श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ७२] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दग्धुं समर्थो मनसा क्षणेन<br>चराचरं सर्वमिदं त्रिशूली।<br>किमत्र दग्धुं त्रिपुरं पिनाकी<br>स्वयं गतश्चात्र गणैश्च सार्धम्॥ ९५॥<br><br>रथेन किं चेषुवरेण तस्य<br>गणैश्च किं देवगणैश्च शम्भोः।<br>पुरत्रयं दग्धुमलुप्तशक्तेः<br>किमेतदित्याहुरजेन्द्रमुख्याः ॥ ९६॥<br><br>मन्वाम नूनं भगवान् पिनाकी<br>लीलार्थमेतत्सकलं प्रवृर्तुम्।<br>व्यवस्थितश्चेति तथान्यथा चे-<br>दाडम्बरेणास्य फलं किमन्यत्॥ ९७॥ | त्रिशूलधारी पिनाकी (शिव) मनसे ही क्षणभरमें इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को दग्ध करनेमें समर्थ हैं, तो फिर वे त्रिपुरको जलानेके लिये गणोंके साथ वहाँ क्यों जा रहे हैं? तीनों पुरोंको जलानेके लिये उन अलुप्त शक्तिवाले शम्भुको रथसे, उत्तम बाणसे, गणोंसे तथा देवताओंसे क्या प्रयोजन है—ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रमुख देवोंने ऐसा कहा। हमलोग तो समझते हैं कि पिनाकधारी भगवान् [शिव]-लीलाके लिये यह सब करनेके लिये प्रवृत्त हैं; अन्यथा [इस] आडम्बरसे इन्हें दूसरा कौन-सा लाभ है?॥ ९५–९७॥ |
| पुरत्रयस्यास्य समीपवर्ती<br>सुरेशवैरैर्नन्दिमुखैश्च नन्दी।<br>गणैर्गणेशस्तु रराज देव्या<br>जगद्रथो मेरुरिवाष्टशृङ्गैः॥ ९८॥ | इस त्रिपुरके समीपस्थित नन्दी, नन्दिकेश्वर आदि सुरेश्वरोंके साथ, गणेशजी गणोंके साथ तथा मेरुपर्वत आठ शिखरोंके साथ जिस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, उसी प्रकार जगद्रथ (शिव) देवी [पार्वती]-के साथ शोभायमान थे॥ ९८॥ |
| अथ निरीक्ष्य सुरेश्वरमीश्वरं<br>सगणमद्रिसुतासहितं तदा।<br>त्रिपुररङ्गतलोपरि संस्थितः<br>सुरगणोऽनुजगाम स्वयं तथा॥ ९९॥ | इसके बाद गणों तथा पार्वतीसहित सुरेश्वर शिवको देखकर त्रिपुरके युद्धक्षेत्रमें उपस्थित देवसमूहने स्वयं उनका अनुगमन किया॥ ९९॥ |
| जगत्त्रयं सर्वमिवापरं तत्<br>पुरत्रयं तत्र विभाति सम्यक्।<br>नरेश्वरैश्चैव गणैश्च देवैः<br>सुरेतरैश्च त्रिविधैर्मुनीन्द्राः॥ १००॥ | हे मुनीश्वरो ! युद्धकालमें तीन प्रकारके दैत्योंसे युक्त वे तीनों पुर राजाओं, [सिद्ध आदि] गणों तथा देवताओंसे युक्त तीनों लोकके समान प्रतीत हो रहे थे॥ १००॥ |
| अथ सज्यं धनुः कृत्वा शर्वः संधाय तं शरम्।<br>युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत्॥ १०१॥ | इसके बाद धनुषपर डोरी चढ़ाकर उसपर बाण रखकर उसे पाशुपत-अस्त्रसे युक्त करके शिवजीने त्रिपुरका चिन्तन किया॥ १०१॥ |
| तस्मिंस्थिते महादेवे रुद्रे विततकार्मुके।<br>पुराणि तेन कालेन जग्मुरेकत्वमाशु वै॥ १०२॥<br><br>एकीभावं गते चैव त्रिपुरे समुपगते।<br>बभूव तुमलो हर्षो देवतानां महात्मनाम्॥ १०३॥ | धनुष ताने हुए उन महादेवके खड़े होनेपर उसी समय तीनों पुर शीघ्र ही आपसमें जुड़ गये। तीनों पुरोंके एकमें मिल जानेपर तथा समीपमें आ जानेपर महान् आत्मावाले [इन्द्र आदि] देवताओंको परम हर्ष हुआ॥ १०२-१०३॥ |
| ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तोऽष्टमूर्तिनम्॥ १०४॥ | तदनन्तर सभी देवगण, सिद्ध तथा महर्षिगण अष्टमूर्ति [शिव]-की स्तुति करते हुए उनकी जय बोलने लगे॥ १०४॥ |
| अथाह भगवान् ब्रह्मा भगनेत्रनिपातनम्।<br>पुष्ययोगेऽपि सम्प्राप्ते लीलावशमुमापतिम्॥ १०५॥<br><br>स्थाने तव महादेव चेष्टेयं परमेश्वर।<br>पूर्वदेवाश्च देवाश्च समास्तव यतः प्रभो॥ १०६॥<br><br>तथापि देवा धर्मिष्ठाः पूर्वदेवाश्च पापिनः।<br>यतस्तस्माज्जगन्नाथ लीलां त्यक्तुमिहार्हसि॥ १०७॥ | इसके बाद पुष्य नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर भगवान् ब्रह्माने भगके नेत्रका विनाश करनेवाले लीलासक्त उमापतिसे कहा—हे महादेव ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! इस स्थानपर आपकी यह भावना है कि दैत्य तथा देवता आपके लिये समान हैं, फिर भी देवता धर्मनिष्ठ हैं और दैत्य पापी हैं; अतः हे जगन्नाथ! |
| ३५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| किं रथेन ध्वजेनेश तव दग्धुं पुरत्रयम्।<br>इषुणा भूतसङ्घैश्च विष्णुना च मया प्रभो ॥ १०८<br>पुष्ययोगे त्वनुप्राप्ते पुरं दग्धुमिहार्हसि।<br>यावन्न यान्ति देवेश वियोगं तावदेव तु ॥ १०९<br>दग्धुमर्हसि शीघ्रं त्वं त्रीण्येतानि पुराणि वै। | आप यहाँ अपनी लीलाका त्याग करें। हे ईश! हे प्रभो! तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये आपको रथ, ध्वज, बाण, भूतगणों, विष्णु तथा मुझ [ब्रह्मा]-से क्या प्रयोजन है? पुष्ययोग प्राप्त होनेपर आप कृपा करके त्रिपुरको दग्ध कर दीजिये। हे देवेश! जबतक ये तीनों पुर अलग-अलग न हो जायँ, तबतक आप इन्हें जला दीजिये॥ १०५-१०९ १/२॥ |
| अथ देवो महादेवः सर्वज्ञस्तदवैक्षत ॥ ११०<br><br>पुरत्रयं विरूपाक्षस्तत्क्षणाद्भस्म वै कृतम्।<br>सोमश्च भगवान् विष्णुः कालाग्निर्वायुरेव च ॥ १११<br>शरे व्यवस्थिताः सर्वे देवमूचुः प्रणम्य तम्।<br>दग्धमप्यथ देवेश वीक्षणेन पुरत्रयम् ॥ ११२<br>अस्मद्धितार्थं देवेश शरं मोक्तुमिहार्हसि। | तदनन्तर सब कुछ जाननेवाले तथा विरूपाक्ष (त्रिलोचन) भगवान् महादेवने त्रिपुरकी ओर देखा और उसी क्षण उसे भस्म कर दिया। तब उनके बाणमें स्थित चन्द्र, भगवान् विष्णु, कालाग्नि तथा वायु-इन सभीने उन शिवजीको प्रणाम करके कहा-हे देवेश! आपके देखनेमात्रसे त्रिपुर दग्ध हो गया, फिर भी हे देवेश! हमलोगोंके हितके लिये आप बाणको छोड़ दीजिये॥ ११०-११२ १/२॥ |
| अथ सम्मृज्य धनुषो ज्यां हसन् त्रिपुरार्दनः ॥ ११३<br>मुमोच बाणं विप्रेन्द्रा व्याकृष्याकर्णमीश्वरः।<br>तत्क्षणात् त्रिपुरं दग्ध्वा त्रिपुरान्तकरः शरः ॥ ११४<br>देवदेवं समासाद्य नमस्कृत्य व्यवस्थितः। | हे विप्रेन्द्रो! इसके बाद धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसे कानतक खींचकर त्रिपुरका नाश करनेवाले शिवने हँसते हुए बाण छोड़ दिया। त्रिपुरका नाश करनेवाला वह बाण उसी क्षण त्रिपुरको जलाकर देवदेवके पास आकर उन्हें प्रणाम करके व्यवस्थित हो गया॥ ११३-११४ १/२॥ |
| रेजे पुरत्रयं दग्धं दैत्यकोटिशतैर्वृतम् ॥ ११५<br>इषुणा तेन कल्पान्ते रुद्रेणेव जगत्त्रयम्।<br>ये पूजयन्ति तत्रापि दैत्या रुद्रं सबान्धवाः ॥ ११६<br>गाणपत्यं तदा शम्भोर्ययुः पूजाविधेर्बलात्। | उस बाणके द्वारा सैकड़ों-करोड़ दैत्योंसहित दग्ध किया गया वह त्रिपुर कल्पके अन्तमें रुद्रके द्वारा दग्ध किये गये त्रिलोकके समान प्रतीत हो रहा था। वहाँ [त्रिपुरमें] भी जिन दैत्योंने बान्धवोंके साथ रुद्रका पूजन किया, उन्होंने शम्भुकी पूजाविधिके प्रभावसे गाणपत्य (गणपतिपद) प्राप्त किया॥ ११५-११६ १/२॥ |
| न किञ्चिदब्रुवन् देवाः सेन्द्रोपेन्द्रा गणेश्वराः ॥ ११७<br>भयाद्देवं निरीक्ष्यैव देवीं हिमवतः सुताम्।<br>दृष्ट्वा भीतं तदानीकं देवानां देवपुङ्गवः ॥ ११८<br>किं चेत्याह तदा देवान् प्रणेमुस्तं समन्ततः ॥ ११९ | इन्द्र-विष्णुसहित सभी देवता तथा गणेश्वर शिव तथा हिमालयपुत्री देवी [पार्वती]-की ओर देखकर भयवश कुछ नहीं बोले। तब देवताओंकी सेनाको भयभीत देखकर देवश्रेष्ठ [शिव]-ने देवताओंसे कहा- 'क्या बात है?' इसपर वे सभी ओरसे उन्हें केवल |
| अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति | ३५५ |
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| ववन्दिरे नन्दिनमिन्दुभूषणं<br> ववन्दिरे पर्वतराजसम्भवाम्।<br>ववन्दिरे चाद्रिसुतासुतं प्रभुं<br> ववन्दिरे देवगणा महेश्वरम्॥ १२०<br>तुष्टाव हृदये ब्रह्मा देवैः सह समाहितः।<br>विष्णुना च भवं देवं त्रिपुरारातिमीश्वरम्॥ १२१ | प्रणाम करते रहे। देवताओंने इन्दुभूषण नन्दीको प्रणाम किया, पर्वतराजकी पुत्री [पार्वती]-को प्रणाम किया, पार्वतीपुत्र [गणेश]-को प्रणाम किया और प्रभु महेश्वरको प्रणाम किया। इसके बाद ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर देवताओं तथा विष्णुके साथ त्रिपुरशत्रु भगवान् भव ईश्वरकी हृदयसे स्तुति करने लगे॥ ११७-१२१॥ | | श्रीपितामह उवाच<br>प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर।<br>प्रसीद जगतां नाथ प्रसीदानन्ददाव्यय॥ १२२<br>पञ्चास्य रुद्ररुद्राय पञ्चाशत्कोटिमूर्तये।<br>आत्मत्रयोपविष्टाय विद्यातत्त्वाय ते नमः॥ १२३<br>शिवाय शिवतत्त्वाय अघोराय नमो नमः।<br>अघोराष्टकतत्त्वाय द्वादशात्मस्वरूपिणे॥ १२४ | श्रीपितामह बोले— हे देवदेवेश! प्रसन्न हो जाइये। हे परमेश्वर! प्रसन्न हो जाइये। हे जगन्नाथ! प्रसन्न हो जाइये। हे आनन्ददाता! हे अव्यय! हे पंचमुख! प्रसन्न हो जाइये। [यम आदि] रुद्रोंको भी रुलानेवाले, पचास करोड़ मूर्तिवाले, [विश्व-प्राज्ञ-तैजस] तीन रूपोंमें स्थित रहनेवाले तथा विद्याओंमें मुख्य कारणस्वरूप आपको नमस्कार है। शिव, शिवतत्त्व, अघोर, भैरवाष्टकके कारणरूप तथा द्वादश आत्मास्वरूपीको बार-बार नमस्कार है॥ १२२-१२४॥ | | विद्युत्कोटिप्रतीकाशमष्टकाशं सुशोभनम्।<br>रूपमास्थाय लोकेऽस्मिन् संस्थिताय शिवात्मने॥ १२५ | करोड़ों विद्युत्के समान तथा पृथिवी आदिमें प्रकाशमान अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके इस लोकमें विराजमान शिवस्वरूपको नमस्कार है॥ १२५॥ | | अग्निवर्णाय रौद्राय अम्बिकार्धशरीरिणे।<br>धवलश्यामरक्तानां मुक्तिदायामराय च॥ १२६<br>ज्येष्ठाय रुद्ररूपाय सोमाय वरदाय च।<br>त्रिलोकाय त्रिदेवाय वषट्काराय वै नमः॥ १२७ | अग्निके समान वर्णवाले, भयानक, अम्बिकाको अपने आधे शरीरमें धारण करनेवाले (अर्धनारीश्वर), रुद्र-विष्णु-ब्रह्माको मुक्ति देनेवाले, मृत्युरहित, ज्येष्ठ, भयंकर रूपवाले, सोमस्वरूप, वर प्रदान करनेवाले, त्रिलोकस्वरूप, त्रिदेवस्वरूप तथा वषट्कारस्वरूप शिवको नमस्कार है॥ १२६-१२७॥ | | मध्ये गगनरूपाय गगनस्थाय ते नमः।<br>अष्टक्षेत्राष्टरूपाय अष्टतत्त्वाय ते नमः॥ १२८<br>चतुर्धा च चतुर्धा च चतुर्धा संस्थिताय च।<br>पञ्चधा पञ्चधा चैव पञ्चमन्त्रशरीरिणे॥ १२९ | हृदयकमलके मध्य गगनसदृशरूपवाले तथा गगनमें स्थित आपको नमस्कार है। [सूर्य आदि] आठ स्थानोंमें [रुद्र आदि] आठ रूपोंवाले तथा पृथ्वी आदि आठ तत्त्वोंवाले आपको नमस्कार है। चारों वेदरूपसे, चारों आश्रमरूपसे तथा चतुर्व्यूहरूपसे अवस्थित, आकाश आदि पंचभूत प्रकारसे, सद्योजात आदि पाँच रूपसे अवस्थित, सद्योजात आदि पंचमन्त्ररूप शरीरवाले शिवको नमस्कार है॥ १२८-१२९॥ | | चतुःषष्टिप्रकाराय अकाराय नमो नमः।<br>द्वात्रिंशत्तत्त्वरूपाय उकाराय नमो नमः॥ १३०<br>षोडशात्मस्वरूपाय मकाराय नमो नमः।<br>अष्टधात्मस्वरूपाय अर्धमात्रात्मने नमः॥ १३१ | चौंसठ प्रकारके शिक्षोक्त वर्णरूपवाले अकारको बार-बार नमस्कार है। बत्तीस मातृकारूपवाले उकारको बार-बार नमस्कार है। सोलह तत्त्व रूपवाले मकारको |
1985 Lingamahapuran_Section_13_2_Front
३५६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ओङ्काराय नमस्तुभ्यं चतुर्धा संस्थिताय च।<br>गगनेशाय देवाय स्वर्गेशाय नमो नमः॥ १३२ | बार-बार नमस्कार है। आठ प्रकारके आत्मस्वरूपवाले अर्धमात्रात्मक नादरूपको नमस्कार है। [अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रात्मक नादरूप] चार प्रकारसे स्थित आप ओंकार (प्रणवरूप)-को नमस्कार है। आकाशके स्वामी तथा स्वर्गके स्वामी शिवको बार-बार नमस्कार है॥ १३०-१३२॥ |
| सप्तलोकाय पातालनरकेशाय वै नमः।<br>अष्टक्षेत्राष्टरूपाय परात्परतराय च॥ १३३ | सात लोकस्वरूप, पाताल तथा नरकके स्वामी, [पृथ्वी आदि] आठ क्षेत्रोंके रूपमें आठ स्वरूपोंवाले तथा परात्परतर (सर्वोत्कृष्ट) शिवको नमस्कार है॥ १३३॥ |
| सहस्रशिरसे तुभ्यं सहस्राय च ते नमः।<br>सहस्रपादयुक्ताय शर्वाय परमेष्ठिने॥ १३४<br><br>नवात्मतत्त्वरूपाय नवाष्टात्मात्मशक्तये।<br>पुनरष्टप्रकाशाय तथाष्टाष्टकमूर्तये॥ १३५<br><br>चतुःषष्ट्यात्मतत्त्वाय पुनरष्टविधाय ते।<br>गुणाष्टकवृतायैव गुणिने निर्गुणाय ते॥ १३६ | हजार सिरोंवाले, हजार रूपोंवाले, हजार पैरोंसे युक्त आप शर्व परमेष्ठीको नमस्कार है। [पुरुष, प्रकृति, व्यक्त, अहंकार, नभ, अनिल, ज्योति, आप (जल), पृथ्वी] नौ आत्मतत्त्वमय स्वरूपवाले, सत्रह आत्मशक्तियोंवाले, अष्टप्रकाशस्वरूप (उर आदि स्थानोंमें वर्णोंको अभिव्यंजित करनेवाले), आठ मूर्तियोंवाले, चौंसठ योगिनियोंके प्राणतत्त्वरूप, भव आदि आठ नामोंवाले, आठ गुणोंसे युक्त, [सत्त्व, रज, तम] तीनों गुणोंसे युक्त तथा गुणोंसे शून्य आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १३४-१३६॥ |
| मूलस्थाय नमस्तुभ्यं शाश्वतस्थानवासिने।<br>नाभिमण्डलसंस्थाय हृदि निःस्वनकारिणे॥ १३७<br><br>कन्धरे च स्थितायैव तालुरन्ध्रस्थिताय च।<br>भ्रूमध्ये संस्थितायैव नादमध्ये स्थिताय च॥ १३८<br><br>चन्द्रबिम्बस्थितायैव शिवाय शिवरूपिणे।<br>वह्निसोमर्करूपाय षट्त्रिंशच्छक्तिरूपिणे॥ १३९<br><br>त्रिधा संवृत्य लोकान् वै प्रसुप्तभुजगात्मने।<br>त्रिप्रकारं स्थितायैव त्रेताग्निमयरूपिणे॥ १४०<br><br>सदाशिवाय शान्ताय महेशाय पिनाकिने।<br>सर्वज्ञाय शरण्याय सद्योजाताय वै नमः॥ १४१<br><br>अघोराय नमस्तुभ्यं वामदेवाय ते नमः।<br>तत्पुरुषाय नमोऽस्तु ईशानाय नमो नमः॥ १४२ | मूलाधारचक्रमें विराजमान, शाश्वत स्थानमें निवास करनेवाले, नाभिमण्डलमें स्थित तथा हृदयमें प्राणवायु ध्वनि करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। ग्रीवामें स्थित, तालुछिद्रमें स्थित, भौंहोंके मध्यमें स्थित, नादके मध्यमें स्थित, चन्द्रबिम्बमें स्थित, कल्याणकारी, शिवस्वरूप, अग्नि-चन्द्र-सूर्यरूपवाले, छत्तीस शक्तिरूपवाले, तीन प्रकारके [सत्त्व, रज, तम] गुणोंसे लोकोंको वेष्टितकर सोये हुए सर्परूप [कुण्डलिनीरूप]-वाले, [गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि] तीन रूपसे स्थित त्रेताग्निमय रूपवाले, सदाशिव, शान्तस्वभाववाले, महेश्वर, पिनाकधारी, सब कुछ जाननेवाले तथा शरण देनेवाले सद्योजातको नमस्कार है। आप अघोरको नमस्कार है। आप वामदेवको नमस्कार है। तत्पुरुषको नमस्कार है। ईशानको बार-बार नमस्कार है॥ १३७-१४२॥ |
| नमस्त्रिंशत्प्रकाशाय शान्तातीताय वै नमः।<br>अनन्तेशाय सूक्ष्माय उत्तमाय नमोऽस्तु ते॥ १४३ | तीसों मुहूर्तोंमें सदा प्रकाशमान रहनेवालेको नमस्कार है। शान्तातीतको नमस्कार है। आप अनन्तेश, सूक्ष्म तथा |
अध्याय ७२] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५७
| एकाक्षाय नमस्तुभ्यमेकरुद्राय ते नमः।<br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं श्रीकण्ठाय शिखण्डिने॥ १४४<br><br>अनन्तासनसंस्थाय अनन्तायान्तकारिणे।<br>विमलाय विशालाय विमलाङ्गाय ते नमः ॥ १४५<br><br>विमलासनसंस्थाय विमलार्थार्थरूपिणे।<br>योगपीठान्तरस्थाय योगिने योगदायिने ॥ १४६<br><br>योगिनां हृदि संस्थाय सदा नीवारशूकवत्।<br>प्रत्याहाराय ते नित्यं प्रत्याहाररताय ते ॥ १४७<br><br>प्रत्याहाररतानां च प्रतिस्थानस्थिताय च।<br>धारणायै नमस्तुभ्यं धारणाभिरताय ते ॥ १४८ | उत्तमको नमस्कार है। आप एकाक्ष (एकमात्र ज्ञानरूपी नेत्रवाले)-को नमस्कार है। आप अद्वितीय रुद्रको नमस्कार है। आप त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डीको नमस्कार है॥ १४३-१४४॥<br><br>अनन्त (शेष)-रूपी आसनपर स्थित, अनन्तरूप, अन्त करनेवाले, विशुद्ध, विशाल तथा स्वच्छ अंगोंवाले आपको नमस्कार है। विमल आसनपर विराजमान, विमल ज्ञानके अर्थस्वरूप, योगपीठके मध्यस्थित योगी, योग प्रदान करनेवाले, नीवार (जंगली धान्य)-के शूक (सूक्ष्म अग्रभाग)-की भाँति योगियोंके हृदयमें सदा स्थित रहनेवाले आपको नमस्कार है। प्रत्याहारस्वरूप, प्रत्याहारमें निरत, प्रत्याहारमें रत लोगोंके हृदयमें विराजमान, धारणास्वरूप तथा धारणामें निरत आपको नमस्कार है॥ १४५-१४८॥ | | धारणाभ्यासयुक्तानां पुरस्तात्संस्थिताय च।<br>ध्यानाय ध्यानरूपाय ध्यानगम्याय ते नमः॥ १४९<br><br>ध्येयाय ध्येयगम्याय ध्येयध्यानाय ते नमः।<br>ध्येयानामपि ध्येयाय नमो ध्येयतमाय ते ॥ १५०<br><br>समाधानाभिगम्याय समाधानाय ते नमः।<br>समाधानरतानां तु निर्विकल्पार्थरूपिणे ॥ १५१ | धारणाके अभ्यासमें लगे हुए लोगोंके सामने [सदा] विराजमान, ध्यान, ध्यानरूप तथा ध्यानगम्य आपको नमस्कार है। ध्येय, ध्येयगम्य, ध्यान करनेयोग्य, ध्यानवाले आपको नमस्कार है। ध्यानयोग्य [ब्रह्मा, विष्णु आदि]-के भी ध्येय तथा सबसे अधिक ध्यानयोग्य आपको नमस्कार है। समाधानके द्वारा प्राप्य, समाधानस्वरूप, समाधान (ध्यान)-में रत लोगोंके लिये निर्विकल्प अर्थस्वरूप आपको नमस्कार है॥ १४९-१५१॥ | | दग्ध्वोद्धृतं सर्वमिदं त्वयाद्य<br>जगत्त्रयं रुद्र पुरत्रयं हि।<br>कः स्तोतुमिच्छेत्कथमीदृशं त्वां<br>स्तोष्ये हि तुष्टाय शिवाय तुभ्यम् ॥ १५२ | हे रुद्र! त्रिपुरको दग्ध करके आपने तीनों लोकोंका उद्धार कर दिया। ऐसे प्रभावशाली आपकी स्तुति करनेका सामर्थ्य कौन रखता है; फिर भी [स्वयं] सन्तुष्ट रहनेवाले आप शिवकी मैं स्तुति करता हूँ॥ १५२ ॥ | | भक्त्या च तुष्ट्याद्भुतदर्शनाच्च<br>मर्त्या अमर्त्या अपि देवदेव।<br>एते गणाः सिद्धगणैः प्रणामं<br>कुर्वन्ति देवेश गणेश तुभ्यम् ॥ १५३ | हे देवदेव! आपकी भक्ति, तुष्टि तथा अद्भुत दर्शनके कारण ये मानव, देवता तथा सिद्धगणोंसहित समस्त गण आपको प्रणाम करते हैं। हे देवेश! हे गणेश! आपको नमस्कार है॥ १५३॥ | | निरीक्षणादेव विभोऽसि दग्धुं<br>पुरत्रयं चैव जगत्त्रयं च।<br>लीलालसेनाम्बिकया क्षणेन<br>दग्धं किलेषुश्च तदाथ मुक्तः ॥ १५४ | हे विभो! आप तो देखनेमात्रसे ही तीनों पुरों तथा तीनों लोकोंको जला देनेमें समर्थ हैं। अम्बिकाके साथ लीलासक्त आपने क्षणभरमें त्रिपुरको जला दिया और [सोम आदिके प्रार्थना करनेपर] उस समय बाणको भी मुक्त कर दिया ॥ १५४॥ |
