भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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३६२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| ततश्चोङ्कारमुच्चार्य प्राणापानौ नियम्य च।<br>ज्ञानामृतेन सर्वाङ्गान्यापूर्य प्रणवेन च॥ १४<br><br>गुणत्रयं चतुर्थाख्यमहङ्कारं च सुव्रताः।<br>तन्मात्राणि च भूतानि तथा बुद्धीन्द्रियाणि च॥ १५<br><br>कर्मेन्द्रियाणि संशोध्य पुरुषं युगलं तथा।<br>चिदात्मानं तनुं कृत्वा चाग्निर्भस्मेति संस्पृशेत्॥ १६<br><br>वायुर्भस्मेति च व्योम तथाम्भः पृथिवी तथा।<br>त्र्यायुषं त्रिसन्ध्यं च धूलयेद्भसितेन यः॥ १७<br><br>स योगी सर्वतत्त्वज्ञो व्रतं पाशुपतं त्विदम्।<br>भवेन पाशमोक्षार्थं कथितं देवसत्तमाः॥ १८ | पुनः दो प्रणवोंसहित [दो] प्राणायामोंके द्वारा शोधन करके; प्राणायामपरायण होकर ओंकारका न्यास करके; तदनन्तर ओंकारका उच्चारण करके प्राण तथा अपान [वायु]-को नियन्त्रितकर ज्ञानामृतरूपी प्रणवसे सभी अंगोंको आप्लावित मानकर; हे सुव्रतो! तीनों गुणों, चौथा अहंकार, [पाँच] तन्मात्राओं, [पाँच] भूतों, [पाँच] ज्ञानेन्द्रियों, [पाँच] कर्मेन्द्रियोंका शोधन करके; पुनः युगलपुरुषका शोधन करके [अपने] शरीरको चिदात्मस्वरूप मानकर अग्नि भस्म है, वायु भस्म है, व्योम [आकाश] भस्म है, जल भस्म है, पृथ्वी भस्म है—ऐसा कहकर भस्मका स्पर्श करना चाहिये। जो तीनों सन्ध्याओंमें भस्मस्नान करता है, वह योगी तथा सभी तत्त्वोंका ज्ञाता हो जाता है। हे श्रेष्ठ देवताओ! [स्वयं] भगवान् शिवने पाश (बन्धन)-से मुक्तिके लिये इस पाशुपतव्रतको कहा है॥ ९—१८॥ | | एवं पाशुपतं कृत्वा सम्पूज्य परमेश्वरम्।<br>लिङ्गे पुरा मया दृष्टे विष्णुना च महात्मना॥ १९<br><br>पशवो नैव जायन्ते वर्षमात्रेण देवताः।<br>अस्माभिः सर्वकार्याणां देवमभ्यर्च्य यत्नतः॥ २०<br><br>बाह्ये चाभ्यन्तरे चैव मन्ये कर्तव्यमीश्वरम्।<br>प्रतिज्ञा मम विष्णोश्च दिव्यैषा सुरसत्तमाः॥ २१<br><br>मुनीनां च न सन्देहस्तस्मात्सम्पूजयेच्छिवम्। | हे देवताओ! इस प्रकार पाशुपतव्रत करके पूर्वकालमें मेरे तथा महात्मा विष्णुके द्वारा देखे गये लिङ्गमें परमेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके लोग एक वर्षमें पशुत्वसे मुक्त हो जाते हैं। हम लोगोंको सभी कर्मोंके देव महेश्वरकी पूजा यत्नपूर्वक बाह्य तथा आभ्यन्तर विधिसे करनी चाहिए—ऐसा मैं मानता हूँ। हे श्रेष्ठ देवताओ! मेरी, विष्णुकी तथा मुनियोंकी यह दिव्य प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है। अतः शिवका पूजन [अवश्य] करना चाहिये॥ १९—२१ १/२॥ | | सा हानिस्तन्महच्छिद्रं स मोहः सा च मूकता॥ २२<br><br>यत्क्षणं वा मुहूर्तं वा शिवमेकं न चिन्तयेत्।<br>भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः॥ २३ | यदि कोई एक क्षण या एक मुहूर्त भी शिवका चिन्तन नहीं करता, तो वही [उसकी] हानि है, वही दोष है, वही उसका अज्ञान है और वही उसकी मूकता है। | | भवसंस्मरणोद्युक्ता न ते दुःखस्य भाजनम्।<br>भवनानि मनोज्ञानि दिव्यमाभरणं स्त्रियः॥ २४ | जो लोग शिवभक्तिमें संलग्न हैं, अन्तःकरणसे शिवको प्रणाम करनेवाले हैं तथा भगवान् शिवके स्मरणमें लगे हुए हैं, वे दुःखके पात्र नहीं होते हैं। | | धनं वा तुष्टिपर्यन्तं शिवपूजाविधेः फलम्।<br>ये वाञ्छन्ति महाभोगान् राज्यं च त्रिदशालये।<br>तेऽर्चयन्तु सदा कालं लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्॥ २५ | सुन्दर भवन, दिव्य आभूषण, स्त्रियाँ तथा तुष्टिपर्यन्त धन—यह सब शिवपूजाविधिका फल है। जो लोग महाभोगों तथा स्वर्गका राज्य चाहते हैं, वे सभी समयोंमें लिङ्गमूर्ति महेश्वरका अर्चन करें। | | हत्वा भित्त्वा च भूतानि दग्ध्वा सर्वमिदं जगत्॥ २६ | सभी प्राणियोंका वध तथा छेदन करके और इस सम्पूर्ण |

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