भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 356
३५४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
किं रथेन ध्वजेनेश तव दग्धुं पुरत्रयम्।<br>इषुणा भूतसङ्घैश्च विष्णुना च मया प्रभो ॥ १०८<br>पुष्ययोगे त्वनुप्राप्ते पुरं दग्धुमिहार्हसि।<br>यावन्न यान्ति देवेश वियोगं तावदेव तु ॥ १०९<br>दग्धुमर्हसि शीघ्रं त्वं त्रीण्येतानि पुराणि वै।आप यहाँ अपनी लीलाका त्याग करें। हे ईश! हे प्रभो! तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये आपको रथ, ध्वज, बाण, भूतगणों, विष्णु तथा मुझ [ब्रह्मा]-से क्या प्रयोजन है? पुष्ययोग प्राप्त होनेपर आप कृपा करके त्रिपुरको दग्ध कर दीजिये। हे देवेश! जबतक ये तीनों पुर अलग-अलग न हो जायँ, तबतक आप इन्हें जला दीजिये॥ १०५-१०९ १/२॥
अथ देवो महादेवः सर्वज्ञस्तदवैक्षत ॥ ११०<br><br>पुरत्रयं विरूपाक्षस्तत्क्षणाद्भस्म वै कृतम्।<br>सोमश्च भगवान् विष्णुः कालाग्निर्वायुरेव च ॥ १११<br>शरे व्यवस्थिताः सर्वे देवमूचुः प्रणम्य तम्।<br>दग्धमप्यथ देवेश वीक्षणेन पुरत्रयम् ॥ ११२<br>अस्मद्धितार्थं देवेश शरं मोक्तुमिहार्हसि।तदनन्तर सब कुछ जाननेवाले तथा विरूपाक्ष (त्रिलोचन) भगवान् महादेवने त्रिपुरकी ओर देखा और उसी क्षण उसे भस्म कर दिया। तब उनके बाणमें स्थित चन्द्र, भगवान् विष्णु, कालाग्नि तथा वायु-इन सभीने उन शिवजीको प्रणाम करके कहा-हे देवेश! आपके देखनेमात्रसे त्रिपुर दग्ध हो गया, फिर भी हे देवेश! हमलोगोंके हितके लिये आप बाणको छोड़ दीजिये॥ ११०-११२ १/२॥
अथ सम्मृज्य धनुषो ज्यां हसन् त्रिपुरार्दनः ॥ ११३<br>मुमोच बाणं विप्रेन्द्रा व्याकृष्याकर्णमीश्वरः।<br>तत्क्षणात् त्रिपुरं दग्ध्वा त्रिपुरान्तकरः शरः ॥ ११४<br>देवदेवं समासाद्य नमस्कृत्य व्यवस्थितः।हे विप्रेन्द्रो! इसके बाद धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसे कानतक खींचकर त्रिपुरका नाश करनेवाले शिवने हँसते हुए बाण छोड़ दिया। त्रिपुरका नाश करनेवाला वह बाण उसी क्षण त्रिपुरको जलाकर देवदेवके पास आकर उन्हें प्रणाम करके व्यवस्थित हो गया॥ ११३-११४ १/२॥
रेजे पुरत्रयं दग्धं दैत्यकोटिशतैर्वृतम् ॥ ११५<br>इषुणा तेन कल्पान्ते रुद्रेणेव जगत्त्रयम्।<br>ये पूजयन्ति तत्रापि दैत्या रुद्रं सबान्धवाः ॥ ११६<br>गाणपत्यं तदा शम्भोर्ययुः पूजाविधेर्बलात्।उस बाणके द्वारा सैकड़ों-करोड़ दैत्योंसहित दग्ध किया गया वह त्रिपुर कल्पके अन्तमें रुद्रके द्वारा दग्ध किये गये त्रिलोकके समान प्रतीत हो रहा था। वहाँ [त्रिपुरमें] भी जिन दैत्योंने बान्धवोंके साथ रुद्रका पूजन किया, उन्होंने शम्भुकी पूजाविधिके प्रभावसे गाणपत्य (गणपतिपद) प्राप्त किया॥ ११५-११६ १/२॥
न किञ्चिदब्रुवन् देवाः सेन्द्रोपेन्द्रा गणेश्वराः ॥ ११७<br>भयाद्देवं निरीक्ष्यैव देवीं हिमवतः सुताम्।<br>दृष्ट्वा भीतं तदानीकं देवानां देवपुङ्गवः ॥ ११८<br>किं चेत्याह तदा देवान् प्रणेमुस्तं समन्ततः ॥ ११९इन्द्र-विष्णुसहित सभी देवता तथा गणेश्वर शिव तथा हिमालयपुत्री देवी [पार्वती]-की ओर देखकर भयवश कुछ नहीं बोले। तब देवताओंकी सेनाको भयभीत देखकर देवश्रेष्ठ [शिव]-ने देवताओंसे कहा- 'क्या बात है?' इसपर वे सभी ओरसे उन्हें केवल