| ३५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| कृतो रथश्चेषुवरश्च शुभ्रं<br>शरासनं ते त्रिपुरक्षयाय।<br>अनेकयत्नैश्च मयाथ तुभ्यं<br>फलं न दृष्टं सुरसिद्धसङ्घैः॥ १५५ | आपके द्वारा त्रिपुरके नाशके लिये मैंने अनेक यत्नोंसे रथ, श्रेष्ठ बाण तथा सुन्दर धनुष आपके लिये निर्मित किया था; किंतु देवताओं तथा सिद्धजनोंद्वारा युद्धरूपी फलको नहीं जाना जा सका अर्थात् परम महिमावाले आपने क्षणभरमें त्रिपुरका नाश कर दिया॥ १५५॥ | | रथो रथी देववरो हरिश्च<br>रुद्रः स्वयं शक्रपितामहौ च।<br>त्वमेव सर्वे भगवन् कथं तु<br>स्तोष्ये ह्यतोष्यं प्रणिपत्य मूर्ध्ना॥ १५६ | रथ, रथी, देवश्रेष्ठ विष्णु, स्वयं रुद्र, इन्द्र, ब्रह्मा—ये सब आप ही हैं। हे भगवन्! मैं आप अतोष्य (स्तुति न किये जा सकनेवाले)-की स्तुति कैसे करूँ; अतः सिर झुकाकर [केवल] प्रणाम करता हूँ॥ १५६॥ | | अनन्तपादस्त्वमनन्तबाहु-<br>रनन्तमूर्द्धान्तकरः शिवश्च।<br>अनन्तमूर्तिः कथमीदृशं त्वां<br>तोष्ये ह्यतोष्यं कथमीदृशं त्वाम्॥ १५७ | आप अनन्त चरणोंवाले, अनन्त भुजाओंवाले, अनन्त सिरवाले, अनन्त रूपोंवाले, संहार करनेवाले तथा कल्याण करनेवाले हैं—ऐसे प्रभाववाले आपकी स्तुति कैसे करूँ; आप अतोष्यकी स्तुति कैसे करूँ?॥ १५७॥ | | नमो नमः सर्वविदे शिवाय<br>रुद्राय शर्वाय भवाय तुभ्यम्।<br>स्थूलाय सूक्ष्माय सुसूक्ष्मसूक्ष्म-<br>सूक्ष्माय सूक्ष्मार्थविदे विधात्रे॥ १५८ | आप सर्ववेत्ता, शिव, रुद्र, शर्व, भव, स्थूल, सूक्ष्म, अत्यन्त सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, सूक्ष्म अर्थोंको जाननेवाले तथा विधाताको नमस्कार है॥ १५८॥ | | स्रष्ट्रे नमः सर्वसुरासुराणां<br>भर्त्रे च हर्त्रे जगतां विधात्रे।<br>नेत्रे सुराणामसुरेश्वराणां<br>दात्रे प्रशास्त्रे मम सर्वशास्त्रे॥ १५९ | सभी देवताओं तथा असुरोंके स्रष्टा, लोकोंका सृजन-पालन-संहार करनेवाले, देवताओं तथा असुरोंके नायक, सब कुछ देनेवाले और मुझपर तथा सभीपर शासन करनेवालेको नमस्कार है॥ १५९॥ | | वेदान्तवेद्याय सुनिर्मलाय<br>वेदार्थविद्भिः सततं स्तुताय।<br>वेदात्मरूपाय भवाय तुभ्य-<br>मन्ताय मध्याय सुमध्यमाय॥ १६० | वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, परम शुद्ध, वेदार्थके ज्ञाताओंद्वारा निरन्तर स्तुत, वेदके आत्मास्वरूप, भव, अन्त, मध्य तथा सुमध्यम आपको नमस्कार है॥ १६०॥ | | आद्यन्तशून्याय च संस्थिताय<br>तथा त्वशून्याय च लिङ्गिने च।<br>अलिङ्गिने लिङ्गमयाय तुभ्यं<br>लिङ्गाय वेदादिमयाय साक्षात्॥ १६१ | आदि तथा अन्तसे रहित, सर्वत्र विद्यमान, शून्यत्वसे रहित, लिङ्गी, अलिङ्गी, लिङ्गमय, लिङ्गस्वरूप तथा साक्षात् वेदादिमय (प्रणवरूप) आपको नमस्कार है॥ १६१॥ | | रुद्राय मूर्द्धानिकृन्तनाय<br>ममादिदेवस्य च यज्ञमूर्तेः।<br>विध्वान्तभङ्गं मम कर्तुमीश<br>दृष्ट्वैव भूमौ करजाग्रकोट्या॥ १६२ | मेरे भी आदिदेव यज्ञमूर्ति विष्णुके तथा मुझ ब्रह्माके अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये अपराधस्थानमें देखकर [अपने] नाखूनके अग्रभागसे मेरे मस्तकका छेदन करनेवाले हे ईश! आप रुद्रको नमस्कार है॥ १६२॥ | | अहो विचित्रं तव देवदेव<br>विचेष्टितं सर्वसुरासुरेश।<br>देहीव देवैः सह देवकार्यं<br>करिष्यसे निर्गुणरूपतत्त्व॥ १६३ | हे देवदेव! हे समस्त देवताओं तथा असुरोंके ईश! आपका क्रिया-कलाप विचित्र है। हे निर्गुणरूपतत्त्व! आप देवताओंके साथ देहधारीकी भाँति देवोंका कार्य करेंगे॥ १६३॥ |
| अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति | ३५९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकं स्थूलं सूक्ष्ममेकं सुसूक्ष्मं<br>मूर्तामूर्तं मूर्तमेकं ह्यमूर्तम्।<br>एकं दृष्टं वाङ्मयं चैकमीशं<br>ध्येयं चैकं तत्त्वमत्राद्भुतं ते ॥ १६४ | इस ब्रह्माण्डमें आपका एक स्थूल रूप (पृथ्वीरूप), एक सूक्ष्म रूप (जलरूप), एक सुसूक्ष्म रूप (अग्निरूप), मूर्तामूर्त रूप (क्षय-वृद्धिके आश्रयके कारण चन्द्ररूप), एक मूर्तरूप (सूर्यरूप), एक अमूर्तरूप (वायुरूप), एक दृष्ट वाङ्मयरूप (शब्दगुणसे ज्ञात गगनरूप) और एक ध्येय अद्भुत ईशरूप है॥ १६४॥ |
| स्वप्ने दृष्टं यत्पदार्थं ह्यलक्ष्यं<br>दृष्टं नूनं भाति मन्ये न चापि।<br>मूर्त्तिर्नो वै देवमीशानदेवै-<br>र्लक्ष्या यत्नैर्प्यप्यलक्ष्यं कथं तु ॥ १६५ | स्वप्नमें जो पदार्थ दिखायी देता है, वह प्रत्यक्षकी भाँति प्रतीत होता है; उसे मैं अलक्ष्य नहीं मानता हूँ। वैसे ही हे ईशान! देवताओंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक देखा गया आपका विग्रह हमारे लिये निर्गुण तथा अलक्ष्य कैसे हो सकता है?॥ १६५॥ |
| दिव्यः क्व देवेश भवत्प्रभावो<br>वयं क्व भक्तिः क्व च ते स्तुतिश्च।<br>तथापि भक्त्या विलपन्तमीश<br>पितामहं मां भगवन् क्षमस्व ॥ १६६ | हे देवेश! कहाँ आपका दिव्य प्रभाव और कहाँ हमलोग, कहाँ हमारी भक्ति और कहाँ आपकी [यह] स्तुति; फिर भी हे देवेश! हे भगवन्! भक्तिपूर्वक विलाप करते हुए मुझ ब्रह्माको क्षमा कीजिये॥ १६६॥ |
| सूत उवाच<br>य इमं शृणुयाद् द्विजोत्तमा<br>भुवि देवं प्रणिपत्य वा पठेत्।<br>स च मुञ्चति पापबन्धनं<br>भवभक्त्या पुरशासितुः स्तवम्॥ १६७ | सूतजी बोले— हे द्विजश्रेष्ठो! पृथ्वीपर जो भी शिवको प्रणाम करके त्रिपुरके शास्ता भगवान् शिवकी इस स्तुतिको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भवभक्तिके द्वारा पापबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ १६७॥ |
| श्रुत्वा च भक्त्या चतुराननेन<br>स्तुतो हसञ्छैलसुतां निरीक्ष्य।<br>स्तवं तदा प्राह महानुभावं<br>महाभुजो मन्दरशृङ्गवासी॥ १६८ | तब ब्रह्माके द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुत हुए मन्दरशिखरवासी तथा महान् भुजाओंवाले शिवजी उस स्तुतिको सुनकर पार्वतीकी ओर देखकर महानुभाव ब्रह्मासे हँसते हुए कहने लगे— ॥ १६८ ॥ |
| शिव उवाच<br>स्तवेनानेन तुष्टोऽस्मि तव भक्त्या च पद्मज।<br>वरान् वरय भद्रं ते देवानां च यथेप्सितान्॥ १६९ | शिवजी बोले— हे पद्मयोने! भक्तिपूर्वक की गयी आपकी इस स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। आप यथेष्ट वर माँगिये; आपका तथा देवताओंका कल्याण हो॥ १६९॥ |
| सूत उवाच<br>ततः प्रणम्य देवेशं भगवान् पद्मसम्भवः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्राहेदं प्रीतमानसः॥ १७० | सूतजी बोले— तत्पश्चात् पद्मयोनि ब्रह्माजी देवेशको प्रणाम करके हाथ जोड़कर प्रसन्नचित्त होकर यह [वचन] कहने लगे— ॥ १७०॥ |
| श्रीपितामह उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्रिपुरान्तक शङ्कर।<br>त्वयि भक्तिं परां मेऽद्य प्रसीद परमेश्वर॥ १७१<br>देवानां चैव सर्वेषां त्वयि सर्वार्थदेश्वर।<br>प्रसीद भक्तियोगेन सारथ्येन च सर्वदा ॥ १७२ | श्रीपितामह बोले— 'हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्रिपुरविनाशक! हे शंकर! आपमें अपनी परम भक्ति चाहता हूँ। हे परमेश्वर! अब प्रसन्न हो जाइये। सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हे ईश्वर! आपमें सभी देवताओंकी भक्ति हो; मेरे भक्तियोगसे तथा सारथीरूपसे आप सदा प्रसन्न रहें' ॥ १७१-१७२॥ |
| ३६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| जनार्दनोऽपि भगवान्नमस्कृत्य महेश्वरम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्राह साम्बं त्रियम्बकम्॥ १७३<br>वाहनत्वं तवेशान नित्यमीहे प्रसीद मे।<br>त्वयि भक्तिं च देवेश देवदेव नमोऽस्तु ते॥ १७४<br>सामर्थ्यं च सदा मह्यं भवन्तं वोढुमीश्वरम्।<br>सर्वज्ञत्वं च वरद सर्वगत्वं च शङ्कर॥ १७५ | भगवान् विष्णुने भी पार्वतीसहित त्रिनेत्र शिवको प्रणाम करके हाथ जोड़कर उनसे कहा—'हे ईशान! मैं [वृषभ आदि रूपसे] सदा आपका वाहन होनेकी अभिलाषा करता हूँ और हे देवेश! आपमें [अपनी] भक्ति चाहता हूँ। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। हे वरद! हे शंकर! आप ईश्वरको सदा वहन करनेका सामर्थ्य, सर्वज्ञत्व तथा सर्वत्र गमन करनेकी शक्ति मुझे प्रदान कीजिये॥ १७३-१७५॥ | | सूत उवाच<br>तयोः श्रुत्वा महादेवो विज्ञप्तिं परमेश्वरः।<br>सारथ्ये वाहनत्वे च कल्पयामास वै भवः॥ १७६ | सूतजी बोले— उन दोनोंकी प्रार्थना सुनकर महादेव परमेश्वर शिवने उन्हें सारथि तथा वाहन होनेका वर प्रदान किया॥ १७६॥ | | दत्त्वा तस्मै ब्रह्मणे विष्णवे च<br>दग्ध्वा दैत्यान् देवदेवो महात्मा।<br>सार्धं देव्या नन्दिना भूतसङ्घै-<br>रन्तर्धानं कारयामास शर्वः॥ १७७ | इस प्रकार दैत्योंको दग्ध करके और उन ब्रह्मा तथा विष्णुको वर प्रदान करके देवदेव महात्मा शिव देवी [पार्वती], नन्दी तथा भूतगणोंसहित अन्तर्धान हो गये॥ १७७॥ | | ततस्तदा महेश्वरे गते रणाद् गणैः सह।<br>सुरेश्वराः सुविस्मिता भवं प्रणम्य पार्वतीम्॥ १७८<br>ययुश्च दुःखवर्जिताः स्ववाहनैर्दिवं ततः।<br>सुरेश्वरा मुनीश्वरा गणेशवराश्च भास्कराः॥ १७९ | इसके बाद युद्धभूमिसे गणोंसहित शिवके चले जानेपर श्रेष्ठ देवतालोग अतिविस्मित हुए। हे मुनीश्वरो! शिव तथा पार्वतीको प्रणाम करके दुःखरहित होकर सुरेश्वर, गणेश्वर तथा आदित्यगण अपने-अपने वाहनोंसे स्वर्ग चले गये॥ १७८-१७९॥ | | त्रिपुरारेरिमं पुण्यं निर्मितं ब्रह्मणा पुरा।<br>यः पठेच्छ्राद्धकाले वा दैवे कर्मणि च द्विजाः॥ १८०<br>श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या ब्रह्मलोकं स गच्छति।<br>मानसैर्वाचिकैः पापैस्तथा वै कायिकैः पुनः॥ १८१<br>स्थूलैः सूक्ष्मैः सुसूक्ष्मैश्च महापातकसम्भवैः।<br>पातकैश्च द्विजश्रेष्ठा उपपातकसम्भवैः॥ १८२<br>पापैश्च मुच्यते जन्तुः श्रुत्वाध्यायमिमं शुभम्।<br>शत्रवो नाशमायान्ति सङ्ग्रामे विजयी भवेत्॥ १८३<br>सर्वरोगैर्न बाध्येत आपदो न स्पृशन्ति तम्।<br>धनमायुर्यशो विद्यां प्रभावमतुलं लभेत्॥ १८४ | हे द्विजो! जो [व्यक्ति] पूर्वकालमें ब्रह्माके द्वारा निर्मित किये गये त्रिपुरशत्रु [शिव]-के इस पवित्र स्तोत्रको श्राद्धके समय अथवा देवकार्यमें भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है। हे द्विजश्रेष्ठो! इस शुभ अध्यायको सुनकर प्राणी मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक पापोंसे; स्थूल, सूक्ष्म तथा अतिसूक्ष्म पापोंसे; घोर अपराधसे होनेवाले पापोंसे तथा अल्प अपराधसे होनेवाले पापोंसे मुक्त हो जाता है; उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं, वह संग्राममें विजयी होता है, सभी रोग उसे बाधा नहीं पहुँचाते, आपदाएँ उसे स्पर्शतक नहीं करतीं और वह धन-आयु-यश-विद्या तथा अतुलनीय प्रभाव प्राप्त करता है॥ १८०-१८४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिपुरदाहे ब्रह्मस्तवो नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें त्रिपुरदाहप्रसंगमें 'ब्रह्मस्तव' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७२॥
