श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| लिङ्गकी, नील आदि रुद्रोंने भस्वनिर्मित शुद्ध तथा शुभ लिङ्गकी भक्तिपूर्वक पूजा की॥ ६-७॥ | |
| लक्ष्मीवृक्षमयं लक्ष्मीर्गुहो वै गोमयात्मकम्।<br>मुनयो मुनिशार्दूलाः कुशाग्रमयमुत्तमम्॥ ८<br><br>वामाद्याः पुष्पलिङ्गं तु गन्धलिङ्गं मनोन्मनी।<br>सरस्वती च रत्नेन कृतं रुद्रस्य वाम्भसा॥ ९<br><br>दुर्गा हैमं महादेवं सवेदिकमनुत्तमम्।<br>उग्रा पिष्टमयं सर्वे मन्त्रा ह्याज्यमयं शुभम्॥ १०<br><br>वेदाः सर्वे दधिमयं पिशाचाः सीसनिर्मितम्।<br>लेभिरे च यथायोग्यं प्रसादाद् ब्रह्मणः पदम्॥ ११<br><br>बहुनात्र किमुक्तेन चराचरमिदं जगत्।<br>शिवलिङ्गं समभ्यर्च्य स्थितमत्र न संशयः॥ १२ | हे श्रेष्ठ मुनियो! लक्ष्मीने लक्ष्मीवृक्ष (बेल)-से निर्मित लिङ्गकी, गुहने गोमयसे निर्मित लिङ्गकी, मुनियोंने कुशके अग्रभागसे निर्मित उत्तम लिङ्गकी, वामदेव आदिने पुष्पके लिङ्गकी, मनोन्मनीने गन्धोंसे निर्मित लिङ्गकी और सरस्वतीने रत्न अथवा रुद्रके जलसे निर्मित लिङ्गकी पूजा की। दुर्गाने वेदीसहित सुवर्णनिर्मित अत्युत्तम शिवलिङ्गकी, उग्रोंने आटेसे बने हुए लिङ्गकी, सभी मन्त्रोंने घृतनिर्मित शुभ लिङ्गकी, सभी वेदोंने दधिनिर्मित लिङ्गकी एवं पिशाचोंने सीसनिर्मित लिङ्गकी पूजा की। इन सभीने [पूजा करके] ब्रह्माजीकी कृपासे यथायोग्य पद प्राप्त किया, इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? शिवलिङ्गकी पूजा करनेसे ही यह चराचर जगत् स्थित है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ८-१२॥ |
| षड्विधं लिङ्गमित्याहुर्द्रव्याणां च प्रभेदतः।<br>तेषां भेदाश्चतुर्युक्तचत्वारिंशदिति स्मृताः॥ १३<br><br>शैलजं प्रथमं प्रोक्तं तद्वि साक्षाच्चतुर्विधम्।<br>द्वितीयं रत्नजं तच्च सप्तधा मुनिसत्तमाः॥ १४<br><br>तृतीयं धातुजं लिङ्गमष्टधा परमेष्ठिनः।<br>तुरीयं दारुजं लिङ्गं तत्तु षोडशधोच्यते॥ १५<br><br>मृन्मयं पञ्चमं लिङ्गं द्विधा भिन्नं द्विजोत्तमाः।<br>षष्ठं तु क्षणिकं लिङ्गं सप्तधा परिकीर्तितम्॥ १६ | द्रव्योंके भेदसे छः प्रकारका लिङ्ग कहा गया है। उनके कुल चौवालीस भेद कहे गये हैं। प्रथम प्रकारका लिङ्ग पाषाणनिर्मित कहा गया है; वह चार प्रकारका होता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! द्वितीय प्रकारका लिङ्ग रत्ननिर्मित होता है; वह सात प्रकारका होता है। शिवजीका तीसरे प्रकारका लिङ्ग धातुनिर्मित होता है; वह आठ प्रकारका होता है। चौथे प्रकारका लिङ्ग लकड़ीसे बना होता है; वह सोलह प्रकारका कहा जाता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! पाँचवें प्रकारका लिङ्ग मिट्टीसे बना होता है; वह दो विभागोंवाला होता है। छठे प्रकारका लिङ्ग क्षणिक (रंगवल्लीनिर्मित) होता है; वह सात प्रकारका कहा गया है॥ १३-१६॥ |
| श्रीप्रदं रत्नजं लिङ्गं शैलजं सर्वसिद्धिदम्।<br>धातुजं धनदं साक्षाद्दारुजं भोगसिद्धिदम्॥ १७<br><br>मृन्मयं चैव विप्रेन्द्राः सर्वसिद्धिकरं शुभम्।<br>शैलजं चोत्तमं प्रोक्तं मध्यमं चैव धातुजम्॥ १८ | रत्ननिर्मित लिङ्ग श्री (लक्ष्मी) प्रदान करनेवाला, पाषाणनिर्मित लिङ्ग समस्त सिद्धियोंको देनेवाला, धातुनिर्मित लिङ्ग साक्षात् धन प्रदान करनेवाला तथा काष्ठनिर्मित लिङ्ग भोग-सिद्धि प्रदान करनेवाला है। हे श्रेष्ठ विप्रो! मिट्टीसे बना हुआ (पार्थिव) शुभ लिङ्ग सभी सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला है। पाषाणनिर्मित लिङ्ग उत्तम तथा धातुनिर्मित लिङ्ग मध्यम कहा गया है॥ १७-१८॥ |