें स्थित हो गये। वे सन्त् जिस रूपमें उत्पन्न हुए थे, वैसे ही सदा रहनेके कारण इस लोकमें 'कुमार' कहे जाते हैं और इसीलिये उनका 'सनत्कुमार'—यह नाम प्रसिद्ध हो गया॥ १९१-१९४ १/२॥
तस्मात्सनत्कुमारेति नामास्येह प्रतिष्ठितम्।<br>ततोऽभिध्याय तस्तस्य जज्ञिरे मानसाः प्रजाः॥ १९५<br><br>तच्छरीरसमुत्पन्नैः कार्यैस्तैः कारणैः सह।<br>क्षेत्रज्ञाः समवर्तन्त गात्रेभ्यस्तस्य धीमतः॥ १९६<br><br>ततो देवासुरपितॄन् मानुषांश्च चतुष्टयम्।<br>सिसृक्षुरम्भांस्येतानि स्वमात्मानमयूयुजत्॥ १९७<br><br>ततस्तु युञ्जतस्तस्य तमोमात्रसमुद्भवम्।<br>समभिध्यायतः सर्गं प्रयत्नेन प्रजापतेः॥ १९८<br><br>ततोऽस्य जघनात्पूर्वमसुरा जज्ञिरे सुताः।<br>असुः प्राणः स्मृतो विप्रास्तज्जन्मानस्ततोऽसुराः॥ १९९इसके बाद ध्यान करते हुए उन ब्रह्माकी मानस प्रजाएँ (सन्तानें) उत्पन्न हुईं। पुनः उनके शरीरसे उत्पन्न उन कार्यों तथा कारणोंके साथ बुद्धिमान् ब्रह्माके अंगोंसे क्षेत्रज्ञ उत्पन्न हुए। इसके बाद देवता, असुर, पितर, मनुष्य—इन चार अम्भोंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले ब्रह्माने अपने मनको विचारयुक्त किया। तदनन्तर मनको विचारयुक्त करते हुए तथा प्रयत्नपूर्वक तमोमात्रसे उत्पन्न होनेवाले सर्गका चिन्तन करते हुए उन प्रजापतिकी जंघासे सर्वप्रथम असुरपुत्र उत्पन्न हुए।
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