७३- लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा
अध्याय ७३ ] लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा [ ३६१
तिहत्तरवाँ अध्याय
लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>गते महेश्वरे देवे दग्ध्वा च त्रिपुरं क्षणात्।<br>सदस्याह सुरेन्द्राणां भगवान् पद्मसम्भवः॥ १ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] क्षणभरमें त्रिपुरको जलाकर देव महेश्वरके चले जानेपर भगवान् पद्मयोनि (ब्रह्मा)-ने श्रेष्ठ देवताओंकी सभामें [इस प्रकार] कहा—॥ १॥ |
| पितामह उवाच<br>सन्त्यज्य देवदेवेशं लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्।<br>तारपौत्रो महातेजास्तारकस्य सुतो बली॥ २<br>तारकाक्षोऽपि दितिजः कमलाक्षश्च वीर्यवान्।<br>विद्युन्माली च दैत्येशः अन्ये चापि सबान्धवाः॥ ३<br>त्यक्त्वा देवं महादेवं मायया च हरेः प्रभोः।<br>सर्वे विनष्टाः प्रध्वस्ताः स्वपुरैः पुरसम्भवैः॥ ४ | **पितामह बोले—**लिङ्गमूर्ति देवदेवेश महेश्वरकी उपेक्षा करके दितिसे उत्पन्न महातेजस्वी तारकपौत्र और तारकका बलवान् पुत्र तारकाक्ष, पराक्रमी कमलाक्ष, दैत्यराज विद्युन्माली तथा अन्य राक्षस भी [अपने] बन्धुओंसहित मारे गये। [इस प्रकार] प्रभु श्रीहरिकी मायासे भगवान् महादेवका त्याग करके वे सब अपने पुरों तथा नागरिकोंसहित विनष्ट तथा ध्वस्त हो गये॥ २–४॥ |
| तस्मात्सदा पूजनीयो लिङ्गमूर्तिः सदाशिवः।<br>यावत्पूजा सुरेशानां तावदेव स्थितिर्र्यतः॥ ५<br>पूजनीयः शिवो नित्यं श्रद्धया देवपुङ्गवैः।<br>सर्वलिङ्गमयो लोकः सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्॥ ६<br>तस्मात् सम्पूजयेल्लिङ्गं य इच्छेत्सिद्धिमात्मनः।<br>सर्वे लिङ्गार्चनादेव देवा दैत्याश्च दानवाः॥ ७ | अतः लिङ्गमूर्ति सदाशिवकी सर्वदा पूजा करनी चाहिये। जबतक उनकी पूजा होगी, तभीतक देवताओंकी स्थिति बनी रहेगी, अतः श्रेष्ठ देवताओंको नित्य श्रद्धापूर्वक शिवका पूजन करना चाहिये। समस्त जगत् लिङ्गमय है, सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतः जो आत्मसिद्धि चाहता है, उसे [शिव] लिङ्गकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ५-६ १/२॥ |
| यक्षा विद्याधराः सिद्धा राक्षसाः पिशिताशनाः।<br>पितरो मुनयश्चापि पिशाचाः किन्नरादयः॥ ८<br>अर्चयित्वा लिङ्गमूर्तिं संसिद्धा नात्र संशयः।<br>तस्माल्लिङ्गं यजेन्नित्यं येन केनापि वा सुराः॥ ९ | सभी देवता, दैत्य तथा दानव लिङ्गार्चनसे ही प्रतिष्ठित हैं। यक्ष, विद्याधर, सिद्धगण, मांसभक्षी राक्षस, पितर, मुनि, पिशाच, किन्नर आदि लिङ्गमूर्तिका अर्चन करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ७-८ १/२॥ |
| पशवश्च वयं तस्य देवदेवस्य धीमतः।<br>पशुत्वं च परित्यज्य कृत्वा पाशुपतं ततः॥ १०<br>पूजनीयो महादेवो लिङ्गमूर्तिः सनातनः।<br>विशोध्य चैव भूतानि पञ्चभिः प्रणवैः समम्॥ ११<br>प्राणायामैः समायुक्तैः पञ्चभिः सुरपुङ्गवाः।<br>चतुर्भिः प्रणवैश्चैव प्राणायामपरायणैः॥ १२<br>त्रिभिश्च प्रणवैर्देवाः प्राणायामैस्तथाविधैः।<br>द्विधा न्यस्य तथोङ्कारं प्राणायामपरायणः॥ १३ | अतः हे देवताओ! जिस किसी भी प्रकारसे नित्य लिङ्गकी पूजा करनी चाहिये। हम लोग उन बुद्धिमान् देवाधिदेवके पशु हैं। अतः पाशुपत व्रत करके पशुत्वका त्याग करके लिङ्गमूर्ति सनातन महादेवकी पूजा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ देवताओ! पाँच प्रणवयुक्त पाँच प्राणायामोंके द्वारा पंचभूतोंका शोधन करके; हे देवताओ! चार प्रणवोंके साथ चार प्राणायामोंद्वारा, पुनः उसी प्रकारके तीन प्रणवोंके साथ [तीन] प्राणायामोंद्वारा, |
| ३६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ततश्चोङ्कारमुच्चार्य प्राणापानौ नियम्य च।<br>ज्ञानामृतेन सर्वाङ्गान्यापूर्य प्रणवेन च॥ १४<br><br>गुणत्रयं चतुर्थाख्यमहङ्कारं च सुव्रताः।<br>तन्मात्राणि च भूतानि तथा बुद्धीन्द्रियाणि च॥ १५<br><br>कर्मेन्द्रियाणि संशोध्य पुरुषं युगलं तथा।<br>चिदात्मानं तनुं कृत्वा चाग्निर्भस्मेति संस्पृशेत्॥ १६<br><br>वायुर्भस्मेति च व्योम तथाम्भः पृथिवी तथा।<br>त्र्यायुषं त्रिसन्ध्यं च धूलयेद्भसितेन यः॥ १७<br><br>स योगी सर्वतत्त्वज्ञो व्रतं पाशुपतं त्विदम्।<br>भवेन पाशमोक्षार्थं कथितं देवसत्तमाः॥ १८ | पुनः दो प्रणवोंसहित [दो] प्राणायामोंके द्वारा शोधन करके; प्राणायामपरायण होकर ओंकारका न्यास करके; तदनन्तर ओंकारका उच्चारण करके प्राण तथा अपान [वायु]-को नियन्त्रितकर ज्ञानामृतरूपी प्रणवसे सभी अंगोंको आप्लावित मानकर; हे सुव्रतो! तीनों गुणों, चौथा अहंकार, [पाँच] तन्मात्राओं, [पाँच] भूतों, [पाँच] ज्ञानेन्द्रियों, [पाँच] कर्मेन्द्रियोंका शोधन करके; पुनः युगलपुरुषका शोधन करके [अपने] शरीरको चिदात्मस्वरूप मानकर अग्नि भस्म है, वायु भस्म है, व्योम [आकाश] भस्म है, जल भस्म है, पृथ्वी भस्म है—ऐसा कहकर भस्मका स्पर्श करना चाहिये। जो तीनों सन्ध्याओंमें भस्मस्नान करता है, वह योगी तथा सभी तत्त्वोंका ज्ञाता हो जाता है। हे श्रेष्ठ देवताओ! [स्वयं] भगवान् शिवने पाश (बन्धन)-से मुक्तिके लिये इस पाशुपतव्रतको कहा है॥ ९—१८॥ | | एवं पाशुपतं कृत्वा सम्पूज्य परमेश्वरम्।<br>लिङ्गे पुरा मया दृष्टे विष्णुना च महात्मना॥ १९<br><br>पशवो नैव जायन्ते वर्षमात्रेण देवताः।<br>अस्माभिः सर्वकार्याणां देवमभ्यर्च्य यत्नतः॥ २०<br><br>बाह्ये चाभ्यन्तरे चैव मन्ये कर्तव्यमीश्वरम्।<br>प्रतिज्ञा मम विष्णोश्च दिव्यैषा सुरसत्तमाः॥ २१<br><br>मुनीनां च न सन्देहस्तस्मात्सम्पूजयेच्छिवम्। | हे देवताओ! इस प्रकार पाशुपतव्रत करके पूर्वकालमें मेरे तथा महात्मा विष्णुके द्वारा देखे गये लिङ्गमें परमेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके लोग एक वर्षमें पशुत्वसे मुक्त हो जाते हैं। हम लोगोंको सभी कर्मोंके देव महेश्वरकी पूजा यत्नपूर्वक बाह्य तथा आभ्यन्तर विधिसे करनी चाहिए—ऐसा मैं मानता हूँ। हे श्रेष्ठ देवताओ! मेरी, विष्णुकी तथा मुनियोंकी यह दिव्य प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है। अतः शिवका पूजन [अवश्य] करना चाहिये॥ १९—२१ १/२॥ | | सा हानिस्तन्महच्छिद्रं स मोहः सा च मूकता॥ २२<br><br>यत्क्षणं वा मुहूर्तं वा शिवमेकं न चिन्तयेत्।<br>भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः॥ २३ | यदि कोई एक क्षण या एक मुहूर्त भी शिवका चिन्तन नहीं करता, तो वही [उसकी] हानि है, वही दोष है, वही उसका अज्ञान है और वही उसकी मूकता है। | | भवसंस्मरणोद्युक्ता न ते दुःखस्य भाजनम्।<br>भवनानि मनोज्ञानि दिव्यमाभरणं स्त्रियः॥ २४ | जो लोग शिवभक्तिमें संलग्न हैं, अन्तःकरणसे शिवको प्रणाम करनेवाले हैं तथा भगवान् शिवके स्मरणमें लगे हुए हैं, वे दुःखके पात्र नहीं होते हैं। | | धनं वा तुष्टिपर्यन्तं शिवपूजाविधेः फलम्।<br>ये वाञ्छन्ति महाभोगान् राज्यं च त्रिदशालये।<br>तेऽर्चयन्तु सदा कालं लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्॥ २५ | सुन्दर भवन, दिव्य आभूषण, स्त्रियाँ तथा तुष्टिपर्यन्त धन—यह सब शिवपूजाविधिका फल है। जो लोग महाभोगों तथा स्वर्गका राज्य चाहते हैं, वे सभी समयोंमें लिङ्गमूर्ति महेश्वरका अर्चन करें। | | हत्वा भित्त्वा च भूतानि दग्ध्वा सर्वमिदं जगत्॥ २६ | सभी प्राणियोंका वध तथा छेदन करके और इस सम्पूर्ण |
७४- ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण करके देवताओंको प्रदान करना एवं देवताओंद्वारा उन-उन लिङ्गोंका पूजन, लिङ्गोंके विविध भेद तथा उनकी स्थापनाका माहात्म्य
अध्याय ७४ ] ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण...स्थापनाका माहात्म्य ३६३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| यजेदेकं विरूपाक्षं न पापैः स प्रलिप्यते।<br>शैलं लिङ्गं मदीयं हि सर्वदेवनमस्कृतम्॥ २७ | जगत्को जलाकर भी जो एकमात्र विरूपाक्ष [शिव]-की पूजा करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता है, मेरे द्वारा पूजित यह शिलामय लिङ्ग सभी देवताओंके द्वारा नमस्कृत है॥ २२-२७॥ |
