श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७४ ] ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण...स्थापनाका माहात्म्य ३६३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| यजेदेकं विरूपाक्षं न पापैः स प्रलिप्यते।<br>शैलं लिङ्गं मदीयं हि सर्वदेवनमस्कृतम्॥ २७ | जगत्को जलाकर भी जो एकमात्र विरूपाक्ष [शिव]-की पूजा करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता है, मेरे द्वारा पूजित यह शिलामय लिङ्ग सभी देवताओंके द्वारा नमस्कृत है॥ २२-२७॥ |
| इत्युक्त्वा पूर्वमभ्यर्च्य रुद्रं त्रिभुवनेश्वरम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्देवदेवं त्र्यम्बकम्॥ २८<br><br>तदाप्रभृति शक्राद्याः पूजयामासुरीश्वरम्।<br>साक्षात्पाशुपतं कृत्वा भस्मोद्धूलितविग्रहाः॥ २९ | ऐसा कहकर पहले ब्रह्माजीने तीनों लोकोंके स्वामी, देवोंके भी देव तथा तीन नेत्रोंवाले रुद्रकी पूजा करके प्रिय वचनोंसे [उनकी] स्तुति की। उसी समयसे इन्द्रादि [देवता] शरीरमें भस्म पोतकर पाशुपतव्रत करके साक्षात् महेश्वरकी पूजा करने लगे॥ २८-२९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधिर्नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधि' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७३॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण करके देवताओंको प्रदान करना एवं देवताओंद्वारा उन-उन लिङ्गोंका पूजन, लिङ्गोंके विविध भेद तथा उनकी स्थापनाका माहात्म्य
| संस्कृत | हिन्दी |
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| सूत उवाच<br>लिङ्गानि कल्पयित्वैवं स्वाधिकारानुरूपतः।<br>विश्वकर्मा ददौ तेषां नियोगाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ १ | सूतजी बोले—विश्वकर्माने प्रभु ब्रह्माकी आज्ञासे अपने अधिकारके अनुरूप लिङ्गोंका निर्माण करके उन [देवताओं]-को दिया॥ १॥ |
| इन्द्रनीलमयं लिङ्गं विष्णुना पूजितं सदा।<br>पद्मरागमयं शक्रो हैमं विश्रवसः सुतः॥ २<br><br>विश्वेदेवास्तथा रौप्यं वसवः कान्तिकं शुभम्।<br>आरकूटमयं वायुराश्विनौ पार्थिवं सदा॥ ३ | विष्णुने इन्द्रनील (नीलकान्तमणि)-से निर्मित लिङ्गकी सदा पूजा की। इन्द्रने पद्मरागनिर्मित लिङ्गकी, विश्रवाके पुत्र कुबेरने सुवर्णनिर्मित लिङ्गकी, विश्वेदेवोंने चाँदीसे बने हुए लिङ्गकी, वसुओंने चन्द्रकान्तमणिसे बने हुए सुन्दर लिङ्गकी, वायुने आरकूट (पीतल)-से बने हुए लिङ्गकी तथा [दोनों] अश्विनीकुमारोंने मिट्टीसे बने हुए लिङ्गकी सदा पूजा की॥ २-३॥ |
| स्फाटिकं वरुणो राजा आदित्यास्ताम्रनिर्मितम्।<br>मौक्तिकं सोमराड् धीमांस्तथा लिङ्गमनुत्तमम्॥ ४<br><br>अनन्ताद्या महानागाः प्रवालकमयं शुभम्।<br>दैत्या ह्यायोमयं लिङ्गं राक्षसाश्च महात्मनः॥ ५ | राजा वरुणने स्फटिकसे बने हुए लिङ्गकी, आदित्योंने ताँबेसे बने हुए लिङ्गकी, बुद्धिमान् सोमराटने मोतीसे बने हुए अत्युत्तम लिङ्गकी, अनन्त आदि महानागोंने प्रवालनिर्मित शुभ लिङ्गकी और महात्मा दैत्यों तथा राक्षसोंनें लोहेसे बने हुए लिङ्गकी पूजा की॥ ४-५॥ |
| त्रैलोहिकं गुह्यकाश्च सर्वलोहमयं गणाः।<br>चामुण्डा सैकतं साक्षान्मातरश्च द्विजोत्तमाः॥ ६<br><br>दारुजं नैर्ऋतिर्भक्त्या यमो मारकतं शुभम्।<br>नीलाद्याश्च तथा रुद्राः शुद्धं भस्ममयं शुभम्॥ ७ | हे द्विजोत्तमो! गुह्यकोंने तीन प्रकारके लोहेसे निर्मित लिङ्गकी, गणोंने सर्वलोहमय लिङ्गकी और चामुण्डा तथा [सभी] माताओंने बालूसे बने हुए लिङ्गकी पूजा की। नैर्ऋतिने लकड़ीसे बने लिङ्गकी, यमने मरकतसे बने शुभ |