भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| कृतो रथश्चेषुवरश्च शुभ्रं<br>शरासनं ते त्रिपुरक्षयाय।<br>अनेकयत्नैश्च मयाथ तुभ्यं<br>फलं न दृष्टं सुरसिद्धसङ्घैः॥ १५५ | आपके द्वारा त्रिपुरके नाशके लिये मैंने अनेक यत्नोंसे रथ, श्रेष्ठ बाण तथा सुन्दर धनुष आपके लिये निर्मित किया था; किंतु देवताओं तथा सिद्धजनोंद्वारा युद्धरूपी फलको नहीं जाना जा सका अर्थात् परम महिमावाले आपने क्षणभरमें त्रिपुरका नाश कर दिया॥ १५५॥ | | रथो रथी देववरो हरिश्च<br>रुद्रः स्वयं शक्रपितामहौ च।<br>त्वमेव सर्वे भगवन् कथं तु<br>स्तोष्ये ह्यतोष्यं प्रणिपत्य मूर्ध्ना॥ १५६ | रथ, रथी, देवश्रेष्ठ विष्णु, स्वयं रुद्र, इन्द्र, ब्रह्मा—ये सब आप ही हैं। हे भगवन्! मैं आप अतोष्य (स्तुति न किये जा सकनेवाले)-की स्तुति कैसे करूँ; अतः सिर झुकाकर [केवल] प्रणाम करता हूँ॥ १५६॥ | | अनन्तपादस्त्वमनन्तबाहु-<br>रनन्तमूर्द्धान्तकरः शिवश्च।<br>अनन्तमूर्तिः कथमीदृशं त्वां<br>तोष्ये ह्यतोष्यं कथमीदृशं त्वाम्॥ १५७ | आप अनन्त चरणोंवाले, अनन्त भुजाओंवाले, अनन्त सिरवाले, अनन्त रूपोंवाले, संहार करनेवाले तथा कल्याण करनेवाले हैं—ऐसे प्रभाववाले आपकी स्तुति कैसे करूँ; आप अतोष्यकी स्तुति कैसे करूँ?॥ १५७॥ | | नमो नमः सर्वविदे शिवाय<br>रुद्राय शर्वाय भवाय तुभ्यम्।<br>स्थूलाय सूक्ष्माय सुसूक्ष्मसूक्ष्म-<br>सूक्ष्माय सूक्ष्मार्थविदे विधात्रे॥ १५८ | आप सर्ववेत्ता, शिव, रुद्र, शर्व, भव, स्थूल, सूक्ष्म, अत्यन्त सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, सूक्ष्म अर्थोंको जाननेवाले तथा विधाताको नमस्कार है॥ १५८॥ | | स्रष्ट्रे नमः सर्वसुरासुराणां<br>भर्त्रे च हर्त्रे जगतां विधात्रे।<br>नेत्रे सुराणामसुरेश्वराणां<br>दात्रे प्रशास्त्रे मम सर्वशास्त्रे॥ १५९ | सभी देवताओं तथा असुरोंके स्रष्टा, लोकोंका सृजन-पालन-संहार करनेवाले, देवताओं तथा असुरोंके नायक, सब कुछ देनेवाले और मुझपर तथा सभीपर शासन करनेवालेको नमस्कार है॥ १५९॥ | | वेदान्तवेद्याय सुनिर्मलाय<br>वेदार्थविद्भिः सततं स्तुताय।<br>वेदात्मरूपाय भवाय तुभ्य-<br>मन्ताय मध्याय सुमध्यमाय॥ १६० | वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, परम शुद्ध, वेदार्थके ज्ञाताओंद्वारा निरन्तर स्तुत, वेदके आत्मास्वरूप, भव, अन्त, मध्य तथा सुमध्यम आपको नमस्कार है॥ १६०॥ | | आद्यन्तशून्याय च संस्थिताय<br>तथा त्वशून्याय च लिङ्गिने च।<br>अलिङ्गिने लिङ्गमयाय तुभ्यं<br>लिङ्गाय वेदादिमयाय साक्षात्॥ १६१ | आदि तथा अन्तसे रहित, सर्वत्र विद्यमान, शून्यत्वसे रहित, लिङ्गी, अलिङ्गी, लिङ्गमय, लिङ्गस्वरूप तथा साक्षात् वेदादिमय (प्रणवरूप) आपको नमस्कार है॥ १६१॥ | | रुद्राय मूर्द्धानिकृन्तनाय<br>ममादिदेवस्य च यज्ञमूर्तेः।<br>विध्वान्तभङ्गं मम कर्तुमीश<br>दृष्ट्वैव भूमौ करजाग्रकोट्या॥ १६२ | मेरे भी आदिदेव यज्ञमूर्ति विष्णुके तथा मुझ ब्रह्माके अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये अपराधस्थानमें देखकर [अपने] नाखूनके अग्रभागसे मेरे मस्तकका छेदन करनेवाले हे ईश! आप रुद्रको नमस्कार है॥ १६२॥ | | अहो विचित्रं तव देवदेव<br>विचेष्टितं सर्वसुरासुरेश।<br>देहीव देवैः सह देवकार्यं<br>करिष्यसे निर्गुणरूपतत्त्व॥ १६३ | हे देवदेव! हे समस्त देवताओं तथा असुरोंके ईश! आपका क्रिया-कलाप विचित्र है। हे निर्गुणरूपतत्त्व! आप देवताओंके साथ देहधारीकी भाँति देवोंका कार्य करेंगे॥ १६३॥ |