| इत्युक्त्वा पूर्वमभ्यर्च्य रुद्रं त्रिभुवनेश्वरम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्देवदेवं त्र्यम्बकम्॥ २८<br><br>तदाप्रभृति शक्राद्याः पूजयामासुरीश्वरम्।<br>साक्षात्पाशुपतं कृत्वा भस्मोद्धूलितविग्रहाः॥ २९ | ऐसा कहकर पहले ब्रह्माजीने तीनों लोकोंके स्वामी, देवोंके भी देव तथा तीन नेत्रोंवाले रुद्रकी पूजा करके प्रिय वचनोंसे [उनकी] स्तुति की। उसी समयसे इन्द्रादि [देवता] शरीरमें भस्म पोतकर पाशुपतव्रत करके साक्षात् महेश्वरकी पूजा करने लगे॥ २८-२९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधिर्नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधि' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७३॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण करके देवताओंको प्रदान करना एवं देवताओंद्वारा उन-उन लिङ्गोंका पूजन, लिङ्गोंके विविध भेद तथा उनकी स्थापनाका माहात्म्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सूत उवाच<br>लिङ्गानि कल्पयित्वैवं स्वाधिकारानुरूपतः।<br>विश्वकर्मा ददौ तेषां नियोगाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ १ | सूतजी बोले—विश्वकर्माने प्रभु ब्रह्माकी आज्ञासे अपने अधिकारके अनुरूप लिङ्गोंका निर्माण करके उन [देवताओं]-को दिया॥ १॥ |
| इन्द्रनीलमयं लिङ्गं विष्णुना पूजितं सदा।<br>पद्मरागमयं शक्रो हैमं विश्रवसः सुतः॥ २<br><br>विश्वेदेवास्तथा रौप्यं वसवः कान्तिकं शुभम्।<br>आरकूटमयं वायुराश्विनौ पार्थिवं सदा॥ ३ | विष्णुने इन्द्रनील (नीलकान्तमणि)-से निर्मित लिङ्गकी सदा पूजा की। इन्द्रने पद्मरागनिर्मित लिङ्गकी, विश्रवाके पुत्र कुबेरने सुवर्णनिर्मित लिङ्गकी, विश्वेदेवोंने चाँदीसे बने हुए लिङ्गकी, वसुओंने चन्द्रकान्तमणिसे बने हुए सुन्दर लिङ्गकी, वायुने आरकूट (पीतल)-से बने हुए लिङ्गकी तथा [दोनों] अश्विनीकुमारोंने मिट्टीसे बने हुए लिङ्गकी सदा पूजा की॥ २-३॥ |
| स्फाटिकं वरुणो राजा आदित्यास्ताम्रनिर्मितम्।<br>मौक्तिकं सोमराड् धीमांस्तथा लिङ्गमनुत्तमम्॥ ४<br><br>अनन्ताद्या महानागाः प्रवालकमयं शुभम्।<br>दैत्या ह्यायोमयं लिङ्गं राक्षसाश्च महात्मनः॥ ५ | राजा वरुणने स्फटिकसे बने हुए लिङ्गकी, आदित्योंने ताँबेसे बने हुए लिङ्गकी, बुद्धिमान् सोमराटने मोतीसे बने हुए अत्युत्तम लिङ्गकी, अनन्त आदि महानागोंने प्रवालनिर्मित शुभ लिङ्गकी और महात्मा दैत्यों तथा राक्षसोंनें लोहेसे बने हुए लिङ्गकी पूजा की॥ ४-५॥ |
| त्रैलोहिकं गुह्यकाश्च सर्वलोहमयं गणाः।<br>चामुण्डा सैकतं साक्षान्मातरश्च द्विजोत्तमाः॥ ६<br><br>दारुजं नैर्ऋतिर्भक्त्या यमो मारकतं शुभम्।<br>नीलाद्याश्च तथा रुद्राः शुद्धं भस्ममयं शुभम्॥ ७ | हे द्विजोत्तमो! गुह्यकोंने तीन प्रकारके लोहेसे निर्मित लिङ्गकी, गणोंने सर्वलोहमय लिङ्गकी और चामुण्डा तथा [सभी] माताओंने बालूसे बने हुए लिङ्गकी पूजा की। नैर्ऋतिने लकड़ीसे बने लिङ्गकी, यमने मरकतसे बने शुभ |
| ३६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लिङ्गकी, नील आदि रुद्रोंने भस्वनिर्मित शुद्ध तथा शुभ लिङ्गकी भक्तिपूर्वक पूजा की॥ ६-७॥ | |
| लक्ष्मीवृक्षमयं लक्ष्मीर्गुहो वै गोमयात्मकम्।<br>मुनयो मुनिशार्दूलाः कुशाग्रमयमुत्तमम्॥ ८<br><br>वामाद्याः पुष्पलिङ्गं तु गन्धलिङ्गं मनोन्मनी।<br>सरस्वती च रत्नेन कृतं रुद्रस्य वाम्भसा॥ ९<br><br>दुर्गा हैमं महादेवं सवेदिकमनुत्तमम्।<br>उग्रा पिष्टमयं सर्वे मन्त्रा ह्याज्यमयं शुभम्॥ १०<br><br>वेदाः सर्वे दधिमयं पिशाचाः सीसनिर्मितम्।<br>लेभिरे च यथायोग्यं प्रसादाद् ब्रह्मणः पदम्॥ ११<br><br>बहुनात्र किमुक्तेन चराचरमिदं जगत्।<br>शिवलिङ्गं समभ्यर्च्य स्थितमत्र न संशयः॥ १२ | हे श्रेष्ठ मुनियो! लक्ष्मीने लक्ष्मीवृक्ष (बेल)-से निर्मित लिङ्गकी, गुहने गोमयसे निर्मित लिङ्गकी, मुनियोंने कुशके अग्रभागसे निर्मित उत्तम लिङ्गकी, वामदेव आदिने पुष्पके लिङ्गकी, मनोन्मनीने गन्धोंसे निर्मित लिङ्गकी और सरस्वतीने रत्न अथवा रुद्रके जलसे निर्मित लिङ्गकी पूजा की। दुर्गाने वेदीसहित सुवर्णनिर्मित अत्युत्तम शिवलिङ्गकी, उग्रोंने आटेसे बने हुए लिङ्गकी, सभी मन्त्रोंने घृतनिर्मित शुभ लिङ्गकी, सभी वेदोंने दधिनिर्मित लिङ्गकी एवं पिशाचोंने सीसनिर्मित लिङ्गकी पूजा की। इन सभीने [पूजा करके] ब्रह्माजीकी कृपासे यथायोग्य पद प्राप्त किया, इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? शिवलिङ्गकी पूजा करनेसे ही यह चराचर जगत् स्थित है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ८-१२॥ |
| षड्विधं लिङ्गमित्याहुर्द्रव्याणां च प्रभेदतः।<br>तेषां भेदाश्चतुर्युक्तचत्वारिंशदिति स्मृताः॥ १३<br><br>शैलजं प्रथमं प्रोक्तं तद्वि साक्षाच्चतुर्विधम्।<br>द्वितीयं रत्नजं तच्च सप्तधा मुनिसत्तमाः॥ १४<br><br>तृतीयं धातुजं लिङ्गमष्टधा परमेष्ठिनः।<br>तुरीयं दारुजं लिङ्गं तत्तु षोडशधोच्यते॥ १५<br><br>मृन्मयं पञ्चमं लिङ्गं द्विधा भिन्नं द्विजोत्तमाः।<br>षष्ठं तु क्षणिकं लिङ्गं सप्तधा परिकीर्तितम्॥ १६ | द्रव्योंके भेदसे छः प्रकारका लिङ्ग कहा गया है। उनके कुल चौवालीस भेद कहे गये हैं। प्रथम प्रकारका लिङ्ग पाषाणनिर्मित कहा गया है; वह चार प्रकारका होता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! द्वितीय प्रकारका लिङ्ग रत्ननिर्मित होता है; वह सात प्रकारका होता है। शिवजीका तीसरे प्रकारका लिङ्ग धातुनिर्मित होता है; वह आठ प्रकारका होता है। चौथे प्रकारका लिङ्ग लकड़ीसे बना होता है; वह सोलह प्रकारका कहा जाता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! पाँचवें प्रकारका लिङ्ग मिट्टीसे बना होता है; वह दो विभागोंवाला होता है। छठे प्रकारका लिङ्ग क्षणिक (रंगवल्लीनिर्मित) होता है; वह सात प्रकारका कहा गया है॥ १३-१६॥ |
| श्रीप्रदं रत्नजं लिङ्गं शैलजं सर्वसिद्धिदम्।<br>धातुजं धनदं साक्षाद्दारुजं भोगसिद्धिदम्॥ १७<br><br>मृन्मयं चैव विप्रेन्द्राः सर्वसिद्धिकरं शुभम्।<br>शैलजं चोत्तमं प्रोक्तं मध्यमं चैव धातुजम्॥ १८ | रत्ननिर्मित लिङ्ग श्री (लक्ष्मी) प्रदान करनेवाला, पाषाणनिर्मित लिङ्ग समस्त सिद्धियोंको देनेवाला, धातुनिर्मित लिङ्ग साक्षात् धन प्रदान करनेवाला तथा काष्ठनिर्मित लिङ्ग भोग-सिद्धि प्रदान करनेवाला है। हे श्रेष्ठ विप्रो! मिट्टीसे बना हुआ (पार्थिव) शुभ लिङ्ग सभी सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला है। पाषाणनिर्मित लिङ्ग उत्तम तथा धातुनिर्मित लिङ्ग मध्यम कहा गया है॥ १७-१८॥ |
अध्याय ७४] ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण...स्थापनाका माहात्म्य ३६५
| बहुधा लिङ्गभेदाश्च नव चैव समासतः।<br>मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः॥ १९<br><br>रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः।<br>लिङ्गवेदी महादेवी त्रिगुणा त्रित्रयाम्बिका॥ २०<br><br>तया च पूजयेद्यस्तु देवी देवश्च पूजितौ।<br>शैलजं रत्नजं वापि धातुजं वापि दारुजम्॥ २१<br><br>मृन्मयं क्षणिकं वापि भक्त्या स्थाप्य फलं शुभम्।<br>सुरेन्द्राम्भोजगर्भार्ग्नियमम्बुपधनेश्वरैः ॥ २२<br><br>सिद्धविद्याधराहीन्द्रैर्यक्षदानवकिन्नरैः ।<br>स्तूयमानः सुपुण्यात्मा देवदुन्दुभिनिःस्वनैः॥ २३<br><br>भूर्भुवःस्वर्महर्लोकान् क्रमाद्वै जनतः परम्।<br>तपः सत्यं पराक्रम्य भासयन् स्वेन तेजसा॥ २४<br><br>लिङ्गस्थापनसन्मार्गनिहितस्वायतासिना ।<br>आशु ब्रह्माण्डमुद्भिद्य निर्गच्छेन्निर्विशङ्कया॥ २५ | लिङ्गोंके बहुत भेद हैं; संक्षेपमें वे नौ हैं। [लिङ्गके] मूलमें ब्रह्मा, मध्यमें तीनों लोकोंके ईश्वर विष्णु तथा ऊपरी भागमें प्रणवसंज्ञक महादेव रुद्र सदाशिव विराजमान रहते हैं। लिङ्गकी वेदी महादेवी अम्बिका हैं; वे [सत्, रज, तम] तीनों गुणोंसे तथा त्रिदेवोंसे युक्त रहती हैं। जो उस [वेदी]-के साथ लिङ्गकी पूजा करता है, उसने मानो महादेव तथा भगवती [पार्वती]-का पूजन कर लिया। पाषाणनिर्मित, रत्ननिर्मित, धातुनिर्मित, काष्ठनिर्मित, पार्थिव अथवा क्षणिक जो भी लिङ्ग हो—उसे भक्तिपूर्वक स्थापित करके [व्यक्ति] शुभ फल प्राप्त करता है। वह परम पुण्यात्मा इन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि, यम, वरुण, कुबेर, सिद्धों, विद्याधरों, नागराज, यक्षों, दानवों तथा किन्नरोंके द्वारा देवदुन्दुभियोंकी ध्वनिसे स्तुत होता हुआ क्रमशः भूः, भुवः, स्वः, महः, जन, तप तथा सत्य लोकोंको लाँघकर अपने तेजसे प्रकाशित होता हुआ लिङ्गस्थापन आदि सन्मार्गमें निहित स्वाधीन खड्गसे शीघ्र ही ब्रह्माण्डका भेदन करके निःशंक भावसे मुक्त हो जाता है॥ १९—२५॥ | | शैलजं रत्नजं वापि धातुजं वापि दारुजम्।<br>मृन्मयं क्षणिकं त्यक्त्वा स्थापयेत्सकलं वपुः॥ २६<br><br>विधिना चैव कृत्वा तु स्कन्दोमासहितं शुभम्।<br>कुन्दगोक्षीरसङ्काशं लिङ्गं यः स्थापयेन्नरः॥ २७<br><br>नृणां तनुं समास्थाय स्थितो रुद्रो न संशयः।<br>दर्शनात्स्पर्शनात्तस्य लभन्ते निर्वृतिं नराः॥ २८<br><br>तस्य पुण्यं मया वक्तुं सम्यग्युगशतैरपि।<br>शक्यते नैव विप्रेन्द्रास्तस्माद्वै स्थापयेत्तथा॥ २९<br><br>सर्वेषामेव मर्त्यानां विभोर्दिव्यं वपुः शुभम्।<br>सकलं भावनायोग्यं योगिनामेव निष्कलम्॥ ३० | पाषाणनिर्मित, रत्ननिर्मित, धातुनिर्मित, काष्ठनिर्मित, पार्थिव अथवा क्षणिक लिङ्गकी अपेक्षा चन्द्रकलादिसहित बाणलिङ्ग आदिकी स्थापना करनी चाहिये। विधिपूर्वक लिङ्ग बनाकर जो मनुष्य कार्तिकेय-पार्वतीसहित कुन्द पुष्प तथा गायके दूधके समान वर्णवाले शुभ लिङ्गको स्थापित करता है, वह मानव-शरीर धारण करके भी रुद्रके रूपमें स्थित रहता है; इसमें सन्देह नहीं है। उसके दर्शन तथा स्पर्शसे [अन्य] मनुष्य मुक्ति प्राप्त करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! मैं उसके पुण्यका सम्यक् वर्णन सैकड़ों युगोंमें भी नहीं कर सकता हूँ, अतः विधिपूर्वक लिङ्गको स्थापित करना चाहिये। सभी मनुष्योंके लिये प्रभुका सकल (सगुण), दिव्य तथा शुभ विग्रह भावनाके योग्य है, किंतु योगियोंके लिये निष्कल (निर्गुण) विग्रह भावनाके योग्य है॥ २६—३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवलिङ्गभेदसंस्थापनादिवर्णनं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवलिङ्गभेदसंस्थापनादिवर्णन' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७४॥
