श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७२] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५७
| एकाक्षाय नमस्तुभ्यमेकरुद्राय ते नमः।<br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं श्रीकण्ठाय शिखण्डिने॥ १४४<br><br>अनन्तासनसंस्थाय अनन्तायान्तकारिणे।<br>विमलाय विशालाय विमलाङ्गाय ते नमः ॥ १४५<br><br>विमलासनसंस्थाय विमलार्थार्थरूपिणे।<br>योगपीठान्तरस्थाय योगिने योगदायिने ॥ १४६<br><br>योगिनां हृदि संस्थाय सदा नीवारशूकवत्।<br>प्रत्याहाराय ते नित्यं प्रत्याहाररताय ते ॥ १४७<br><br>प्रत्याहाररतानां च प्रतिस्थानस्थिताय च।<br>धारणायै नमस्तुभ्यं धारणाभिरताय ते ॥ १४८ | उत्तमको नमस्कार है। आप एकाक्ष (एकमात्र ज्ञानरूपी नेत्रवाले)-को नमस्कार है। आप अद्वितीय रुद्रको नमस्कार है। आप त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डीको नमस्कार है॥ १४३-१४४॥<br><br>अनन्त (शेष)-रूपी आसनपर स्थित, अनन्तरूप, अन्त करनेवाले, विशुद्ध, विशाल तथा स्वच्छ अंगोंवाले आपको नमस्कार है। विमल आसनपर विराजमान, विमल ज्ञानके अर्थस्वरूप, योगपीठके मध्यस्थित योगी, योग प्रदान करनेवाले, नीवार (जंगली धान्य)-के शूक (सूक्ष्म अग्रभाग)-की भाँति योगियोंके हृदयमें सदा स्थित रहनेवाले आपको नमस्कार है। प्रत्याहारस्वरूप, प्रत्याहारमें निरत, प्रत्याहारमें रत लोगोंके हृदयमें विराजमान, धारणास्वरूप तथा धारणामें निरत आपको नमस्कार है॥ १४५-१४८॥ | | धारणाभ्यासयुक्तानां पुरस्तात्संस्थिताय च।<br>ध्यानाय ध्यानरूपाय ध्यानगम्याय ते नमः॥ १४९<br><br>ध्येयाय ध्येयगम्याय ध्येयध्यानाय ते नमः।<br>ध्येयानामपि ध्येयाय नमो ध्येयतमाय ते ॥ १५०<br><br>समाधानाभिगम्याय समाधानाय ते नमः।<br>समाधानरतानां तु निर्विकल्पार्थरूपिणे ॥ १५१ | धारणाके अभ्यासमें लगे हुए लोगोंके सामने [सदा] विराजमान, ध्यान, ध्यानरूप तथा ध्यानगम्य आपको नमस्कार है। ध्येय, ध्येयगम्य, ध्यान करनेयोग्य, ध्यानवाले आपको नमस्कार है। ध्यानयोग्य [ब्रह्मा, विष्णु आदि]-के भी ध्येय तथा सबसे अधिक ध्यानयोग्य आपको नमस्कार है। समाधानके द्वारा प्राप्य, समाधानस्वरूप, समाधान (ध्यान)-में रत लोगोंके लिये निर्विकल्प अर्थस्वरूप आपको नमस्कार है॥ १४९-१५१॥ | | दग्ध्वोद्धृतं सर्वमिदं त्वयाद्य<br>जगत्त्रयं रुद्र पुरत्रयं हि।<br>कः स्तोतुमिच्छेत्कथमीदृशं त्वां<br>स्तोष्ये हि तुष्टाय शिवाय तुभ्यम् ॥ १५२ | हे रुद्र! त्रिपुरको दग्ध करके आपने तीनों लोकोंका उद्धार कर दिया। ऐसे प्रभावशाली आपकी स्तुति करनेका सामर्थ्य कौन रखता है; फिर भी [स्वयं] सन्तुष्ट रहनेवाले आप शिवकी मैं स्तुति करता हूँ॥ १५२ ॥ | | भक्त्या च तुष्ट्याद्भुतदर्शनाच्च<br>मर्त्या अमर्त्या अपि देवदेव।<br>एते गणाः सिद्धगणैः प्रणामं<br>कुर्वन्ति देवेश गणेश तुभ्यम् ॥ १५३ | हे देवदेव! आपकी भक्ति, तुष्टि तथा अद्भुत दर्शनके कारण ये मानव, देवता तथा सिद्धगणोंसहित समस्त गण आपको प्रणाम करते हैं। हे देवेश! हे गणेश! आपको नमस्कार है॥ १५३॥ | | निरीक्षणादेव विभोऽसि दग्धुं<br>पुरत्रयं चैव जगत्त्रयं च।<br>लीलालसेनाम्बिकया क्षणेन<br>दग्धं किलेषुश्च तदाथ मुक्तः ॥ १५४ | हे विभो! आप तो देखनेमात्रसे ही तीनों पुरों तथा तीनों लोकोंको जला देनेमें समर्थ हैं। अम्बिकाके साथ लीलासक्त आपने क्षणभरमें त्रिपुरको जला दिया और [सोम आदिके प्रार्थना करनेपर] उस समय बाणको भी मुक्त कर दिया ॥ १५४॥ |