भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 834 में से

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पृष्ठ 325

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३२३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राक्षसा नाम ते यस्मात् क्षुधाविष्टा निशाचराः ।<br>येऽब्रुवन् यक्षमोऽम्भांसि तेषां हृष्टाः परस्परम् ॥ २२६<br><br>तेन ते कर्मणा यक्षा गुह्यका गूढकर्मणा ।<br>रक्षेति पालने चापि धातुरेष विभाव्यते ॥ २२७<br><br>एवं च यक्षतिर्धातुर्भक्षणे स निरुच्यते ।क्योंकि वे क्षुधापीड़ित तथा रात्रिमें विचरण करनेवाले थे। उनमेंसे प्रसन्न होकर जिन्होंने परस्पर यह कहा—'हम इन अम्भोका भक्षण करते हैं' वे अपने उस कर्मके कारण यक्ष तथा गूढ़ कर्मके कारण गुह्यक हुए। 'रक्ष' यह धातु पालन अर्थमें जानी जाती है और इसी प्रकार 'यक्षति' धातु भक्षण अर्थमें कही जाती है॥ २२३—२२७¹/₂ ॥
तं दृष्ट्वा ह्यप्रियेणास्य केशाः शीर्णास्तु धीमतः ॥ २२८<br><br>ते शीर्णाश्चोत्थिता ह्यूर्ध्वं ते चैवारुरुधुः प्रभुम् ।<br>हीनास्तच्छिरसो बाला यस्माच्चैवावसर्पिणः ॥ २२९<br><br>व्यालात्मानः स्मृता बाला हीनत्वादहयः स्मृताः ।<br>पतत्वात्पन्नगाश्चैव सर्पाश्चैवावसर्पणात् ॥ २३०<br><br>तस्य क्रोधोद्भवो योऽसौ अग्निगर्भः सुदारुणः ।<br>स तु सर्पान् सहोत्पन्नानाविवेश विषात्मकः ॥ २३१उस सृष्टिको देखकर अप्रसन्नतासे युक्त उन बुद्धिमान् ब्रह्माके बाल शीर्ण हो गये। वे शीर्ण बाल [पुनः] ऊपर उठ गये और उन्होंने प्रभुको अवरुद्ध कर दिया। वे बाल सिरसे हीन हो गये थे, इसलिये [नीचेकी ओर] अपसर्पण करनेवाले हो गये; वे बाल व्यालस्वरूप कहे गये। वे हीन होनेके कारण 'अहि', गिरनेके कारण 'पन्नग' और अपसर्पण करनेके कारण 'सर्प' कहे गये हैं। उनके क्रोधसे उत्पन्न जो महाभयंकर विषमग्र अग्निगर्भ था, वह साथमें उत्पन्न हुए सर्पोंमें प्रविष्ट हो गया॥ २२८—२३१॥
सर्पान् सृष्ट्वा ततः क्रुद्धः क्रोधात्मानो विनिर्ममे ।<br>वर्णेन कपिशेनोग्रास्ते भूताः पिशिताशनाः ॥ २३२<br><br>भूतत्वात्ते स्मृता भूताः पिशाचाः पिशिताशनात् ।<br>प्रसन्नं गायतस्तस्य गन्धर्वा जज्ञिरे यदा ॥ २३३<br><br>धयतीत्येष वै धातुः गानत्वे परिपठ्यते ।<br>धयन्तो जज्ञिरे वाचं गन्धर्वास्तेन ते स्मृताः ॥ २३४तब सर्पोंको देखकर ब्रह्माजी क्रुद्ध हुए और उन्होंने क्रोधमय स्वरूपवालोंको उत्पन्न किया। वे कपिश वर्ण, अत्यन्त उग्र तथा मांसका भक्षण करनेवाले भूत थे। वे भूतत्वके कारण 'भूत' तथा मांसभक्षण करनेके कारण 'पिशाच' कहे गये हैं। प्रसन्नतापूर्वक गान करते हुए उन ब्रह्मासे गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। 'धयति'—यह धातु गान अर्थमें पढ़ी जाती है; वे वाणीका गान करते हुए उत्पन्न हुए, इसलिये 'गन्धर्व' कहे गये हैं॥ २३२—२३४॥
अष्टस्वेतासु सृष्टासु देवयोनिषु स प्रभुः ।<br>ततः स्वच्छन्दतोऽन्यानि वयांसि वयसासृजत् ॥ २३५<br><br>स्वच्छन्दतः स्वच्छन्दांसि वयसा च वयांसि च ।<br>पशून् सृष्ट्वा स देवेशोऽसृजत्पक्षिगणानपि ॥ २३६इन आठ देवयोनियोंको सृजित करनेके अनन्तर उन प्रभुने स्वच्छन्दतापूर्वक अपनी आयुसे अन्य पक्षियोंका सृजन किया। पुनः उन्होंने स्वच्छन्दतापूर्वक स्वेच्छासे विचरण करनेवाले पक्षियोंका सृजन किया। इस प्रकार उन देवेशने पशुओंकी सृष्टि करके पक्षिसमुदायका भी सृजन किया था॥ २३५-२३६॥
मुखतोऽजाः ससर्जाथ वक्षसश्चावयोसृजत् ।<br>गाश्चैवाथोदरद् ब्रह्मा पार्श्वाभ्यां च विनिर्ममे ॥ २३७<br><br>पद्भ्यां चाश्वान् समातङ्गान् रासभानावयान् मृगान् ।<br>उष्ट्रानश्वतरांश्चैव तथान्याश्चैव जातयः ॥ २३८ब्रह्माने [अपने] मुखसे बकरियोंका तथा वक्ष (छाती) से भेड़ोंका सृजन किया। उन्होंने उदरसे तथा पार्श्वभागोंसे गायोंकी रचना की। उन्होंने [अपने] पैरोंसे घोड़ों, हाथियों, गधों, आवयों, मृगों, ऊँटों और खच्चरोंका
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