श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति | ३५५ |
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| ववन्दिरे नन्दिनमिन्दुभूषणं<br> ववन्दिरे पर्वतराजसम्भवाम्।<br>ववन्दिरे चाद्रिसुतासुतं प्रभुं<br> ववन्दिरे देवगणा महेश्वरम्॥ १२०<br>तुष्टाव हृदये ब्रह्मा देवैः सह समाहितः।<br>विष्णुना च भवं देवं त्रिपुरारातिमीश्वरम्॥ १२१ | प्रणाम करते रहे। देवताओंने इन्दुभूषण नन्दीको प्रणाम किया, पर्वतराजकी पुत्री [पार्वती]-को प्रणाम किया, पार्वतीपुत्र [गणेश]-को प्रणाम किया और प्रभु महेश्वरको प्रणाम किया। इसके बाद ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर देवताओं तथा विष्णुके साथ त्रिपुरशत्रु भगवान् भव ईश्वरकी हृदयसे स्तुति करने लगे॥ ११७-१२१॥ | | श्रीपितामह उवाच<br>प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर।<br>प्रसीद जगतां नाथ प्रसीदानन्ददाव्यय॥ १२२<br>पञ्चास्य रुद्ररुद्राय पञ्चाशत्कोटिमूर्तये।<br>आत्मत्रयोपविष्टाय विद्यातत्त्वाय ते नमः॥ १२३<br>शिवाय शिवतत्त्वाय अघोराय नमो नमः।<br>अघोराष्टकतत्त्वाय द्वादशात्मस्वरूपिणे॥ १२४ | श्रीपितामह बोले— हे देवदेवेश! प्रसन्न हो जाइये। हे परमेश्वर! प्रसन्न हो जाइये। हे जगन्नाथ! प्रसन्न हो जाइये। हे आनन्ददाता! हे अव्यय! हे पंचमुख! प्रसन्न हो जाइये। [यम आदि] रुद्रोंको भी रुलानेवाले, पचास करोड़ मूर्तिवाले, [विश्व-प्राज्ञ-तैजस] तीन रूपोंमें स्थित रहनेवाले तथा विद्याओंमें मुख्य कारणस्वरूप आपको नमस्कार है। शिव, शिवतत्त्व, अघोर, भैरवाष्टकके कारणरूप तथा द्वादश आत्मास्वरूपीको बार-बार नमस्कार है॥ १२२-१२४॥ | | विद्युत्कोटिप्रतीकाशमष्टकाशं सुशोभनम्।<br>रूपमास्थाय लोकेऽस्मिन् संस्थिताय शिवात्मने॥ १२५ | करोड़ों विद्युत्के समान तथा पृथिवी आदिमें प्रकाशमान अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके इस लोकमें विराजमान शिवस्वरूपको नमस्कार है॥ १२५॥ | | अग्निवर्णाय रौद्राय अम्बिकार्धशरीरिणे।<br>धवलश्यामरक्तानां मुक्तिदायामराय च॥ १२६<br>ज्येष्ठाय रुद्ररूपाय सोमाय वरदाय च।<br>त्रिलोकाय त्रिदेवाय वषट्काराय वै नमः॥ १२७ | अग्निके समान वर्णवाले, भयानक, अम्बिकाको अपने आधे शरीरमें धारण करनेवाले (अर्धनारीश्वर), रुद्र-विष्णु-ब्रह्माको मुक्ति देनेवाले, मृत्युरहित, ज्येष्ठ, भयंकर रूपवाले, सोमस्वरूप, वर प्रदान करनेवाले, त्रिलोकस्वरूप, त्रिदेवस्वरूप तथा वषट्कारस्वरूप शिवको नमस्कार है॥ १२६-१२७॥ | | मध्ये गगनरूपाय गगनस्थाय ते नमः।<br>अष्टक्षेत्राष्टरूपाय अष्टतत्त्वाय ते नमः॥ १२८<br>चतुर्धा च चतुर्धा च चतुर्धा संस्थिताय च।<br>पञ्चधा पञ्चधा चैव पञ्चमन्त्रशरीरिणे॥ १२९ | हृदयकमलके मध्य गगनसदृशरूपवाले तथा गगनमें स्थित आपको नमस्कार है। [सूर्य आदि] आठ स्थानोंमें [रुद्र आदि] आठ रूपोंवाले तथा पृथ्वी आदि आठ तत्त्वोंवाले आपको नमस्कार है। चारों वेदरूपसे, चारों आश्रमरूपसे तथा चतुर्व्यूहरूपसे अवस्थित, आकाश आदि पंचभूत प्रकारसे, सद्योजात आदि पाँच रूपसे अवस्थित, सद्योजात आदि पंचमन्त्ररूप शरीरवाले शिवको नमस्कार है॥ १२८-१२९॥ | | चतुःषष्टिप्रकाराय अकाराय नमो नमः।<br>द्वात्रिंशत्तत्त्वरूपाय उकाराय नमो नमः॥ १३०<br>षोडशात्मस्वरूपाय मकाराय नमो नमः।<br>अष्टधात्मस्वरूपाय अर्धमात्रात्मने नमः॥ १३१ | चौंसठ प्रकारके शिक्षोक्त वर्णरूपवाले अकारको बार-बार नमस्कार है। बत्तीस मातृकारूपवाले उकारको बार-बार नमस्कार है। सोलह तत्त्व रूपवाले मकारको |
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