श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ७० ] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... 'सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव <span style="float: right;">३२१</span>
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| यया सृष्टासुराः सर्वे तां तनुं स व्यपोहत।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यो रात्रिरजायत॥ २००<br><br>सा तमोबहुला यस्मात्ततो रात्रिर्नियामिका।<br>आवृतास्तमसा रात्रौ प्रजास्तस्मात्स्वपन्त्युत॥ २०१ | हे विप्रो! 'असुः' को प्राण कहा गया है; इसलिये उससे जन्म लेनेके कारण वे असुर हुए। जिस शरीरसे उन्होंने सभी असुरोंको उत्पन्न किया था, उस शरीरको छोड़ दिया। तब उनके द्वारा त्यक्त वह शरीर तत्काल रात्रि हो गयी। वह रात्रि अन्धकारकी अधिकतासे युक्त होती है, अतः वह नियामिका (सबको शयन करानेवाली) है। प्रजाएँ रातमें अन्धकारसे आवृत हो जाती हैं, इसलिये वे सोती हैं॥ १९५-२०१॥ |
| सृष्ट्वासुरांस्ततः सो वै तनुमन्यामगृह्णत।<br>अव्यक्तां सत्त्वबहुलां ततस्तां सोऽभ्यपूजयत्॥ २०२<br><br>ततस्तां युञ्जतस्तस्य प्रियमासीत्प्रजापतेः।<br>ततो मुखात्समुत्पन्ना दीव्यतस्तस्य देवताः॥ २०३<br><br>यतोऽस्य दीव्यतो जातास्तेन देवाः प्रकीर्तिताः।<br>धातुर्दिविति यः प्रोक्तः क्रीडायां स विभाव्यते॥ २०४ | तत्पश्चात् असुरोंका सृजन करके उन्होंने अन्य अव्यक्त तथा सत्त्वबहुल शरीर धारण किया; इसलिये उन्होंने उसकी पूजा की। तब उस शरीरको धारण करनेवाले उन ब्रह्माको प्रसन्नता हुई। इसके बाद क्रीड़ा करते हुए ब्रह्माके मुखसे देवता उत्पन्न हुए। चूँकि क्रीड़ा करते हुए इन ब्रह्मासे वे उत्पन्न हुए, इसलिये वे देवता कहे गये हैं। जो 'दिव्' धातु कही गयी है, वह क्रीड़ाके अर्थमें जानी जाती है। उन ब्रह्मासे वे क्रीड़ा करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये देवता कहे जाते हैं॥ २०२-२०४ १/२॥ |
| यस्मात्तस्य तु दीव्यन्तो जज्ञिरे तेन देवताः।<br>देवान् सृष्ट्वाथ देवेशस्तनुमन्यामपद्यत॥ २०५<br><br>उत्सृष्टा सा तनुस्तेन सद्योऽहः समजायत।<br>तस्मादहो धर्मयुक्तं देवताः समुपासते॥ २०६<br><br>सत्त्वमात्रात्मिकामेव ततोऽन्यां सोऽभ्यमन्यत।<br>पितृत्वन्मन्यमानस्य पुत्रांस्तान् ध्यायतः प्रभोः॥ २०७<br><br>पितरो ह्युपपक्षाभ्यां रात्र्यहोरन्तरेऽभवन्।<br>तस्मात्ते पितरो देवाः पितृत्वं तेन तेषु तत्॥ २०८ | देवताओंका सृजन करके देवेशने अन्य शरीर धारण किया और उनके द्वारा छोड़ा गया वह [पहलेवाला] शरीर शीघ्र ही दिन बन गया। इसलिये देवतालोग धर्मयुक्त दिनकी उपासना करते हैं। उन्होंने सत्त्वगुणमय उस अन्य शरीरकी भी पूजा की। पिताके समान मानते हुए तथा उन [उत्पद्यमान] पुत्रोंका ध्यान करते हुए प्रभु (ब्रह्मा)-के [दाहिने-बाएँ] दोनों पार्श्वभागसे दिन तथा रातके बीच पितर उत्पन्न हुए, इसलिये वे पितर देवता हैं और उनमें पितृत्व है॥ २०५-२०८॥ |
| यया सृष्टास्तु पितरस्तनुं तां स व्यपोहत।<br>सापविद्धा तनुस्तेन सद्यः सन्ध्या व्यजायत॥ २०९<br><br>यस्मादहर्देवतानां रात्रिर्या सासुरी स्मृता।<br>तयोर्मध्ये तु पैत्री या तनुः सा तु गरीयसी॥ २१०<br><br>तस्माद्देवासुराः सर्वे ऋषयो मानवास्तथा।<br>उपासन्ते मुदायुक्ता रात्र्यहोर्मध्यमां तनुम्॥ २११ | उन्होंने जिस कायासे पितरोंका सृजन किया था, उस कायाको त्याग दिया। उनके द्वारा त्यक्त वह काया शीघ्र ही सन्ध्या हो गयी। चूँकि दिन देवताओंका होता है और जो रात है, वह आसुरी कही गयी है; अतः उन दोनोंके मध्य जो पैत्री (पितरोंकी) काया है, वह सबसे श्रेष्ठ है। इसी कारणसे सभी देवता, असुर, ऋषि तथा मनुष्य प्रसन्नतासे युक्त होकर रात्रि तथा दिनके मध्यकी काया (सन्ध्या)-की उपासना करते हैं॥ २०९-२११॥ |