श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७३ ] लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा [ ३६१
तिहत्तरवाँ अध्याय
लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>गते महेश्वरे देवे दग्ध्वा च त्रिपुरं क्षणात्।<br>सदस्याह सुरेन्द्राणां भगवान् पद्मसम्भवः॥ १ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] क्षणभरमें त्रिपुरको जलाकर देव महेश्वरके चले जानेपर भगवान् पद्मयोनि (ब्रह्मा)-ने श्रेष्ठ देवताओंकी सभामें [इस प्रकार] कहा—॥ १॥ |
| पितामह उवाच<br>सन्त्यज्य देवदेवेशं लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्।<br>तारपौत्रो महातेजास्तारकस्य सुतो बली॥ २<br>तारकाक्षोऽपि दितिजः कमलाक्षश्च वीर्यवान्।<br>विद्युन्माली च दैत्येशः अन्ये चापि सबान्धवाः॥ ३<br>त्यक्त्वा देवं महादेवं मायया च हरेः प्रभोः।<br>सर्वे विनष्टाः प्रध्वस्ताः स्वपुरैः पुरसम्भवैः॥ ४ | **पितामह बोले—**लिङ्गमूर्ति देवदेवेश महेश्वरकी उपेक्षा करके दितिसे उत्पन्न महातेजस्वी तारकपौत्र और तारकका बलवान् पुत्र तारकाक्ष, पराक्रमी कमलाक्ष, दैत्यराज विद्युन्माली तथा अन्य राक्षस भी [अपने] बन्धुओंसहित मारे गये। [इस प्रकार] प्रभु श्रीहरिकी मायासे भगवान् महादेवका त्याग करके वे सब अपने पुरों तथा नागरिकोंसहित विनष्ट तथा ध्वस्त हो गये॥ २–४॥ |
| तस्मात्सदा पूजनीयो लिङ्गमूर्तिः सदाशिवः।<br>यावत्पूजा सुरेशानां तावदेव स्थितिर्र्यतः॥ ५<br>पूजनीयः शिवो नित्यं श्रद्धया देवपुङ्गवैः।<br>सर्वलिङ्गमयो लोकः सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्॥ ६<br>तस्मात् सम्पूजयेल्लिङ्गं य इच्छेत्सिद्धिमात्मनः।<br>सर्वे लिङ्गार्चनादेव देवा दैत्याश्च दानवाः॥ ७ | अतः लिङ्गमूर्ति सदाशिवकी सर्वदा पूजा करनी चाहिये। जबतक उनकी पूजा होगी, तभीतक देवताओंकी स्थिति बनी रहेगी, अतः श्रेष्ठ देवताओंको नित्य श्रद्धापूर्वक शिवका पूजन करना चाहिये। समस्त जगत् लिङ्गमय है, सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतः जो आत्मसिद्धि चाहता है, उसे [शिव] लिङ्गकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ५-६ १/२॥ |
| यक्षा विद्याधराः सिद्धा राक्षसाः पिशिताशनाः।<br>पितरो मुनयश्चापि पिशाचाः किन्नरादयः॥ ८<br>अर्चयित्वा लिङ्गमूर्तिं संसिद्धा नात्र संशयः।<br>तस्माल्लिङ्गं यजेन्नित्यं येन केनापि वा सुराः॥ ९ | सभी देवता, दैत्य तथा दानव लिङ्गार्चनसे ही प्रतिष्ठित हैं। यक्ष, विद्याधर, सिद्धगण, मांसभक्षी राक्षस, पितर, मुनि, पिशाच, किन्नर आदि लिङ्गमूर्तिका अर्चन करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ७-८ १/२॥ |
| पशवश्च वयं तस्य देवदेवस्य धीमतः।<br>पशुत्वं च परित्यज्य कृत्वा पाशुपतं ततः॥ १०<br>पूजनीयो महादेवो लिङ्गमूर्तिः सनातनः।<br>विशोध्य चैव भूतानि पञ्चभिः प्रणवैः समम्॥ ११<br>प्राणायामैः समायुक्तैः पञ्चभिः सुरपुङ्गवाः।<br>चतुर्भिः प्रणवैश्चैव प्राणायामपरायणैः॥ १२<br>त्रिभिश्च प्रणवैर्देवाः प्राणायामैस्तथाविधैः।<br>द्विधा न्यस्य तथोङ्कारं प्राणायामपरायणः॥ १३ | अतः हे देवताओ! जिस किसी भी प्रकारसे नित्य लिङ्गकी पूजा करनी चाहिये। हम लोग उन बुद्धिमान् देवाधिदेवके पशु हैं। अतः पाशुपत व्रत करके पशुत्वका त्याग करके लिङ्गमूर्ति सनातन महादेवकी पूजा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ देवताओ! पाँच प्रणवयुक्त पाँच प्राणायामोंके द्वारा पंचभूतोंका शोधन करके; हे देवताओ! चार प्रणवोंके साथ चार प्राणायामोंद्वारा, पुनः उसी प्रकारके तीन प्रणवोंके साथ [तीन] प्राणायामोंद्वारा, |