७५- शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण
| ३६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
पचहत्तरवाँ अध्याय
शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण
| ऋषय ऊचुः<br>निष्कलो निर्मलो नित्यः सकलत्वं कथं गतः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथापूर्वं यथाश्रुतम्॥ १ | ऋषिगण बोले— निष्कल (निर्गुण), निर्मल तथा नित्य (शाश्वत) शिव सकलत्व (सगुणता)-को कैसे प्राप्त हुए? [हे सूतजी!] आपने जैसा पहले सुना है, उसे हम लोगोंको बताइये॥ १॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>परमार्थविदः केचिदूचुः प्रणवरूपिणम्।<br>विज्ञानमिति विप्रेन्द्राः श्रुत्वा श्रुतिशिरस्यजम्॥ २<br>शब्दादिविषयं ज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते।<br>तज्ज्ञानं भ्रान्तिरहितमित्यन्ये नेति चापरे॥ ३ | सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ विप्रो! कुछ तत्त्वज्ञोंने उपनिषदोंमें शिवको अजन्मा सुनकर उन्हें प्रणवरूप विज्ञान कहा है। शब्द आदि विषयोंका जो ज्ञान है, उसे 'ज्ञान' कहा जाता है। अन्य लोग कहते हैं कि जो भ्रान्तिरहित ज्ञान है, वही ज्ञान है; दूसरे लोग कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है॥ २-३॥ |
| यज्ज्ञानं निर्मलं शुद्धं निर्विकल्पं निराश्रयम्।<br>गुरुप्रकाशकं ज्ञानमित्यन्ये मुनयो द्विजाः॥ ४ | हे द्विजो! अन्य मुनि लोग कहते हैं कि जो ज्ञान निर्मल, शुद्ध, निर्विकल्प, आश्रयरहित तथा गुरुके द्वारा प्रकाशित है, वह [वास्तविक] ज्ञान है॥ ४॥ |
| ज्ञानेनैव भवेन्मुक्तिः प्रसादो ज्ञानसिद्धये।<br>उभाभ्यां मुच्यते योगी तत्रानन्दमयो भवेत्॥ ५<br>वदन्ति मुनयः केचित्कर्मणा तस्य सङ्गतिम्।<br>कल्पनाकल्पितं रूपं संहृत्य स्वेच्छयैव हि॥ ६ | ज्ञानसे ही मुक्ति प्राप्त होती है; ज्ञानसिद्धिके लिये [ईश्वरकी] प्रसन्नता आवश्यक है। दोनोंके द्वारा योगी मुक्त हो जाता है और वह आनन्दमय हो जाता है। कुछ मुनि स्वेच्छासे मायाविरचित रूपको हृदयमें भावित करके (विचारकर) विधिप्रतिपादित निष्काम कर्मद्वारा उस ज्ञानकी संगतिको बताते हैं॥ ५-६॥ |
| द्यौर्मूर्धा तु विभोस्तस्य खं नाभिः परमेष्ठिनः।<br>सोमसूर्याग्नयो नेत्रं दिशः श्रोत्रं महात्मनः॥ ७<br>चरणौ चैव पातालं समुद्रस्तस्य चाम्बरम्।<br>देवास्तस्य भुजाः सर्वे नक्षत्राणि च भूषणम्॥ ८<br>प्रकृतिस्तस्य पत्नी च पुरुषो लिङ्गमुच्यते।<br>वक्त्राद्वै ब्राह्मणाः सर्वे ब्रह्मा च भगवान् प्रभुः॥ ९<br>इन्द्रोपेन्द्रौ भुजाभ्यां तु क्षत्रियाश्च महात्मनः।<br>वैश्याश्चोरुप्रदेशात्तु शूद्राः पादात्पिनाकिनः॥ १०<br>पुष्करावर्तकाद्यास्तु केशास्तस्य प्रकीर्तिताः।<br>वायवो घ्राणजास्तस्य गतिः श्रौतं स्मृतिस्तथा॥ ११ | द्यौ (स्वर्ग) उन विभुका सिर है, आकाश उन परमेश्वरकी नाभि है, चन्द्र-सूर्य-अग्नि [उनके] नेत्र हैं, दिशाएँ [उन] महात्माके कान हैं, पाताल ही [उनके] दोनों चरण हैं, समुद्र उनका वस्त्र है, सभी देवता उनकी भुजाएँ हैं, [सभी] नक्षत्र [उनके] आभूषण हैं। प्रकृतिको [उनकी] पत्नी तथा पुरुषको [उनका] लिङ्ग कहा जाता है। सभी ब्राह्मण, ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, इन्द्र तथा उपेन्द्र उनके मुखसे; महात्मा क्षत्रिय भुजाओंसे; वैश्य उनके ऊरुप्रदेशसे तथा शूद्र उन पिनाकधारीके पैरसे उत्पन्न हुए हैं। पुष्कर, आवर्त आदि [मेघ] उनके केश कहे गये हैं। सभी वायु उनकी नासिकासे उत्पन्न हुए हैं। श्रुति तथा स्मृतिमें कथित कर्म उनकी गति हैं॥ ७-११॥ |
अध्याय ७५] शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण [३६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथानेनैव कर्मात्मा प्रकृतेस्तु प्रवर्तकः।<br>पुंसां तु पुरुषः श्रीमान् ज्ञानगम्यो न चान्यथा॥ १२<br><br>कर्मयज्ञसहस्त्रेभ्यस्तपोयज्ञो विशिष्यते।<br>तपोयज्ञसहस्रेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते॥ १३<br><br>जपयज्ञसहस्रेभ्यो ध्यानयज्ञो विशिष्यते।<br>ध्यानयज्ञात्परो नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम्॥ १४<br><br>यदा समरसे निष्ठो योगी ध्यानेन पश्यति।<br>ध्यानयज्ञरतस्यास्य तदा सन्निहितः शिवः॥ १५ | इसी [शरीर]-से वे [परमात्मा] कर्मरूप होकर प्रकृतिका प्रवर्तन करते हैं। वे ऐश्वर्यशाली पुरुष (परमात्मा) मनुष्योंके लिये ज्ञानगम्य हैं; इसमें सन्देह नहीं है। तपोयज्ञ हजार कर्मयज्ञोंसे बढ़कर है, जपयज्ञ हजार तपोयज्ञोंसे बढ़कर है और ध्यानयज्ञ हजार जपयज्ञोंसे बढ़कर है। ध्यानयज्ञसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है; ध्यान ज्ञानका साधन है। जब योगी समरसमें स्थित होकर ध्यानके द्वारा देखता है, तब शिव ध्यानयज्ञमें लीन उस [योगी]-को प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं॥ १२-१५॥ |
| नास्ति विज्ञानिनां शौचं प्रायश्चित्तादिचोदना।<br>विशुद्धा विद्यया सर्वे ब्रह्मविद्याविदो जनाः॥ १६<br><br>नास्ति क्रिया च लोकेषु सुखं दुःखं विचारतः।<br>धर्माधर्मौ जपो होमो ध्यानिनां सन्निधिः सदा॥ १७<br><br>परानन्दात्मकं लिङ्गं विशुद्धं शिवमक्षरम्।<br>निष्कल सर्वगं ज्ञेयं योगिनां हृदि संस्थितम्॥ १८ | विज्ञानियोंके लिये शुद्धि, प्रायश्चित्त आदि कर्म आवश्यक नहीं हैं; ब्रह्मविद्याको जाननेवाले सभी लोग [ब्रह्म] विद्यासे पूर्णरूपसे शुद्ध हो जाते हैं। विचारकी दृष्टिसे ध्यानियोंके लिये लोकोंमें क्रिया, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म, जप, होम आदि [आवश्यक] नहीं हैं; उनके लिये शिव-सन्निधि ही मुख्य है। परम आनन्दमय, विशुद्ध, कल्याणकारी, अविनाशी, निष्कल तथा सर्वव्यापी लिङ्गको योगियोंके हृदयमें [सदा] विराजमान जानना चाहिये॥ १६-१८॥ |
| लिङ्गं तु द्विविधं प्राहुर्बाह्यमाभ्यन्तरं द्विजाः।<br>बाह्यं स्थूलं मुनिश्रेष्ठाः सूक्ष्ममाभ्यन्तरं द्विजाः॥ १९ | हे द्विजो! लिङ्ग दो प्रकारका कहा गया है—बाह्य तथा आभ्यन्तर। हे श्रेष्ठ मुनियो! स्थूल [लिङ्ग] बाह्य होता है और सूक्ष्म [लिङ्ग] आभ्यन्तर होता है॥ १९॥ |
| कर्मयज्ञरताः स्थूलाः स्थूललिङ्गार्चने रताः।<br>असतां भावनार्थाय नान्यथा स्थूलविग्रहः॥ २० | कर्मयज्ञमें निरत तथा स्थूलस्वभाववाले स्थूललिङ्गके अर्चनमें संलग्न रहते हैं। अज्ञानी जनोंकी भावनासिद्धिके लिये ही स्थूलविग्रह कल्पित किया गया है; इसमें दूसरा हेतु नहीं है। |
| आध्यात्मिकं च यल्लिङ्गं प्रत्यक्षं यस्य नो भवेत्।<br>असौ मूढो बहिः सर्वं कल्पयित्वैव नान्यथा॥ २१ | जो आध्यात्मिक सूक्ष्मलिङ्ग है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन जिसे नहीं होता है, ऐसा वह अज्ञानी व्यक्ति 'सब कुछ बाहर है'—यह कल्पना करके ही पूजनादिमें प्रवृत्त होता है; इसमें सन्देह नहीं है। |
| ज्ञानिनां सूक्ष्मममलं भवेत्प्रत्यक्षमव्ययम्।<br>यथा स्थूलमयुक्तानां मृत्काष्ठाद्यैः प्रकल्पितम्॥ २२ | जैसे ज्ञानियोंके लिये प्रत्यक्षरूपसे सूक्ष्म, निर्मल तथा अव्यय (अविनाशी) लिङ्गकी कल्पना की गयी है, वैसे ही सामान्य लोगोंके लिये मिट्टी, काष्ठ आदिसे निर्मित स्थूल लिङ्ग प्रकल्पित है। |
| अर्थो विचारतो नास्तीत्यन्ये तत्त्वार्थवेदिनः।<br>निष्कलः सकलश्चेति सर्वं शिवमयं ततः॥ २३ | अतः विचार करनेसे निरवयव तथा सावयव—सब कुछ शिवमयं ही है। मोक्षरूप पुरुषार्थकी भी सत्ता नहीं है*—ऐसा अन्य तत्त्ववेत्तालोग कहते हैं। |
* श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धके अनुसार बन्धन मायामूलक है अर्थात् मिथ्या है, अतः मोक्षकी भी कोई सत्ता नहीं है।
