श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७४] ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण...स्थापनाका माहात्म्य ३६५
| बहुधा लिङ्गभेदाश्च नव चैव समासतः।<br>मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः॥ १९<br><br>रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः।<br>लिङ्गवेदी महादेवी त्रिगुणा त्रित्रयाम्बिका॥ २०<br><br>तया च पूजयेद्यस्तु देवी देवश्च पूजितौ।<br>शैलजं रत्नजं वापि धातुजं वापि दारुजम्॥ २१<br><br>मृन्मयं क्षणिकं वापि भक्त्या स्थाप्य फलं शुभम्।<br>सुरेन्द्राम्भोजगर्भार्ग्नियमम्बुपधनेश्वरैः ॥ २२<br><br>सिद्धविद्याधराहीन्द्रैर्यक्षदानवकिन्नरैः ।<br>स्तूयमानः सुपुण्यात्मा देवदुन्दुभिनिःस्वनैः॥ २३<br><br>भूर्भुवःस्वर्महर्लोकान् क्रमाद्वै जनतः परम्।<br>तपः सत्यं पराक्रम्य भासयन् स्वेन तेजसा॥ २४<br><br>लिङ्गस्थापनसन्मार्गनिहितस्वायतासिना ।<br>आशु ब्रह्माण्डमुद्भिद्य निर्गच्छेन्निर्विशङ्कया॥ २५ | लिङ्गोंके बहुत भेद हैं; संक्षेपमें वे नौ हैं। [लिङ्गके] मूलमें ब्रह्मा, मध्यमें तीनों लोकोंके ईश्वर विष्णु तथा ऊपरी भागमें प्रणवसंज्ञक महादेव रुद्र सदाशिव विराजमान रहते हैं। लिङ्गकी वेदी महादेवी अम्बिका हैं; वे [सत्, रज, तम] तीनों गुणोंसे तथा त्रिदेवोंसे युक्त रहती हैं। जो उस [वेदी]-के साथ लिङ्गकी पूजा करता है, उसने मानो महादेव तथा भगवती [पार्वती]-का पूजन कर लिया। पाषाणनिर्मित, रत्ननिर्मित, धातुनिर्मित, काष्ठनिर्मित, पार्थिव अथवा क्षणिक जो भी लिङ्ग हो—उसे भक्तिपूर्वक स्थापित करके [व्यक्ति] शुभ फल प्राप्त करता है। वह परम पुण्यात्मा इन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि, यम, वरुण, कुबेर, सिद्धों, विद्याधरों, नागराज, यक्षों, दानवों तथा किन्नरोंके द्वारा देवदुन्दुभियोंकी ध्वनिसे स्तुत होता हुआ क्रमशः भूः, भुवः, स्वः, महः, जन, तप तथा सत्य लोकोंको लाँघकर अपने तेजसे प्रकाशित होता हुआ लिङ्गस्थापन आदि सन्मार्गमें निहित स्वाधीन खड्गसे शीघ्र ही ब्रह्माण्डका भेदन करके निःशंक भावसे मुक्त हो जाता है॥ १९—२५॥ | | शैलजं रत्नजं वापि धातुजं वापि दारुजम्।<br>मृन्मयं क्षणिकं त्यक्त्वा स्थापयेत्सकलं वपुः॥ २६<br><br>विधिना चैव कृत्वा तु स्कन्दोमासहितं शुभम्।<br>कुन्दगोक्षीरसङ्काशं लिङ्गं यः स्थापयेन्नरः॥ २७<br><br>नृणां तनुं समास्थाय स्थितो रुद्रो न संशयः।<br>दर्शनात्स्पर्शनात्तस्य लभन्ते निर्वृतिं नराः॥ २८<br><br>तस्य पुण्यं मया वक्तुं सम्यग्युगशतैरपि।<br>शक्यते नैव विप्रेन्द्रास्तस्माद्वै स्थापयेत्तथा॥ २९<br><br>सर्वेषामेव मर्त्यानां विभोर्दिव्यं वपुः शुभम्।<br>सकलं भावनायोग्यं योगिनामेव निष्कलम्॥ ३० | पाषाणनिर्मित, रत्ननिर्मित, धातुनिर्मित, काष्ठनिर्मित, पार्थिव अथवा क्षणिक लिङ्गकी अपेक्षा चन्द्रकलादिसहित बाणलिङ्ग आदिकी स्थापना करनी चाहिये। विधिपूर्वक लिङ्ग बनाकर जो मनुष्य कार्तिकेय-पार्वतीसहित कुन्द पुष्प तथा गायके दूधके समान वर्णवाले शुभ लिङ्गको स्थापित करता है, वह मानव-शरीर धारण करके भी रुद्रके रूपमें स्थित रहता है; इसमें सन्देह नहीं है। उसके दर्शन तथा स्पर्शसे [अन्य] मनुष्य मुक्ति प्राप्त करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! मैं उसके पुण्यका सम्यक् वर्णन सैकड़ों युगोंमें भी नहीं कर सकता हूँ, अतः विधिपूर्वक लिङ्गको स्थापित करना चाहिये। सभी मनुष्योंके लिये प्रभुका सकल (सगुण), दिव्य तथा शुभ विग्रह भावनाके योग्य है, किंतु योगियोंके लिये निष्कल (निर्गुण) विग्रह भावनाके योग्य है॥ २६—३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवलिङ्गभेदसंस्थापनादिवर्णनं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवलिङ्गभेदसंस्थापनादिवर्णन' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७४॥