भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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३६६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

पचहत्तरवाँ अध्याय

शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण

ऋषय ऊचुः<br>निष्कलो निर्मलो नित्यः सकलत्वं कथं गतः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथापूर्वं यथाश्रुतम्॥ १ऋषिगण बोले— निष्कल (निर्गुण), निर्मल तथा नित्य (शाश्वत) शिव सकलत्व (सगुणता)-को कैसे प्राप्त हुए? [हे सूतजी!] आपने जैसा पहले सुना है, उसे हम लोगोंको बताइये॥ १॥
सूत उवाच<br>परमार्थविदः केचिदूचुः प्रणवरूपिणम्।<br>विज्ञानमिति विप्रेन्द्राः श्रुत्वा श्रुतिशिरस्यजम्॥ २<br>शब्दादिविषयं ज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते।<br>तज्ज्ञानं भ्रान्तिरहितमित्यन्ये नेति चापरे॥ ३सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ विप्रो! कुछ तत्त्वज्ञोंने उपनिषदोंमें शिवको अजन्मा सुनकर उन्हें प्रणवरूप विज्ञान कहा है। शब्द आदि विषयोंका जो ज्ञान है, उसे 'ज्ञान' कहा जाता है। अन्य लोग कहते हैं कि जो भ्रान्तिरहित ज्ञान है, वही ज्ञान है; दूसरे लोग कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है॥ २-३॥
यज्ज्ञानं निर्मलं शुद्धं निर्विकल्पं निराश्रयम्।<br>गुरुप्रकाशकं ज्ञानमित्यन्ये मुनयो द्विजाः॥ ४हे द्विजो! अन्य मुनि लोग कहते हैं कि जो ज्ञान निर्मल, शुद्ध, निर्विकल्प, आश्रयरहित तथा गुरुके द्वारा प्रकाशित है, वह [वास्तविक] ज्ञान है॥ ४॥
ज्ञानेनैव भवेन्मुक्तिः प्रसादो ज्ञानसिद्धये।<br>उभाभ्यां मुच्यते योगी तत्रानन्दमयो भवेत्॥ ५<br>वदन्ति मुनयः केचित्कर्मणा तस्य सङ्गतिम्।<br>कल्पनाकल्पितं रूपं संहृत्य स्वेच्छयैव हि॥ ६ज्ञानसे ही मुक्ति प्राप्त होती है; ज्ञानसिद्धिके लिये [ईश्वरकी] प्रसन्नता आवश्यक है। दोनोंके द्वारा योगी मुक्त हो जाता है और वह आनन्दमय हो जाता है। कुछ मुनि स्वेच्छासे मायाविरचित रूपको हृदयमें भावित करके (विचारकर) विधिप्रतिपादित निष्काम कर्मद्वारा उस ज्ञानकी संगतिको बताते हैं॥ ५-६॥
द्यौर्मूर्धा तु विभोस्तस्य खं नाभिः परमेष्ठिनः।<br>सोमसूर्याग्नयो नेत्रं दिशः श्रोत्रं महात्मनः॥ ७<br>चरणौ चैव पातालं समुद्रस्तस्य चाम्बरम्।<br>देवास्तस्य भुजाः सर्वे नक्षत्राणि च भूषणम्॥ ८<br>प्रकृतिस्तस्य पत्नी च पुरुषो लिङ्गमुच्यते।<br>वक्त्राद्वै ब्राह्मणाः सर्वे ब्रह्मा च भगवान् प्रभुः॥ ९<br>इन्द्रोपेन्द्रौ भुजाभ्यां तु क्षत्रियाश्च महात्मनः।<br>वैश्याश्चोरुप्रदेशात्तु शूद्राः पादात्पिनाकिनः॥ १०<br>पुष्करावर्तकाद्यास्तु केशास्तस्य प्रकीर्तिताः।<br>वायवो घ्राणजास्तस्य गतिः श्रौतं स्मृतिस्तथा॥ ११द्यौ (स्वर्ग) उन विभुका सिर है, आकाश उन परमेश्वरकी नाभि है, चन्द्र-सूर्य-अग्नि [उनके] नेत्र हैं, दिशाएँ [उन] महात्माके कान हैं, पाताल ही [उनके] दोनों चरण हैं, समुद्र उनका वस्त्र है, सभी देवता उनकी भुजाएँ हैं, [सभी] नक्षत्र [उनके] आभूषण हैं। प्रकृतिको [उनकी] पत्नी तथा पुरुषको [उनका] लिङ्ग कहा जाता है। सभी ब्राह्मण, ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, इन्द्र तथा उपेन्द्र उनके मुखसे; महात्मा क्षत्रिय भुजाओंसे; वैश्य उनके ऊरुप्रदेशसे तथा शूद्र उन पिनाकधारीके पैरसे उत्पन्न हुए हैं। पुष्कर, आवर्त आदि [मेघ] उनके केश कहे गये हैं। सभी वायु उनकी नासिकासे उत्पन्न हुए हैं। श्रुति तथा स्मृतिमें कथित कर्म उनकी गति हैं॥ ७-११॥