भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| जनार्दनोऽपि भगवान्नमस्कृत्य महेश्वरम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्राह साम्बं त्रियम्बकम्॥ १७३<br>वाहनत्वं तवेशान नित्यमीहे प्रसीद मे।<br>त्वयि भक्तिं च देवेश देवदेव नमोऽस्तु ते॥ १७४<br>सामर्थ्यं च सदा मह्यं भवन्तं वोढुमीश्वरम्।<br>सर्वज्ञत्वं च वरद सर्वगत्वं च शङ्कर॥ १७५ | भगवान् विष्णुने भी पार्वतीसहित त्रिनेत्र शिवको प्रणाम करके हाथ जोड़कर उनसे कहा—'हे ईशान! मैं [वृषभ आदि रूपसे] सदा आपका वाहन होनेकी अभिलाषा करता हूँ और हे देवेश! आपमें [अपनी] भक्ति चाहता हूँ। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। हे वरद! हे शंकर! आप ईश्वरको सदा वहन करनेका सामर्थ्य, सर्वज्ञत्व तथा सर्वत्र गमन करनेकी शक्ति मुझे प्रदान कीजिये॥ १७३-१७५॥ | | सूत उवाच<br>तयोः श्रुत्वा महादेवो विज्ञप्तिं परमेश्वरः।<br>सारथ्ये वाहनत्वे च कल्पयामास वै भवः॥ १७६ | सूतजी बोले— उन दोनोंकी प्रार्थना सुनकर महादेव परमेश्वर शिवने उन्हें सारथि तथा वाहन होनेका वर प्रदान किया॥ १७६॥ | | दत्त्वा तस्मै ब्रह्मणे विष्णवे च<br>दग्ध्वा दैत्यान् देवदेवो महात्मा।<br>सार्धं देव्या नन्दिना भूतसङ्घै-<br>रन्तर्धानं कारयामास शर्वः॥ १७७ | इस प्रकार दैत्योंको दग्ध करके और उन ब्रह्मा तथा विष्णुको वर प्रदान करके देवदेव महात्मा शिव देवी [पार्वती], नन्दी तथा भूतगणोंसहित अन्तर्धान हो गये॥ १७७॥ | | ततस्तदा महेश्वरे गते रणाद् गणैः सह।<br>सुरेश्वराः सुविस्मिता भवं प्रणम्य पार्वतीम्॥ १७८<br>ययुश्च दुःखवर्जिताः स्ववाहनैर्दिवं ततः।<br>सुरेश्वरा मुनीश्वरा गणेशवराश्च भास्कराः॥ १७९ | इसके बाद युद्धभूमिसे गणोंसहित शिवके चले जानेपर श्रेष्ठ देवतालोग अतिविस्मित हुए। हे मुनीश्वरो! शिव तथा पार्वतीको प्रणाम करके दुःखरहित होकर सुरेश्वर, गणेश्वर तथा आदित्यगण अपने-अपने वाहनोंसे स्वर्ग चले गये॥ १७८-१७९॥ | | त्रिपुरारेरिमं पुण्यं निर्मितं ब्रह्मणा पुरा।<br>यः पठेच्छ्राद्धकाले वा दैवे कर्मणि च द्विजाः॥ १८०<br>श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या ब्रह्मलोकं स गच्छति।<br>मानसैर्वाचिकैः पापैस्तथा वै कायिकैः पुनः॥ १८१<br>स्थूलैः सूक्ष्मैः सुसूक्ष्मैश्च महापातकसम्भवैः।<br>पातकैश्च द्विजश्रेष्ठा उपपातकसम्भवैः॥ १८२<br>पापैश्च मुच्यते जन्तुः श्रुत्वाध्यायमिमं शुभम्।<br>शत्रवो नाशमायान्ति सङ्ग्रामे विजयी भवेत्॥ १८३<br>सर्वरोगैर्न बाध्येत आपदो न स्पृशन्ति तम्।<br>धनमायुर्यशो विद्यां प्रभावमतुलं लभेत्॥ १८४ | हे द्विजो! जो [व्यक्ति] पूर्वकालमें ब्रह्माके द्वारा निर्मित किये गये त्रिपुरशत्रु [शिव]-के इस पवित्र स्तोत्रको श्राद्धके समय अथवा देवकार्यमें भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है। हे द्विजश्रेष्ठो! इस शुभ अध्यायको सुनकर प्राणी मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक पापोंसे; स्थूल, सूक्ष्म तथा अतिसूक्ष्म पापोंसे; घोर अपराधसे होनेवाले पापोंसे तथा अल्प अपराधसे होनेवाले पापोंसे मुक्त हो जाता है; उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं, वह संग्राममें विजयी होता है, सभी रोग उसे बाधा नहीं पहुँचाते, आपदाएँ उसे स्पर्शतक नहीं करतीं और वह धन-आयु-यश-विद्या तथा अतुलनीय प्रभाव प्राप्त करता है॥ १८०-१८४॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिपुरदाहे ब्रह्मस्तवो नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें त्रिपुरदाहप्रसंगमें 'ब्रह्मस्तव' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७२॥