भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 355

अध्याय ७२] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दग्धुं समर्थो मनसा क्षणेन<br>चराचरं सर्वमिदं त्रिशूली।<br>किमत्र दग्धुं त्रिपुरं पिनाकी<br>स्वयं गतश्चात्र गणैश्च सार्धम्॥ ९५॥<br><br>रथेन किं चेषुवरेण तस्य<br>गणैश्च किं देवगणैश्च शम्भोः।<br>पुरत्रयं दग्धुमलुप्तशक्तेः<br>किमेतदित्याहुरजेन्द्रमुख्याः ॥ ९६॥<br><br>मन्वाम नूनं भगवान् पिनाकी<br>लीलार्थमेतत्सकलं प्रवृर्तुम्।<br>व्यवस्थितश्चेति तथान्यथा चे-<br>दाडम्बरेणास्य फलं किमन्यत्॥ ९७॥त्रिशूलधारी पिनाकी (शिव) मनसे ही क्षणभरमें इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को दग्ध करनेमें समर्थ हैं, तो फिर वे त्रिपुरको जलानेके लिये गणोंके साथ वहाँ क्यों जा रहे हैं? तीनों पुरोंको जलानेके लिये उन अलुप्त शक्तिवाले शम्भुको रथसे, उत्तम बाणसे, गणोंसे तथा देवताओंसे क्या प्रयोजन है—ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रमुख देवोंने ऐसा कहा। हमलोग तो समझते हैं कि पिनाकधारी भगवान् [शिव]-लीलाके लिये यह सब करनेके लिये प्रवृत्त हैं; अन्यथा [इस] आडम्बरसे इन्हें दूसरा कौन-सा लाभ है?॥ ९५–९७॥
पुरत्रयस्यास्य समीपवर्ती<br>सुरेशवैरैर्नन्दिमुखैश्च नन्दी।<br>गणैर्गणेशस्तु रराज देव्या<br>जगद्रथो मेरुरिवाष्टशृङ्गैः॥ ९८॥इस त्रिपुरके समीपस्थित नन्दी, नन्दिकेश्वर आदि सुरेश्वरोंके साथ, गणेशजी गणोंके साथ तथा मेरुपर्वत आठ शिखरोंके साथ जिस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, उसी प्रकार जगद्रथ (शिव) देवी [पार्वती]-के साथ शोभायमान थे॥ ९८॥
अथ निरीक्ष्य सुरेश्वरमीश्वरं<br>सगणमद्रिसुतासहितं तदा।<br>त्रिपुररङ्गतलोपरि संस्थितः<br>सुरगणोऽनुजगाम स्वयं तथा॥ ९९॥इसके बाद गणों तथा पार्वतीसहित सुरेश्वर शिवको देखकर त्रिपुरके युद्धक्षेत्रमें उपस्थित देवसमूहने स्वयं उनका अनुगमन किया॥ ९९॥
जगत्त्रयं सर्वमिवापरं तत्<br>पुरत्रयं तत्र विभाति सम्यक्।<br>नरेश्वरैश्चैव गणैश्च देवैः<br>सुरेतरैश्च त्रिविधैर्मुनीन्द्राः॥ १००॥हे मुनीश्वरो ! युद्धकालमें तीन प्रकारके दैत्योंसे युक्त वे तीनों पुर राजाओं, [सिद्ध आदि] गणों तथा देवताओंसे युक्त तीनों लोकके समान प्रतीत हो रहे थे॥ १००॥
अथ सज्यं धनुः कृत्वा शर्वः संधाय तं शरम्।<br>युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत्॥ १०१॥इसके बाद धनुषपर डोरी चढ़ाकर उसपर बाण रखकर उसे पाशुपत-अस्त्रसे युक्त करके शिवजीने त्रिपुरका चिन्तन किया॥ १०१॥
तस्मिंस्थिते महादेवे रुद्रे विततकार्मुके।<br>पुराणि तेन कालेन जग्मुरेकत्वमाशु वै॥ १०२॥<br><br>एकीभावं गते चैव त्रिपुरे समुपगते।<br>बभूव तुमलो हर्षो देवतानां महात्मनाम्॥ १०३॥धनुष ताने हुए उन महादेवके खड़े होनेपर उसी समय तीनों पुर शीघ्र ही आपसमें जुड़ गये। तीनों पुरोंके एकमें मिल जानेपर तथा समीपमें आ जानेपर महान् आत्मावाले [इन्द्र आदि] देवताओंको परम हर्ष हुआ॥ १०२-१०३॥
ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तोऽष्टमूर्तिनम्॥ १०४॥तदनन्तर सभी देवगण, सिद्ध तथा महर्षिगण अष्टमूर्ति [शिव]-की स्तुति करते हुए उनकी जय बोलने लगे॥ १०४॥
अथाह भगवान् ब्रह्मा भगनेत्रनिपातनम्।<br>पुष्ययोगेऽपि सम्प्राप्ते लीलावशमुमापतिम्॥ १०५॥<br><br>स्थाने तव महादेव चेष्टेयं परमेश्वर।<br>पूर्वदेवाश्च देवाश्च समास्तव यतः प्रभो॥ १०६॥<br><br>तथापि देवा धर्मिष्ठाः पूर्वदेवाश्च पापिनः।<br>यतस्तस्माज्जगन्नाथ लीलां त्यक्तुमिहार्हसि॥ १०७॥इसके बाद पुष्य नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर भगवान् ब्रह्माने भगके नेत्रका विनाश करनेवाले लीलासक्त उमापतिसे कहा—हे महादेव ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! इस स्थानपर आपकी यह भावना है कि दैत्य तथा देवता आपके लिये समान हैं, फिर भी देवता धर्मनिष्ठ हैं और दैत्य पापी हैं; अतः हे जगन्नाथ!