भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 834 में से

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पृष्ठ 326
३२४श्रीलिङ्गमहापुराण[पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ओषध्यः फलमूलिन्यो रोमभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>एवं पशवोषधीः सृष्ट्वायुयुजत्सोऽध्वरे प्रभुः॥ २३९सृजन किया; इसी प्रकार अन्य जातियाँ भी उत्पन्न हुईं। उनके रोमोंसे फल तथा मूलवाली औषधियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार पशुओं तथा औषधियोंका सृजन करके वे प्रभु यज्ञमें लग गये॥ २३७-२३९॥
गौरजः पुरुषो मेषो ह्यश्वोऽश्वतरगर्दभौ।<br>एतान् ग्राम्यान् पशूनाहुरारण्यान्वैनिबोधत॥ २४०<br><br>श्वापदो द्विखुरो हस्ती वानराः पक्षिपञ्चमाः।<br>आदकाः पशवः षष्ठाः सप्तमास्तु सरीसृपाः॥ २४१<br><br>महिषा गवयाक्षाश्च प्लवङ्गाः शरभा वृकाः।<br>सिंहस्तु सप्तमस्तेषामारण्याः पशवः स्मृताः॥ २४२गाय, अज, पुरुष (मनुष्य), मेष, अश्व, खच्चर तथा गधे—इन्हें ग्राम्य पशु कहा गया है। [नरमेधमें पशुत्वकी कल्पनाके कारण मनुष्यको पशुकोटिमें माना गया है] अब जंगली पशुओंको जान लीजिये। श्वापद (व्याघ्र आदि), द्विखुर (गवय आदि), हाथी, वानर, पाँचवाँ पक्षी, छठाँ आदक पशु तथा सातवाँ सरीसृप—ये जंगली पशु हैं। इनके अतिरिक्त महिष, गवय, हिरण, प्लवंग, शरभ, वृक तथा सातवाँ सिंह—ये जंगली पशु कहे गये हैं॥ २४०-२४२॥
गायत्रं च ऋचं चैव त्रिवृत्साम रथन्तरम्।<br>अग्निष्टोमं च यज्ञानां निर्ममे प्रथमान्मुखात्॥ २४३<br><br>यजूंषि त्रैष्टुभं छन्दस्तोमं पञ्चदशं तथा।<br>बृहत्साम तथोक्थ्यं च दक्षिणादसृजन्मुखात्॥ २४४<br><br>सामानि जगतीच्छन्दस्तोमं सप्तदशं तथा।<br>वैरूपमतिरात्रं च पश्चिमादसृजन्मुखात्॥ २४५<br><br>एकविंशमथर्वाणमाप्तोर्यामाणमेव च।<br>अनुष्टुभं सवैराजमुत्तरादसृजन्मुखात्॥ २४६<br><br>विद्युतो शनिमेघांश्च रोहितेन्द्रधनूंषि च।<br>तेजांसि च ससर्जादौ कल्पस्य भगवान् प्रभुः॥ २४७<br><br>उच्चावचानि भूतानि गात्रेभ्यस्तस्य जज्ञिरे।<br>ब्रह्मणस्तु प्रजासर्गं सृजतो हि प्रजापतेः॥ २४८ब्रह्माने [अपने] प्रथम (पूर्व) मुखसे गायत्री छन्द, ऋग्वेद, [गीयमान] त्रिवृत् साम, रथन्तर साम तथा यज्ञोंमें मुख्य अग्निष्टोमकी रचना की। उन्होंने दक्षिण मुखसे यजुर्वेद, त्रिष्टुप् छन्द, पंचदशावृत्त साम, बृहत्साम तथा उक्थ्यकी रचना की। उन्होंने पश्चिम मुखसे साम, जगतीछन्द, सप्तदशावृत्त स्तोम, वैरूपसाम तथा अतिरात्रयज्ञकी रचना की। उन्होंने उत्तर मुखसे इक्कीस अथर्व प्रार्थना-मन्त्रों, आप्तोर्यामाण, अनुष्टुप् छन्द तथा वैराज छन्दकी रचना की। भगवान् ब्रह्माने कल्पके प्रारम्भमें विद्युत्, वज्र, मेघों, रोहित वर्णवाले इन्द्रधनुषों तथा तेजोंकी रचना की। प्रजाओंकी सृष्टि करते हुए उन प्रजापति ब्रह्माके अंगोंसे उच्च तथा निम्न भूत (प्राणी) उत्पन्न हुए॥ २४३-२४८॥
सृष्ट्वा चतुष्टयं पूर्वं देवासुरनरान् पितॄन्।<br>ततोऽसृजत भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ २४९<br><br>यक्षान् पिशाचान् गन्धर्वांस्त्वथैवाप्सरसां गणान्।<br>नरकिन्नररक्षांसि वयःपशुमृगोरगान्॥ २५०<br><br>अव्ययं च व्ययं चापि यदिदं स्थाणुजङ्गमम्।<br>तेषां वै यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे॥ २५१<br><br>तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः।<br>हिंस्त्राहिंस्त्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मे नृतानृते॥ २५२पहले देवता, असुर, मनुष्य तथा पितर—इन चारोंकी सृष्टि करके उन्होंने स्थावर तथा जंगम भूतोंका सृजन किया; उन्होंने यक्षों, पिशाचों, गन्धर्वों, अप्सरागणों, मनुष्यों, किन्नरों, राक्षसों, पक्षियों, पशुओं, मृगों और सर्पों तथा अव्यय एवं व्यय; जो भी स्थावर-जंगम हैं—उन सबका सृजन किया। पूर्व सृष्टिमें उनके जो कर्म थे, बार-बार सृजित किये जाते हुए वे प्राणी उन्हीं कर्मोंको प्राप्त करते हैं। वे अपने लिये अनुकूल हिंसा-अहिंसा, मृदुता-क्रूरता, धर्म-अधर्म तथा मिथ्या-सत्यमें
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