श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३५६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ओङ्काराय नमस्तुभ्यं चतुर्धा संस्थिताय च।<br>गगनेशाय देवाय स्वर्गेशाय नमो नमः॥ १३२ | बार-बार नमस्कार है। आठ प्रकारके आत्मस्वरूपवाले अर्धमात्रात्मक नादरूपको नमस्कार है। [अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रात्मक नादरूप] चार प्रकारसे स्थित आप ओंकार (प्रणवरूप)-को नमस्कार है। आकाशके स्वामी तथा स्वर्गके स्वामी शिवको बार-बार नमस्कार है॥ १३०-१३२॥ |
| सप्तलोकाय पातालनरकेशाय वै नमः।<br>अष्टक्षेत्राष्टरूपाय परात्परतराय च॥ १३३ | सात लोकस्वरूप, पाताल तथा नरकके स्वामी, [पृथ्वी आदि] आठ क्षेत्रोंके रूपमें आठ स्वरूपोंवाले तथा परात्परतर (सर्वोत्कृष्ट) शिवको नमस्कार है॥ १३३॥ |
| सहस्रशिरसे तुभ्यं सहस्राय च ते नमः।<br>सहस्रपादयुक्ताय शर्वाय परमेष्ठिने॥ १३४<br><br>नवात्मतत्त्वरूपाय नवाष्टात्मात्मशक्तये।<br>पुनरष्टप्रकाशाय तथाष्टाष्टकमूर्तये॥ १३५<br><br>चतुःषष्ट्यात्मतत्त्वाय पुनरष्टविधाय ते।<br>गुणाष्टकवृतायैव गुणिने निर्गुणाय ते॥ १३६ | हजार सिरोंवाले, हजार रूपोंवाले, हजार पैरोंसे युक्त आप शर्व परमेष्ठीको नमस्कार है। [पुरुष, प्रकृति, व्यक्त, अहंकार, नभ, अनिल, ज्योति, आप (जल), पृथ्वी] नौ आत्मतत्त्वमय स्वरूपवाले, सत्रह आत्मशक्तियोंवाले, अष्टप्रकाशस्वरूप (उर आदि स्थानोंमें वर्णोंको अभिव्यंजित करनेवाले), आठ मूर्तियोंवाले, चौंसठ योगिनियोंके प्राणतत्त्वरूप, भव आदि आठ नामोंवाले, आठ गुणोंसे युक्त, [सत्त्व, रज, तम] तीनों गुणोंसे युक्त तथा गुणोंसे शून्य आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १३४-१३६॥ |
| मूलस्थाय नमस्तुभ्यं शाश्वतस्थानवासिने।<br>नाभिमण्डलसंस्थाय हृदि निःस्वनकारिणे॥ १३७<br><br>कन्धरे च स्थितायैव तालुरन्ध्रस्थिताय च।<br>भ्रूमध्ये संस्थितायैव नादमध्ये स्थिताय च॥ १३८<br><br>चन्द्रबिम्बस्थितायैव शिवाय शिवरूपिणे।<br>वह्निसोमर्करूपाय षट्त्रिंशच्छक्तिरूपिणे॥ १३९<br><br>त्रिधा संवृत्य लोकान् वै प्रसुप्तभुजगात्मने।<br>त्रिप्रकारं स्थितायैव त्रेताग्निमयरूपिणे॥ १४०<br><br>सदाशिवाय शान्ताय महेशाय पिनाकिने।<br>सर्वज्ञाय शरण्याय सद्योजाताय वै नमः॥ १४१<br><br>अघोराय नमस्तुभ्यं वामदेवाय ते नमः।<br>तत्पुरुषाय नमोऽस्तु ईशानाय नमो नमः॥ १४२ | मूलाधारचक्रमें विराजमान, शाश्वत स्थानमें निवास करनेवाले, नाभिमण्डलमें स्थित तथा हृदयमें प्राणवायु ध्वनि करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। ग्रीवामें स्थित, तालुछिद्रमें स्थित, भौंहोंके मध्यमें स्थित, नादके मध्यमें स्थित, चन्द्रबिम्बमें स्थित, कल्याणकारी, शिवस्वरूप, अग्नि-चन्द्र-सूर्यरूपवाले, छत्तीस शक्तिरूपवाले, तीन प्रकारके [सत्त्व, रज, तम] गुणोंसे लोकोंको वेष्टितकर सोये हुए सर्परूप [कुण्डलिनीरूप]-वाले, [गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि] तीन रूपसे स्थित त्रेताग्निमय रूपवाले, सदाशिव, शान्तस्वभाववाले, महेश्वर, पिनाकधारी, सब कुछ जाननेवाले तथा शरण देनेवाले सद्योजातको नमस्कार है। आप अघोरको नमस्कार है। आप वामदेवको नमस्कार है। तत्पुरुषको नमस्कार है। ईशानको बार-बार नमस्कार है॥ १३७-१४२॥ |
| नमस्त्रिंशत्प्रकाशाय शान्तातीताय वै नमः।<br>अनन्तेशाय सूक्ष्माय उत्तमाय नमोऽस्तु ते॥ १४३ | तीसों मुहूर्तोंमें सदा प्रकाशमान रहनेवालेको नमस्कार है। शान्तातीतको नमस्कार है। आप अनन्तेश, सूक्ष्म तथा |