| ३६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्योमैकमपि दृष्टं हि शरावं प्रति सुव्रताः ।<br>पृथक्त्वञ्चापृथक्त्वं च शङ्करस्येति चापरे ॥ २४<br><br>प्रत्ययार्थं हि जगतामेकस्थोऽपि दिवाकरः ।<br>एकोऽपि बहुधा दृष्टो जलाधारेषु सुव्रताः ॥ २५ | आकाशके एक होते हुए भी जैसे वह शराव (मिट्टीका कसोरा)-[आदि उपाधियोंके भेदसे] अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है, वैसे ही भगवान् शिवके एक होनेपर भी उनकी एकता तथा अनेकता दिखायी देती है—ऐसा दूसरे लोग कहते हैं। हे सुव्रतो! एक स्थानपर स्थित होते हुए तथा एक होनेपर भी सूर्य जलके आश्रयभूत विभिन्न पात्रोंमें अनेक रूपोंमें दिखायी देते हैं—यह दृष्टान्त लोगोंको ज्ञान करानेके लिये है॥ २०-२५॥ |
| जन्तवो दिवि भूमौ च सर्वे वै पाञ्चभौतिकाः ।<br>तथापि बहुला दृष्टा जातिव्यक्तिविभेदतः ॥ २६<br><br>दृश्यते श्रूयते यद्यत्तत्तद्विद्धि शिवात्मकम् ।<br>भेदो जनानां लोकेऽस्मिन् प्रतिभासो विचारतः ॥ २७ | स्वर्ग तथा पृथ्वीके सभी प्राणी पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)-से निर्मित हैं; तथापि जाति तथा व्यक्तिके भेदसे वे अनेक रूपोंमें दिखायी देते हैं। जो कुछ भी दिखायी देता है अथवा सुनायी पड़ता है, उसे शिवमयं जानिये; विचार करनेपर इस लोकमें लोगोंका भेद तो प्रतिभास (भ्रम)-मात्र है॥ २६-२७॥ |
| स्वप्ने च विपुलान् भोगान् भुक्त्वा मर्त्यः सुखी भवेत् ।<br>दुःखी च भोगं दुःखं च नानुभूतं विचारतः ॥ २८<br><br>एवमाहुस्तथान्ये च सर्वे वेदार्थतत्त्वगाः ।<br>हृदि संसारिणां साक्षात्सकलः परमेश्वरः ॥ २९ | स्वप्नमें बहुत-से सुखोंका उपभोग करके मनुष्य सुखी तथा दुःखी हो जाता है; विचार करनेसे देखा जाय, तो वास्तवमें सुख-दुःखका अनुभव नहीं होता। इसी प्रकार अन्य सभी वेदार्थतत्त्वज्ञ बन्धन तथा मोक्षको भी स्वप्नकी भाँति बताते हैं। परमेश्वर [शिव] संसारी लोगोंके हृदयमें साक्षात् सकल (सगुण)-रूपसे विराजमान रहते हैं और वे ही जगन्मय देव योगियों तथा ज्ञानियोंके हृदयमें निष्कल (निर्गुण)-रूपसे विराजमान रहते हैं॥ २८-२९ १/२॥ |
| योगिनां निष्कलो देवो ज्ञानिनां च जगन्मयः ।<br>त्रिविधं परमेशस्य वपुर्लोके प्रशस्यते ॥ ३०<br><br>निष्कलं प्रथमं चैकं ततः सकलनिष्कलम् ।<br>तृतीयं सकलं चैव नान्यथेति द्विजोत्तमाः ॥ ३१ | परमेश्वरका तीन प्रकारका विग्रह लोकमें पूजित होता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! पहला निष्कल (निर्गुण), दूसरा सकल-निष्कल (सगुण-निर्गुण) और तीसरा सकल (सगुण); इसमें सन्देह नहीं है॥ ३०-३१॥ |
| अर्चयन्ति मुहुः केचित्सदा सकलनिष्कलम् ।<br>सर्वज्ञं हृदये केचिच्छिवलिङ्गे विभावसौ ॥ ३२<br><br>सकलं मुनयः केचित्सदा संसारवर्तिनः ।<br>एवमभ्यर्चयन्त्येव सदाराः ससुता नराः ॥ ३३ | कुछ लोग सदा सकल-निष्कल रूपकी पूजा करते हैं; कुछ लोग उन सर्वज्ञकी पूजा हृदयमें, शिवलिङ्गमें तथा अग्निमें करते हैं और हे मुनियो! संसारमें रहनेवाले कुछ मनुष्य स्त्री-पुत्रोंसहित सकल (सगुण) रूपकी सर्वदा पूजा करते हैं॥ ३२-३३॥ |
| यथा शिवस्तथा देवी यथा देवी तथा शिवः ।<br>तस्माद्भेदबुद्धयैव सप्तविंशत्प्रभेदतः ॥ ३४<br><br>यजन्ति देहे बाह्ये च चतुष्कोणे षडस्रके ।<br>दशारे द्वादशारे च षोडशारे त्रिरस्रके ॥ ३५ | जैसे शिव हैं, वैसे ही देवी हैं और जैसे देवी हैं, वैसे ही शिव हैं; अतः लोग सत्ताईस प्रभेदसे अभेद बुद्धिसे शरीरमें तथा शरीरके बाहर चतुष्कोण (मूलाधार)-में, |
७६- विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल
अध्याय ७६ ] विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल [ ३६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स स्वेच्छया शिवः साक्षाद्देव्या सार्धं स्थितः प्रभुः।<br>सन्तारणार्थं च शिवः सदसद्व्यक्तिवर्जितः॥ ३६ | षडस्र (स्वाधिष्ठान)-में, दस अरों (मूर्धा)-में, बारह अरों (हृदय)-में, सोलह अरों (कण्ठ)-में तथा तीन अरों (भ्रूमध्य)-में उनकी पूजा करते हैं॥ ३४-३५॥<br><br>सत्-असत्से रहित अर्थात् विलक्षण वे प्रभु शिव जगत्के उद्धारके लिये अपनी इच्छासे साक्षात् देवीके साथ स्थित हैं॥ ३६॥ |
| तमेकमाहुर्द्विगुणं च केचित्<br>केचित्तमाहुस्त्रिगुणात्मकं च।<br>ऊचुस्तथा तं च शिवं तथान्ये<br>संसारिणं वेदविदो वदन्ति॥ ३७ | कुछ लोग उन अद्वितीय शिवको द्विगुण (प्रकृति-पुरुषरूप) कहते हैं, कुछ लोग त्रिगुणात्मक (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्ररूप) कहते हैं और अन्य वेदज्ञ लोग उन्हें संसारका कारण बताते हैं॥ ३७॥ |
| भक्त्या च योगेन शुभेन युक्ता<br>विप्राः सदा धर्मरता विशिष्टाः।<br>यजन्ति योगेशमशेषमूर्तिं<br>षडस्रमध्ये भगवन्तमेव॥ ३८ | भक्ति तथा शुभ योगसे समन्वित, धर्मपरायण तथा विशिष्ट ब्राह्मण [उन] योगेश्वर, अशेषमूर्ति भगवान्का पूजन षडस्रमें करते हैं॥ ३८॥ |
| ये तत्र पश्यन्ति शिवं त्रिरस्रे<br>त्रितत्त्वमध्ये त्रिगुणं त्रियक्षम्।<br>ते यान्ति चैनं न च योगिनोऽन्ये<br>तया च देव्या पुरुषं पुराणम्॥ ३९ | जो लोग त्रिस्र (भ्रूमध्य)-में, तीन तत्त्वोंके मध्यमें त्रिगुण तथा त्रिनेत्र शिवका दर्शन करते हैं, वे ही उन देवीके साथ इन पुरातन पुरुष [शिव]-को प्राप्त करते हैं; अन्य योगी नहीं॥ ३९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवाद्वैतकथनं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवाद्वैतकथन' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७५॥
छिहत्तरवाँ अध्याय
विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि स्वेच्छाविग्रहसम्भवम्।<br>प्रतिष्ठायाः फलं सर्वं सर्वलोकहिताय वै॥ १ | सूतजी बोले—[हे विप्रो!] इसके आगे मैं सभी लोकोंके कल्याणके लिये अपनी इच्छासे उनके विग्रहकी उत्पत्ति तथा [मूर्ति] प्रतिष्ठाके सम्पूर्ण फलका वर्णन करूँगा॥ १॥ |
| स्कन्दोमासहितं देवमासीनं परमासने।<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य सर्वान् कामानवाप्नुयात्॥ २ | स्कन्द (कार्तिकेय) तथा उमासहित महादेवकी मूर्ति बनाकर उन्हें उत्तम आसनपर विराजमान करके भक्तिपूर्वक [उस मूर्तिकी] प्रतिष्ठाकर सभी कामनाओंको प्राप्त करना चाहिये॥ २॥ |
| स्कन्दोमासहितं देवं सम्पूज्य विधिना सकृत्।<br>यत्फलं लभते मर्त्यस्तद्वदामि यथाश्रुतम्॥ ३ | कार्तिकेय तथा उमासहित शिवकी विधिपूर्वक एक बार भी पूजा करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उसे जैसा मैंने सुना है; वैसा बताता हूँ॥ ३॥ |
| ३७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः ।<br>रुद्रकन्यासमाकीर्णैर्गेयनाट्यसमन्वितैः ॥ ४ ॥<br><br>शिववत्क्रीडते योगी यावदाभूतसम्प्लवम् ।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् विमानैः सार्वकामिकैः ॥ ५ ॥<br><br>औमं कौमारमैशानं वैष्णवं ब्राह्ममेव च ।<br>प्राजापत्यं महातेजा जनलोकं महस्तथा ॥ ६ ॥<br><br>ऐन्द्रमासाद्य चैन्द्रत्वं कृत्वा वर्षायुतं पुनः ।<br>भुक्त्वा चैव भुवर्लोके भोगान् दिव्यान् सुशोभनान् ॥ ७ ॥<br><br>मेरुमासाद्य देवानां भवनेषु प्रमोदेत । | वह योगी करोड़ों सूर्योंके समान तेजवाले, सभी अभीष्ट वस्तुओंसे सम्पन्न, रुद्रकन्याओंसे युक्त, गान-नृत्य आदिसे परिपूर्ण विमानोंमें [भगवान्] शिवकी भाँति प्रलयपर्यन्त विहार करता है। वहाँ महान् सुखोंका उपभोग करके वह महातेजस्वी [योगी] सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंसे [क्रमशः] उमालोक, कुमारलोक, ईशानलोक, विष्णुलोक, ब्रह्मलोक, प्रजापतिलोक, जनलोक तथा महर्लोक पहुँच जाता है; पुनः इन्द्रलोकमें पहुँचकर वहाँ दस हजार वर्षोंतक इन्द्रपदका भोग करनेके अनन्तर भुवर्लोकमें दिव्य तथा परम सुन्दर सुखोंको भोगकर मेरु पर्वतपर पहुँचकर देवताओंके भवनोंमें आनन्द प्राप्त करता है॥ ४-७ १/२॥ |
| एकपादं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं शूलसंयुतम् ॥ ८ ॥<br><br>सृष्ट्वा स्थितं हरिं वामे दक्षिणे चतुराननम् ।<br>अष्टाविंशतिरुद्राणां कोटिः सर्वाङ्गसुप्रभम् ॥ ९ ॥<br><br>पञ्चविंशतिकं साक्षात्पुरुषं हृदयात्तथा ।<br>प्रकृतिं वामतश्चैव बुद्धिं वै बुद्धिदेशतः ॥ १० ॥<br><br>अहङ्कारमहङ्कारात्तन्मात्राणि तु तत्र वै ।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियादेव लीलया परमेश्वरम् ॥ ११ ॥<br><br>पृथिवीं पादमूलात्तु गुह्यदेशाज्जलं तथा ।<br>नाभिदेशातथा वह्निं हृदयाद्भास्करं तथा ॥ १२ ॥<br><br>कण्ठात्सोमं तथात्मानं भ्रूमध्यान्मस्तकाद्दिवम् ।<br>सृष्ट्वैवं संस्थितं साक्षाज्जगत्सर्वं चराचरम् ॥ १३ ॥<br><br>सर्वज्ञं सर्वगं देवं कृत्वा विद्याविधानतः ।<br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ १४ ॥ | जो एक पैर, चार भुजाओं, तीन नेत्रों तथा त्रिशूलसे युक्त हैं; जो अपने वाम भागसे विष्णु तथा दक्षिण भागसे ब्रह्माको उत्पन्न करके विराजमान हैं; जिनसे अट्ठाईस करोड़ रुद्र उत्पन्न हुए हैं; जो सभी अंगोंसे अत्यन्त प्रभाववाले तथा पचीस तत्त्वोंवाले जीवात्मा साक्षात् पुरुषको हृदयसे, अपने बायें भागसे प्रकृतिको, बुद्धिदेशसे बुद्धिको, अपने अहंकारसे अहंकारको, तन्मात्राओंसे तन्मात्राओंको, अपनी इन्द्रियोंसे लीलापूर्वक इन्द्रियोंको, पैरके मूलभागसे पृथ्वीको, गुह्यदेशसे जलको, नाभिस्थलसे अग्निको, हृदयदेशसे सूर्यको, कण्ठसे चन्द्रमाको, भौहोंके मध्यभागसे आत्मा (रुद्र)-को, मस्तकसे स्वर्गको—इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत्को उत्पन्न करके साक्षात् विराजमान हैं, उन सर्वज्ञ तथा सर्वव्यापी परमेश्वरकी मूर्तिको विद्याविधानके अनुसार बनाकर विधिपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त करता है॥ ८-१४॥ |
