श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति | ३५९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एकं स्थूलं सूक्ष्ममेकं सुसूक्ष्मं<br>मूर्तामूर्तं मूर्तमेकं ह्यमूर्तम्।<br>एकं दृष्टं वाङ्मयं चैकमीशं<br>ध्येयं चैकं तत्त्वमत्राद्भुतं ते ॥ १६४ | इस ब्रह्माण्डमें आपका एक स्थूल रूप (पृथ्वीरूप), एक सूक्ष्म रूप (जलरूप), एक सुसूक्ष्म रूप (अग्निरूप), मूर्तामूर्त रूप (क्षय-वृद्धिके आश्रयके कारण चन्द्ररूप), एक मूर्तरूप (सूर्यरूप), एक अमूर्तरूप (वायुरूप), एक दृष्ट वाङ्मयरूप (शब्दगुणसे ज्ञात गगनरूप) और एक ध्येय अद्भुत ईशरूप है॥ १६४॥ |
| स्वप्ने दृष्टं यत्पदार्थं ह्यलक्ष्यं<br>दृष्टं नूनं भाति मन्ये न चापि।<br>मूर्त्तिर्नो वै देवमीशानदेवै-<br>र्लक्ष्या यत्नैर्प्यप्यलक्ष्यं कथं तु ॥ १६५ | स्वप्नमें जो पदार्थ दिखायी देता है, वह प्रत्यक्षकी भाँति प्रतीत होता है; उसे मैं अलक्ष्य नहीं मानता हूँ। वैसे ही हे ईशान! देवताओंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक देखा गया आपका विग्रह हमारे लिये निर्गुण तथा अलक्ष्य कैसे हो सकता है?॥ १६५॥ |
| दिव्यः क्व देवेश भवत्प्रभावो<br>वयं क्व भक्तिः क्व च ते स्तुतिश्च।<br>तथापि भक्त्या विलपन्तमीश<br>पितामहं मां भगवन् क्षमस्व ॥ १६६ | हे देवेश! कहाँ आपका दिव्य प्रभाव और कहाँ हमलोग, कहाँ हमारी भक्ति और कहाँ आपकी [यह] स्तुति; फिर भी हे देवेश! हे भगवन्! भक्तिपूर्वक विलाप करते हुए मुझ ब्रह्माको क्षमा कीजिये॥ १६६॥ |
| सूत उवाच<br>य इमं शृणुयाद् द्विजोत्तमा<br>भुवि देवं प्रणिपत्य वा पठेत्।<br>स च मुञ्चति पापबन्धनं<br>भवभक्त्या पुरशासितुः स्तवम्॥ १६७ | सूतजी बोले— हे द्विजश्रेष्ठो! पृथ्वीपर जो भी शिवको प्रणाम करके त्रिपुरके शास्ता भगवान् शिवकी इस स्तुतिको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भवभक्तिके द्वारा पापबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ १६७॥ |
| श्रुत्वा च भक्त्या चतुराननेन<br>स्तुतो हसञ्छैलसुतां निरीक्ष्य।<br>स्तवं तदा प्राह महानुभावं<br>महाभुजो मन्दरशृङ्गवासी॥ १६८ | तब ब्रह्माके द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुत हुए मन्दरशिखरवासी तथा महान् भुजाओंवाले शिवजी उस स्तुतिको सुनकर पार्वतीकी ओर देखकर महानुभाव ब्रह्मासे हँसते हुए कहने लगे— ॥ १६८ ॥ |
| शिव उवाच<br>स्तवेनानेन तुष्टोऽस्मि तव भक्त्या च पद्मज।<br>वरान् वरय भद्रं ते देवानां च यथेप्सितान्॥ १६९ | शिवजी बोले— हे पद्मयोने! भक्तिपूर्वक की गयी आपकी इस स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। आप यथेष्ट वर माँगिये; आपका तथा देवताओंका कल्याण हो॥ १६९॥ |
| सूत उवाच<br>ततः प्रणम्य देवेशं भगवान् पद्मसम्भवः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्राहेदं प्रीतमानसः॥ १७० | सूतजी बोले— तत्पश्चात् पद्मयोनि ब्रह्माजी देवेशको प्रणाम करके हाथ जोड़कर प्रसन्नचित्त होकर यह [वचन] कहने लगे— ॥ १७०॥ |
| श्रीपितामह उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्रिपुरान्तक शङ्कर।<br>त्वयि भक्तिं परां मेऽद्य प्रसीद परमेश्वर॥ १७१<br>देवानां चैव सर्वेषां त्वयि सर्वार्थदेश्वर।<br>प्रसीद भक्तियोगेन सारथ्येन च सर्वदा ॥ १७२ | श्रीपितामह बोले— 'हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्रिपुरविनाशक! हे शंकर! आपमें अपनी परम भक्ति चाहता हूँ। हे परमेश्वर! अब प्रसन्न हो जाइये। सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हे ईश्वर! आपमें सभी देवताओंकी भक्ति हो; मेरे भक्तियोगसे तथा सारथीरूपसे आप सदा प्रसन्न रहें' ॥ १७१-१७२॥ |