| त्रिपादं सप्तहस्तं च चतुःशृङ्गं द्विशीर्षकम् ।<br>कृत्वा यज्ञेशमीशानं विष्णुलोके महीयते ॥ १५ ॥<br><br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् कल्पलक्षं सुखी नरः ।<br>क्रमादागत्य लोकेऽस्मिन् सर्वयज्ञान्तगो भवेत् ॥ १६ ॥ | तीन पैरोंवाले, सात हाथोंवाले, चार शृंगोंवाले तथा दो सिरोंवाले यज्ञेश्वर अग्निरूप ईशानको स्थापित करके मनुष्य विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहाँ एक लाख कल्पतक महान् भोगोंको भोगकर मनुष्य सुखी रहता है और [पुनः] क्रमसे इस लोकमें आकर समस्त यज्ञोंको सम्पन्न करता है॥ १५-१६॥ |
अध्याय ७६ ] विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल ३७१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वृषारूढं तु यः कुर्यात्सोमं सोमार्धभूषणम्।<br>हयमेधायुतं कृत्वा यत्पुण्यं तदवाप्य सः॥ १७<br>काञ्चनेन विमानेन किङ्किणीजालमालिना।<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं तत्रैव स विमुच्यते॥ १८ | जो मनुष्य उमासहित वृषपर आरूढ अर्धचन्द्रधारी शिवकी मूर्तिको स्थापित करता है, वह दस हजार अश्वमेध यज्ञोंको करनेसे जो पुण्य होता है, उसे प्राप्तकर किंकिणीजालोंसे युक्त स्वर्ण-विमानसे दिव्य शिवलोकमें जाकर वहींपर मुक्त हो जाता है॥ १७-१८॥ |
| नन्दिना सहितं देवं साम्बं सर्वगणैर्वृतम्।<br>कृत्वा यत्फलमाप्नोति वक्ष्ये तद्वै यथाश्रुतम्॥ १९<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैर्वृषसंयुतैः ।<br>अप्सरोगणसङ्कीर्णैर्देवदानवदुर्लभैः ॥ २०<br>नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैः सर्वतः सर्वशोभितैः।<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ २१ | नन्दी तथा उमासहित और सभी गणोंसे घिरे हुए महादेवकी प्रतिष्ठा करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, जैसा मैंने सुना है, उसे बता रहा हूँ। वह सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान वृषभोंसे जुते हुए, अप्सराओंसे भरे हुए, देव-दानवोंके लिये दुर्लभ और नृत्य करती हुई अप्सराओंसे चारों ओरसे पूर्णतः सुशोभित विमानोंसे दिव्य शिवलोकमें जाकर गणाधिपति पदको प्राप्त करता है॥ १९-२१॥ |
| नृत्यन्तं देवदेवेशं शैलजासहितं प्रभुम्।<br>सहस्रबाहुं सर्वज्ञं चतुर्बाहुमथापि वा॥ २२<br>भृग्वाद्यैर्भूतसङ्घैश्च संवृतं परमेश्वरम्।<br>शैलजासहितं साक्षाद् वृषभध्वजमीश्वरम्॥ २३<br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुसोमाद्यैः सदा सर्वैर्नमस्कृतम्।<br>मातृभिर्मुनिभिश्चैव संवृतं परमेश्वरम्॥ २४<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य यत्फलं तद्वदाम्यहम्।<br>सर्वयज्ञतपोदानतीर्थदेवेषु यत् फलम्॥ २५<br>तत्फलं कोटिगुणितं लब्ध्वा याति शिवं पदम्।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् यावदाभूतसम्प्लवम्॥ २६<br>सृष्ट्यन्तरे पुनः प्राप्ते मानवं पदमाप्नुयात्। | पार्वतीसहित नृत्य करते हुए, हजार भुजाओंवाले अथवा चार भुजाओंवाले, भृगु आदि तथा भूतसमूहोंसे घिरे हुए, पार्वतीके साथ, ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-चन्द्र आदि सभी देवताओंसे सदा नमस्कृत और मातृकाओं तथा मुनियोंसे घिरे हुए देवदेवेश्वर-प्रभु-सर्वज्ञ-परमेश्वर-वृषभध्वज शिवकी मूर्ति बनाकर भक्तिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके [मनुष्य] जो फल प्राप्त करता है, उसे मैं बताता हूँ—सभी यज्ञ, तप, दान, तीर्थ तथा देवदर्शन करनेमें जो फल होता है, उसका करोड़ों गुना फल प्राप्त करके वह शिवलोकको जाता है और वहाँ प्रलयपर्यन्त महान् सुखोंको भोगकर पुनः दूसरी सृष्टिका प्रारम्भ होनेपर मनु-पद प्राप्त करता है॥ २२-२६ १/२ ॥ |
| नग्नं चतुर्भुजं श्वेतं त्रिनेत्रं सर्पमेखलम्॥ २७<br>कपालहस्तं देवेशं कृष्णकुञ्चितमूर्धजम्।<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ २८ | दिगम्बर, चार भुजाओंवाले, श्वेतवर्णवाले, तीन नेत्रोंवाले, सर्पकी मेखलावाले, हाथमें कपाल धारण किये हुए और काले तथा घुँघराले केशवाले देवेश्वरको [मूर्तिरूपमें] बनाकर भक्तिपूर्वक प्रतिष्ठा करके मनुष्य शिव-सायुज्य प्राप्त करता है॥ २७-२८॥ |
| इभेन्द्रदारकं देवं साम्बं सिद्धार्थदं प्रभुम्।<br>सुधूम्रवर्णं रक्ताक्षं त्रिनेत्रं चन्द्रभूषणम्॥ २९<br>काकपक्षरं मूर्ध्ना नागतङ्कधरं हरम्।<br>सिंहाजिनोत्तरीयं च मृगचर्माम्बरं प्रभुम्॥ ३० | गजासुरको विदीर्ण करनेवाले, उमासहित, सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, कृष्ण वर्णवाले, लाल नेत्रोंवाले, तीन नेत्रोंवाले, चन्द्रको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, सिरपर काकपक्ष धारण करनेवाले, |
| ३७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| तीक्ष्णदंष्ट्रं गदाहस्तं कपालोद्यतपाणिणम्।<br>हुंफट्कारे महाशब्दशब्दिताखिलदिङ्मुखम्॥ ३१<br>पुण्डरीकाजिनं दोर्भ्यां बिभ्रन्तं कम्बुकं तथा।<br>हसन्तं च नदन्तं च पिबन्तं कृष्णसागरम्॥ ३२<br>नृत्यन्तं भूतसङ्घैश्च गणसङ्घैस्त्वलङ्कृतम्।<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य यथाविभवविस्तरम्॥ ३३<br>सर्वविघ्नानतिक्रम्य शिवलोके महीयते।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् यावदाभूतसम्प्लवम्॥ ३४<br>ज्ञानं विचारतो लब्ध्वा रुद्रेभ्यस्तत्र मुच्यते। | नागटंक धारण करनेवाले, व्याघ्रचर्मको उत्तरीयके रूपमें लपेटे हुए, मृगचर्मको वस्त्ररूपमें धारण किये हुए, तीक्ष्ण दाँतोंवाले, हाथमें गदा लिये हुए, हाथमें कपाल लिये हुए, हुं-फट् महाशब्दसे सभी दिशाओंको गुंजित करते हुए, दोनों हाथोंमें व्याघ्रचर्म तथा कमण्डलु धारण किये हुए, हँसते हुए, गरजते हुए, काले समुद्रको पीते हुए, भूतसमूहोंके साथ नृत्य करते हुए और गणसमुदायोंसे सुशोभित होते हुए देवेश्वर प्रभु शिवको [मूर्तिरूपमें] अपने सामर्थ्यके अनुसार बनाकर तथा प्रतिष्ठा करके [मनुष्य] सभी विघ्नोंसे रहित होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है और वहाँ प्रलयपर्यन्त महान् सुखोंको भोगकर रुद्रोंसे विचारपूर्वक ज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाता है॥ २९–३४ १/२॥ | | अर्धनारीश्वरं देवं चतुर्भुजमनुत्तमम्॥ ३५<br>वरदाभयहस्तं च शूलपद्मधरं प्रभुम्।<br>स्त्रीपुम्भावेन संस्थानं सर्वाभरणभूषितम्॥ ३६<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवलोके महीयते।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगानणिमादिगुणैर्युतः॥ ३७<br>आचन्द्रतारकं ज्ञानं ततो लब्ध्वा विमुच्यते। | अर्धनारीश्वर, चार भुजाओंवाले, वर तथा अभय मुद्रायुक्त हाथवाले, त्रिशूल तथा पद्म धारण किये हुए, स्त्री तथा पुरुष भावमें स्थित और समस्त आभूषणोंसे सुशोभित अत्युत्तम प्रभु महादेवको [मूर्तिरूपमें] बनाकर भक्तिपूर्वक प्रतिष्ठा करके वह शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है और वहाँ चन्द्रमा तथा तारोंकी स्थितिपर्यन्त महान् सुखोंको भोगकर अणिमा आदि गुणोंसे युक्त होकर ज्ञान प्राप्त करके वह मुक्त हो जाता है॥ ३५–३७ १/२॥ | | यः कुर्याद्देवदेवेशं सर्वज्ञं लकुलीश्वरम्॥ ३८<br>वृतं शिष्यप्रशिष्यैश्च व्याख्यानोद्यतपाणिणम्।<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवलोकं स गच्छति॥ ३९<br>भुक्त्वा तु विपुलांस्तत्र भोगान् युगशतं नरः।<br>ज्ञानयोगं समासाद्य तत्रैव च विमुच्यते॥ ४० | जो [मनुष्य] शिष्य-प्रशिष्योंसे घिरे हुए, उपदेशकी मुद्रामें उठे हुए हाथवाले, देवदेवेश तथा सर्वज्ञ लकुलीश्वरको [मूर्तिरूपमें] बनाकर और पुनः भक्तिपूर्वक उन्हें स्थापित करके शिवलोकको जाता है। वह मनुष्य सौ युगोंतक वहाँ महान् सुखोंको भोगकर [पुनः] ज्ञानयोग प्राप्त करके वहींपर मुक्त हो जाता है, जो पूर्वदेवों तथा अमरोंका सर्वाभीष्ट स्थान है॥ ३८–४० १/२॥ | | पूर्वदेवामराणां च यत्स्थानं सकलेप्सितम्।<br>कृतमुद्रस्य देवस्य चिताभस्मानुलेपिनः॥ ४१<br>त्रिपुण्ड्रधारिणस्तेषां शिरोमालाधरस्य च।<br>ब्रह्मणः केशकेनैकमुपवीतं च बिभ्रतः॥ ४२<br>बिभ्रतो वामहस्तेन कपालं ब्रह्मणो वरम्।<br>विष्णोः कलेवरं चैव बिभ्रतः परमेष्ठिनः॥ ४३<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य मुच्यते भवसागरात्।<br>ओं नमो नीलकण्ठाय इति पुण्याक्षराष्टकम्॥ ४४ | ध्यानमुद्रामें स्थित, चिताकी भस्म लगाये हुए, त्रिपुण्ड्र धारण किये हुए, मुण्डमाला धारण किये हुए, ब्रह्माके केशसे निर्मित एक यज्ञोपवीत धारण किये हुए, बाएँ हाथमें ब्रह्माका श्रेष्ठ कपाल धारण किये हुए और भगवान् विष्णुका शरीर धारण किये हुए महादेव शिवकी मूर्ति बनाकर तथा भक्तिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके मनुष्य भवसागरसे पार हो |